भारत में आज जिस रूप में समाजवाद का अभ्यास किया जा रहा है, वह किसी रहस्यवादी पंथ से कम नहीं है. इस मत के पुरोहितों ने बड़ी चतुराई से और संभवतः जानबूझकर—इसे रहस्य के आवरण में ढंक रखा है. वे न तो नवदीक्षितों को और न ही सामान्य जनता को इसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराना चाहते हैं. हां, समय के साथ नवदीक्षितों को इस आस्था का आंतरिक सत्य अवश्य ज्ञात हो जाता है, पर वह उपदेशों से कम और उदाहरणों से अधिक सीखते हैं.
ऐसी स्थिति में सामान्य व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता यदि वह समाजवाद के अनेक और परस्पर भिन्न अर्थ ग्रहण कर ले. प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता और अपनी आशाओं के अनुरूप इसका अर्थ निकालता है. परिणाम यह है कि समाजवाद बहुतों के लिए बहुत कुछ बन गया है और एक ही वस्तु अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ रखती है.
सामान्य धारणा यह बन चुकी है कि समाजवाद का स्वर्ग राष्ट्रीयकरण के माध्यम से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है. राष्ट्रीयकरण की सीमाएं कभी स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं की गईं, क्योंकि पहली बात तो यह कि उसकी कोई सीमा होना आवश्यक नहीं समझी गई और दूसरी यह कि यह अस्पष्टता स्वयं उसके पुरोहितों के लिए अत्यंत लाभदायक है. इससे धन-संपत्ति रखने वाले लोग निरंतर भय और अनिश्चितता में बने रहते हैं. चुनावों के समय यही स्थिति उन तथाकथित धनकुबेरों से धन उगाहने का भी सुविधाजनक साधन बन जाती है—ऐसा धन, जिसे नियंत्रणों और प्रतिबंधों की एक चतुर व्यवस्था के माध्यम से स्वयं इन्हीं पुरोहितों ने इकट्ठा होने दिया और प्रोत्साहित किया होता है. यद्यपि यह समाजवाद का मुख्य उद्देश्य नहीं, केवल एक सह-उत्पाद है.
यदि बात को सरल शब्दों में कहा जाए तो समाजवाद से सामाजिक कल्याण के तत्व को अलग कर दीजिए और कोई भी समझदार पूंजीपति सामाजिक कल्याण का स्वागत ही करेगा—तो जो शेष बचेगा वह राष्ट्रीयकरण और राज्य पूंजीवाद होगा और यदि समाजवाद में से राष्ट्रीयकरण तथा राज्य पूंजीवाद को हटा दिया जाए, तो जो बचता है वह सामाजिक कल्याण है.
यहां सामाजिक कल्याण की अवधारणा व्यापक है. इसमें सामाजिक न्याय, कानून का शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार सम्मिलित हैं. मनुष्य केवल रोटी से नहीं जीता. पर्याप्त मजदूरी का क्या लाभ यदि श्रमिक विवेकपूर्ण बचत करके संपत्ति अर्जित ही न कर सके? और आखिर कौन ऐसा होगा जो केवल रोटी के बदले अपनी स्वतंत्रता बेच देना चाहेगा?
किन्तु संभवतः इस समूचे रहस्य का सबसे गूढ़ पक्ष यही है कि समाजवाद के पुरोहित श्रमिक को केवल जीवित रहने लायक मजदूरी से अधिक पाने का अधिकार देना ही नहीं चाहते.
समाजवाद – एक स्वर्ग?
भारत के सामान्य नागरिक को यह विश्वास दिलाया गया है कि समाजवाद उसकी समस्त समस्याओं का अंतिम समाधान है; उसकी हर विपत्ति की रामबाण औषधि है. जब कभी इस विश्वास में शिथिलता के लक्षण दिखाई देते हैं, तब उसका उत्साह और श्रद्धा पुनर्जीवित करने के लिए किसी नए राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी जाती है.
