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Saturday, 8 August, 2026
होममत-विमतबांग्लादेश में हसीना की परछाईं से करियर खत्म हो रहे हैं, राष्ट्रपति के बाद अब सेना प्रमुख पर भी दबाव

बांग्लादेश में हसीना की परछाईं से करियर खत्म हो रहे हैं, राष्ट्रपति के बाद अब सेना प्रमुख पर भी दबाव

बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन चुप्पू ने तय समय से दो साल पहले इस्तीफा दे दिया. अब सबकी नजर सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान पर है.

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आज के बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से किसी भी तरह का जुड़ाव कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक रूप से बड़ा जोखिम माना जाता है. इसके लिए यह भी ज़रूरी नहीं है कि आपका सीधा संबंध उनकी प्रतिबंधित पार्टी बांग्लादेश अवामी लीग से हो. सिर्फ यह अफवाह भी कि आपका हसीना से कोई संबंध है, आपको या तो राजनीतिक रूप से अछूत बना सकती है या फिर जेल तक पहुंचा सकती है.

बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन चुप्पू के मामले में इसका नतीजा यह हुआ कि उन्होंने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए तय समय से दो साल पहले इस्तीफा दे दिया. बांग्लादेशी मीडिया लगातार लिख रहा है कि हसीना द्वारा बांग्लादेश लौटने की इच्छा सार्वजनिक करने के बाद से ही राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. यह आरोप भी लगा कि मई में इलाज के लिए लंदन गए दौरान उन्होंने हसीना से गुप्त फोन पर बात की थी.

अब चुप्पू के जाने के बाद नजरें एक और बड़े पद पर बैठे व्यक्ति, बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान पर टिक गई हैं. सवाल यह है कि दो साल बाद पहली बार मीडिया के सामने आईं शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद क्या तारीक रहमान सरकार पर जनरल वाकर को हटाने का दबाव बढ़ेगा? या फिर वह इस मुश्किल दौर से निकल पाएंगे?

हसीना से फोन पर बात

मैंने फरवरी 2023 में ढाका में राष्ट्रपति चुने जाने के एक दिन बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन चुप्पू से उनके कार्यालय में मुलाकात की थी. चुप्पू ने मुझसे 2001 के भयानक दंगों के बारे में बात की थी. ये दंगे तब हुए थे, जब अवामी लीग सत्ता से बाहर हो गई थी और खालिदा जिया के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. हालांकि, आज यह गठबंधन नहीं है और जमात बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी है.

चुप्पू ने बताया था कि उन्होंने चुनाव के बाद हुई हिंसा की जांच के लिए बनी न्यायिक जांच आयोग की अध्यक्षता की थी और पीड़ितों से बात की थी. उन्होंने कहा, “ज्यादातर पीड़ित हिंदू थे, जिन पर जमात और बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने हमला किया था. हसीना के शासन में हिंदू ज्यादा सुरक्षित थे.”

ज़ाहिर है, 5 अगस्त 2024 को हसीना सरकार गिरने के बाद चुप्पू के लिए इस तरह की नज़दीकी आसान नहीं रही. हालांकि, वह मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल में अपने पद पर बने रहे, लेकिन 24 जुलाई को अपना कार्यकाल खत्म होने से दो साल पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसकी वजह हसीना और उनके बीच कथित फोन कॉल की खबरें बताई गईं.

जब बांग्लादेश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अंग्रेज़ी अखबार द डेली स्टार के एक पत्रकार ने उनसे सीधे पूछा कि क्या उन्होंने हसीना से फोन पर बात की थी, तो चुप्पू ने कहा, “यह बहुत शर्मिंदगी वाला सवाल है.”

उन्होंने कहा, “जिसका दिमाग खराब हो गया हो, वही ऐसी मनगढ़ंत बातें करेगा. यह पूरी तरह बेबुनियाद है, बिल्कुल बेबुनियाद. मैंने पूरी ज़िंदगी ईमानदारी से काम किया है. मुझे झूठी खबरें बनाना पसंद नहीं है.”

बांग्लादेश मामलों के जानकार और यूएनआई के संपादक जयंत रॉय चौधरी ने दिप्रिंट से कहा कि चुप्पू वैसे भी बांग्लादेश के सबसे अच्छे राष्ट्रपति नहीं थे.

उन्होंने कहा, “लेकिन उन्होंने यूनुस का विरोध करते हुए हिम्मत दिखाई. उन्होंने साफ कहा था कि हसीना ने कभी इस्तीफा नहीं दिया, यानी कानूनी तौर पर वह अब भी प्रधानमंत्री हो सकती हैं. इसी बात और हसीना की वापसी के डर की वजह से (प्रधानमंत्री) तारीक रहमान ने उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर किया.”