यह युक्ति उन महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है जो स्वयं को जनता के सामने नए मसीहा के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं.
सदियों पुरानी अंधविश्वासी प्रवृत्तियों से ग्रस्त सामान्य व्यक्ति चमत्कारों पर सहज विश्वास करता है. यही प्रवृत्ति उसे ऐसे मनोहर स्वप्न बुनने की अनुमति देती है जिनमें अमीरों की संपत्ति छीनकर आसानी से धन प्राप्त किया जा सकता है. अमीरों के प्रति उसके मन में पहले से ही एक स्थायी असंतोष रहता है.
उष्ण और आर्द्र जलवायु ने उसे श्रम से विमुख कर दिया है. सदियों से वह ऐसे जीवन का स्वप्न देखता आया है जिसमें बिना परिश्रम के सुख और आराम मिले, और वह स्वयं भी उन्हीं संपन्न वर्गों का अनुकरण करना चाहता है जो शारीरिक श्रम को अपने से नीचे के लोगों का कार्य मानते हैं.
इसलिए आश्चर्य नहीं कि औद्योगिक, शहरी और ग्रामीण—हर प्रकार का श्रमिक इस रहस्यमय आस्था को प्रसन्नता और राहत के साथ स्वीकार कर लेता है, बिना यह पूछे कि वास्तव में इसका अर्थ क्या है. यह उसके लिए उस चमत्कार की तरह है जिसका वह वर्षों से इंतज़ार कर रहा था. उसे विश्वास दिलाया गया है कि इससे श्रम का स्वर्णयुग आएगा, उसके लिए और उसके लगातार बढ़ते परिवार के लिए प्रचुरता होगी, और वह भी न्यूनतम प्रयास के साथ.
इसीलिए उसका वास्तविक नारा बन जाता है— “न्यूनतम काम, अधिकतम मजदूरी.”
समाजवाद के पुरोहितों और श्रमिक नेताओं ने जानबूझकर यह समझाने से परहेज़ किया है कि श्रम केवल पूंजीपति के हित के लिए नहीं, बल्कि स्वयं श्रमिक के कल्याण के लिए भी आवश्यक है.
ट्रेड यूनियन नेतृत्व अब एक नए और तेज़ी से बढ़ते वर्ग के रूप में उभरा है, जिसका विकास इन्हीं पुरोहितों के संरक्षण और प्रोत्साहन में हुआ है. इस वर्ग ने यह गहरा विश्वास आत्मसात कर लिया है कि किसी भी प्रकार के नैतिक संकोच, सिद्धांत या मर्यादाएं अब पुरानी और प्रतिक्रियावादी बातें हैं, जिन्हें प्रगतिशील समाजवाद के मार्ग से हट जाना चाहिए.
उन्होंने उद्योगपतियों से धन निकलवाने की कला में अद्भुत दक्षता प्राप्त कर ली है—कभी हड़ताल की धमकी देकर, कभी वास्तव में हड़ताल करके. उद्योगपति भी स्वयं कम चालाक नहीं होते; वे प्रायः यह मूल्य स्वेच्छा से चुका देते हैं. कई बार तो यूनियन नेताओं को नियमित मासिक ‘भेंट’ देकर संतुष्ट रखा जाता है.
न्याय की दृष्टि से यह स्वीकार करना चाहिए कि ट्रेड यूनियन गतिविधियों ने समाज के उस वर्ग के लिए रोजगार का एक नया क्षेत्र अवश्य खोला है, जिसे योग्यता या प्रतिभा के किसी भी मानक पर रोजगार मिलना कठिन होता.
चुनावों के समय तो इन नेताओं का महत्व और बढ़ जाता है. वे अपने अनुयायियों को ऐसे कार्यों के लिए प्रस्तुत कर देते हैं जिन्हें दूसरे लोग नैतिक कारणों से करने से हिचकिचाते हैं. उदाहरण के लिए, कुछ अवसरों पर इन समर्पित कार्यकर्ताओं ने मतदान अधिकारियों का श्रम कम करने के उद्देश्य से मतदान शुरू होने से पहले ही मतपत्रों पर मुहरें लगा दी हैं. जनसेवा का यह भावुक उदाहरण समाजवाद के पुरोहितों को चुनाव जिताने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है.
समाजवाद का सम्मोहन इतना व्यापक है कि पूंजीपति वर्ग भी अपने अंतिम भाग्य को लगभग शांत भाव से स्वीकार कर चुका है. जब पूरी बिरादरी पर संकट आने वाला हो, तो व्यक्तिगत चिंता का क्या अर्थ रह जाता है? यह वर्ग समाजवाद का नाम श्रद्धा से लेता है और प्रतिदिन अधिक से अधिक राष्ट्रीयकरण की मांग करता है. बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में चलाया गया उसका अभियान इसका उत्कृष्ट उदाहरण है. विडंबना यह है कि आगे बढ़ते समाजवाद का सबसे अधिक दंश भी इसी वर्ग ने झेला है. रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट और जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने मध्यवर्ग की कमर तोड़ दी है. परंतु वह इतना भोला है कि अपनी बढ़ती निर्धनता और कठिनाइयों—भले ही उसकी आय बढ़ी हो—को समाजवादी नीतियों से जोड़कर नहीं देख पाता.
उसके लिए मुद्रास्फीति केवल एक शब्द है; एक गरीब देश के मध्यवर्ग पर उसके वास्तविक प्रभाव का उसे पूरा बोध नहीं है. समाजवाद के पुरोहित उसे यह कहकर संतुष्ट कर देते हैं कि—”मुद्रास्फीति तो विश्वव्यापी घटना है, इसलिए इससे बचा नहीं जा सकता. जीवन-यापन की बढ़ती लागत का कारण जमाखोर और कालाबाज़ारी करने वाले लोग हैं.”
इसी प्रकार मध्यवर्ग ने भी अब तक यह संबंध स्थापित नहीं किया है कि बढ़ती समाजवादी नीतियां ही व्यापक भ्रष्टाचार और नैतिक पतन की जननी हैं. दो जून की रोटी जुटाने का असह्य दबाव इस वर्ग की अनेक लड़कियों को सड़कों पर धकेल देता है. अब तो समाजवाद के पुरोहित खुलेआम यह घोषणा करने लगे हैं कि भ्रष्टाचार इस देश की जीवन-शैली बन चुका है और हमें इसके साथ जीना सीख लेना चाहिए. मानो दोष भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि उन लोगों का हो जो उसके विरुद्ध शिकायत करते हैं और इस समाजवादी वरदान के साथ स्वयं को ढाल नहीं पाते.
भारतीय अर्थव्यवस्था पर आने वाली हर विपत्ति के लिए समाजवादी के पास एक तैयार इलाज मौजूद रहता है. यदि अनाज उत्पादन कम हो रहा है तो उपाय है—अनाज के थोक व्यापार का सरकारी अधिग्रहण. यदि कृषि में समस्याएं हैं तो समाधान है—भूमि सुधारों की नई योजनाएं और भूमि-सीमा को और कम कर देना, चाहे इससे उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा ही क्यों न समाप्त हो जाए. उद्देश्य अत्यंत महान बताया जाता है—भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध कराना. किंतु भूमिहीनों की बढ़ती संख्या अंततः भूमि को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट देगी कि प्रत्येक जोत डाक-टिकट के आकार की रह जाएगी.