अब सवाल यह है कि दक्षिण एशिया फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब में बुधवार को हुई हसीना की ऑडियो प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसमें उन्होंने कहा कि वह किसी भी हाल में बांग्लादेश लौटेंगी, उसके बाद क्या तारीक रहमान हसीना की नियुक्ति माने जाने वाले दूसरे बड़े अधिकारी सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान को भी बदल देंगे?

क्या वह विश्वासघाती हैं?

शेख हसीना के समर्थकों की नज़र में बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान सबसे बड़े विश्वासघाती हैं. वहीं उनके आलोचकों का मानना है कि वाकर, हसीना के इतने करीब हैं कि उनके विरोधी असहज महसूस करते हैं. वाकर न सिर्फ हसीना के दूर के रिश्तेदार हैं, बल्कि सेना प्रमुख बनने से पहले वह प्रधानमंत्री कार्यालय के आर्म्ड फोर्सेज डिवीजन में प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर भी थे. इसी दौरान हसीना ने उन्हें सेना प्रमुख नियुक्त किया था. हालांकि, हसीना के सत्ता से हटने के बाद 2024 के जुलाई आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका पर सवाल उठने लगे.

हसीना सरकार में गृह मंत्री रहे असदुज्जमान खान कमाल ने मेरी 2025 की किताब ‘Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution’ के लिए दिए इंटरव्यू में बताया था कि वाकर ने हसीना से वादा किया था कि सेना भीड़ को उनके सरकारी आवास तक नहीं पहुंचने देगी, लेकिन बाद में वह अपने वादे से पीछे हट गए. इसके बाद हसीना को भारत भागना पड़ा.

कमाल के आरोप सही हैं या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन हसीना सरकार गिरने के बाद वाकर पर शक की नज़र से देखा जाने लगा. जुलाई आंदोलन के बाद बनी छात्रों की पार्टी नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) या जातीय नागरिक पार्टी ने पिछले साल 22 मार्च को ढाका विश्वविद्यालय में प्रदर्शन किया था. पार्टी ने आरोप लगाया था कि सेना, अवामी लीग को फिर से राजनीति में लाने और हसीना की वापसी के लिए एक “सैन्य समर्थित साजिश” कर रही है. सेना ने इन आरोपों को “हास्यास्पद और बचकानी कहानियां” बताया था.

बांग्लादेश के मसलों पर गौर करने वाले जानकारों का मानना है कि वाकर ने इन आरोपों का जवाब धर्म की ओर झुकाव दिखाकर देने की कोशिश की. उनके नेतृत्व में बांग्लादेश की सेना में इस्लामी झुकाव बढ़ता दिखाई दे रहा है. चाहे वाकर का पहले की साफ-सुथरी (क्लीन शेव) इमेज छोड़कर दाढ़ी रखना हो, या इस्लाम के पहले चार खलीफाओं के नाम पर चार कंपनियों वाली नई बटालियन बनाना, या फिर सेना का युद्धघोष ‘जय बांग्ला’ (बांग्लादेश की जीत) से बदलकर ‘अल्लाहु अकबर’ करना.

जयंत रॉय चौधरी ने कहा कि वाकर ने हसीना के सत्ता से हटने में संदिग्ध भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए इस्लामी ताकतों से नज़दीकी बढ़ाने की कोशिश की. यह तब हुआ, जब उनके मुहम्मद यूनुस से मतभेद थे और बीएनपी के साथ भी उनके संबंध बहुत अच्छे नहीं थे.

रॉय चौधरी ने कहा, “इस्लामी छवि अपनाने और अराकान कॉरिडोर के खिलाफ दिए गए उनके बयानों की वजह से उन्हें बांग्लादेश सेना के कई अधिकारियों और जवानों का समर्थन मिला है.”

लेकिन सवाल यह है कि क्या इतना उनकी कुर्सी बचाने के लिए काफी होगा?

वरिष्ठ पत्रकार प्रतिम रंजन बोस ने कहा कि नई दिल्ली में हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. उन्होंने कहा, “हसीना ने अपनी वापसी का ऐलान किया है और भारत ने उन्हें प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की अनुमति भी दी. इसके बाद कई नई संभावनाएं पैदा हो गई हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जो संकेत मिलेंगे, उनके आधार पर सेना प्रमुख भी अहम भूमिका निभा सकते हैं.”

अब वाकर कौन-सी भूमिका निभाते हैं, यही तय करेगा कि वह अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या फिर बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति की तरह अपना पद गंवा देंगे.

दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख उनके निजा विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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