यह महत्वहीन समझा जाता है कि ऐसी विखंडित जोतों के कारण कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. आखिर आवश्यकता पड़ने पर पूंजीवादी देशों से अनाज खरीदा जा सकता है. समाजवाद के आराध्य रूस को भी ऐसा करना पड़ा और भाई-भाई चीन को भी. यदि हम भी वही करें तो हम केवल महान प्रगतिशील राष्ट्रों के पदचिह्नों का अनुसरण कर रहे होंगे. और प्रगतिशील लोगों का अनुकरण करना तो सद्गुण माना जाता है, है न?
डाक-टिकट जैसी जोतें
उदाहरण के लिए रूस को ही लीजिए. वहां किसानों से लगभग सारी भूमि ले ली गई और उनके पास केवल डाक-टिकट के आकार की छोटी-छोटी जोतें छोड़ दी गईं. और देखिए, उन छोटी जोतों ने कितना अद्भुत काम किया! अनुपातिक दृष्टि से उन्होंने विशाल सरकारी खेतों से भी अधिक उत्पादन दिया. तो फिर हमारे किसान ऐसी जोतों पर क्यों नहीं जी सकते? कुछ खड़ूस लोग लगातार रोते रहते हैं कि ऐसी नीतियां केवल अगली पीढ़ी के लिए और समस्याएं पैदा करेंगी. पर भविष्य की चिंता में बंधे रहना भी तो एक प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण है. शायद यह हिंदुओं की उस प्राचीन प्रवृत्ति का अवशेष है जो अगले जन्म और अगले लोक की चिंता में डूबी रहती थी. और आखिर स्वर्ग के नाम पर यह भी बताइए कि अगली पीढ़ी को कुछ समस्याएं विरासत में क्यों नहीं मिलनी चाहिए? समस्याएँ होना तो स्वास्थ्यकर बात है. उन्हें सुलझाने से मनुष्य का विकास होता है.
क्या वर्तमान पीढ़ी को समस्याओं की कोई कमी थी?
इन सब बातों के पीछे एक व्यापक विश्वास काम करता है—विशेषकर समाजवादियों में और सामान्य रूप से भारतीयों में—कि वे असाधारण प्रतिभा के धनी हैं; ऐसे बहुमुखी प्रतिभाशाली लोग जो किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान खोज सकते हैं. विडंबना यह है कि जितना कम ज्ञान और अनुभव होता है, यह विश्वास उतना ही अधिक दृढ़ होता जाता है. दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों की अपनी विशिष्ट प्रवृत्तियां और विशेष प्रतिभाएं होती हैं. किसी अमेरिकी को एक छोटा-सा व्यावसायिक या औद्योगिक उपक्रम दे दीजिए, वह उसे बहुराष्ट्रीय कंपनी में बदल देगा. ब्रिटिश लोगों में धैर्य और दृढ़ता कूट-कूटकर भरी है. सबसे भीषण संकट में भी उनका सिद्धांत रहता है—”काम चलता रहना चाहिए.” यही कारण था कि हिटलर ने झुंझलाकर कहा था, “ब्रिटिशों को यह पता ही नहीं चलता कि वे कब हार चुके हैं.”
भारतीय के पास भी एक विशेष प्रतिभा है, किंतु कुछ विकृत प्रकार की. उसे कोई सुचारू रूप से चल रहा संस्थान दे दीजिए, वह थोड़े ही समय में उसे अस्त-व्यस्त कर देगा—मुख्यतः अपनी संगठनात्मक मौलिकता प्रदर्शित करने की उत्कट इच्छा के कारण. भारतीय प्रतिभा का सबसे शानदार उदाहरण स्वयं वह स्थिति है जिसमें स्वतंत्रता के मात्र ढाई दशकों के भीतर यह देश पहुंच गया है. सरकार अपनी पूरी शक्ति के साथ मार्क्स की एक भविष्यवाणी को सच सिद्ध करने में लगी हुई प्रतीत होती है कि एक वास्तविक समाजवादी समाज में अंततः सरकार का स्वयं लुप्त हो जाना चाहिए.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “भारतीय समाजवाद के वरदान” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से मार्च 1974 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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