राजनीति में, ठीक पोकर के खेल की तरह, अपने सारे पत्ते पहले नहीं दिखाए जाते. इसलिए यह समझना मुश्किल है कि शेख हसीना ने बुधवार शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों की. अगर सच में वह 17 नवंबर 2025 को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (International Crimes Tribunal) से मौत की सज़ा मिलने के बाद अपने देश लौटना चाहती हैं, जबकि उनकी पार्टी आवामी लीग पर बांग्लादेश में अब भी बैन है और पार्टी के बड़े और मिड-लेवल नेता या तो विदेश में हैं, जेल में हैं या छिपे हुए हैं, तो क्या उन्हें अपनी वापसी की बात बार-बार करनी चाहिए थी?
अगर शेख हसीना की घर वापसी होती है, तो इसमें कोई शक नहीं कि यह 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले जुलाई आंदोलन के बाद बांग्लादेश की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना होगी. इसी आंदोलन ने उनकी सरकार गिरा दी थी और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा था.
ऐसी बड़ी घटना का असर तभी ज्यादा होता है, जब उसमें लोगों के लिए एक सरप्राइज हो. फिर बार-बार इसकी चर्चा करके उस सरप्राइज और उसके राजनीतिक असर को क्यों कम किया जा रहा है? क्या शेख हसीना सिर्फ लोगों और हालात का रुख समझने की कोशिश कर रही हैं, या फिर वह बांग्लादेश की उस राजनीति में दोबारा अपनी जगह बनाने के लिए बेचैन हैं, जो अब उनके बिना आगे बढ़ती हुई दिख रही है?
बार-बार एक ही बात
पिछले साल 7 जून को मेरी और मेरे को-राइटर्स की शेख हसीना से फोन पर बात हुई थी. हमने अपनी किताब Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution के लिए आवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं के जरिए बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री से बात करने का अनुरोध किया था. उन्होंने साफ किया था कि यह इंटरव्यू नहीं, बल्कि बातचीत है और हमारी बातचीत की बातें किताब में इस्तेमाल की जा सकती हैं.
यह अपने आप में बड़ी खबर थी, जब शेख हसीना ने हमें बताया कि 2024 का जुलाई आंदोलन कोई आम जन आंदोलन नहीं था, बल्कि बांग्लादेश पर किया गया एक सुनियोजित आतंकी हमला था. उन्होंने कहा कि उनके देश पर वही इस्लामवादी ताकतें कब्ज़ा कर रही हैं, जिन्हें उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए काबू में रखा था.
यह बातचीत उस समय हुई थी, जब मुहम्मद यूनुस अंतरिम सरकार के प्रमुख थे. उस दौरान हसीना ने हमसे कहा था कि वह बांग्लादेश लौटेंगी. उनके ठीक शब्द थे: “इंशाअल्लाह, मैं लौटूंगी.”
उसके बाद से हसीना ने भारतीय और विदेशी मीडिया को कई इंटरव्यू दिए, जिनमें उन्होंने बांग्लादेश लौटने की इच्छा जताई. इस साल जून में हसीना ने एनडीटीवी की नेहा चंद्रा को ईमेल इंटरव्यू दिया. उसमें उन्होंने साफ कहा कि वह 2026 में बांग्लादेश लौटेंगी.
उन्होंने कहा, “मैं साफ कहना चाहती हूं कि हर बाधा और हर साजिश को पार करके मैं इस साल अपने देश लौटूंगी.”
इसके बाद 9 जुलाई को रॉयटर्स की पत्रकार कृष्णा एन. दास को दिए टेलीफोन इंटरव्यू में हसीना ने कहा कि वह दिसंबर के आसपास पार्टी नेताओं के साथ बांग्लादेश लौटकर आत्मसमर्पण करेंगी. उन्होंने कहा, “मेरे लौटने पर मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है, मुझे मारा भी जा सकता है. फिर भी मुझे जाना होगा.”
बुधवार को नई दिल्ली में फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया में दो साल बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने आने पर भी हसीना ने यही बातें दोहराईं. उन्होंने फिर कहा, “मेरे लौटने पर मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है, मुझे मारा भी जा सकता है…फिर भी मुझे जाना होगा.”
इतना ज़रूर था कि सत्ता से हटाए जाने के बाद यह उनका पहला सार्वजनिक मीडिया कार्यक्रम था. हालांकि, वह सिर्फ ऑडियो के जरिए जुड़ी थीं. लेकिन उन्होंने कोई नई बात नहीं कही. पिछले कुछ महीनों में फेसबुक लाइव, ईमेल और फोन इंटरव्यू के जरिए वह लगातार यही कहती रही हैं कि जुलाई 2024 सिर्फ छात्रों का आंदोलन नहीं था, बल्कि बांग्लादेश पर कब्ज़ा करने की एक खतरनाक साजिश थी. उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बांग्लादेश की जनता के साथ खड़ा होना चाहिए और वह अपने देश ज़रूर लौटेंगी.
उनके बेटे सजीब वाजेद, जो बुधवार के कार्यक्रम में अमेरिका से ऑनलाइन जुड़े थे, उन्होंने भी वही बात दोहराई जो वह पहले कह चुके हैं. उन्होंने कहा, “बांग्लादेश, भारत की पूर्वी सीमा पर एक और पाकिस्तान बन गया है.”
इसी तरह का बयान वाजेद ने इस साल 2 फरवरी को कोलकाता में Inshallah Bangladesh किताब के लॉन्च कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए मुख्य वक्ता के रूप में भी दिया था. उन्होंने कहा था, “अगर इस्लामवादी सोच वाली राजनीति मजबूत हुई तो आतंकवाद को खुली छूट मिलेगी और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी.”
वाजेद के इस बयान ने कोलकाता और ढाका दोनों जगह सुर्खियां बटोरी थीं. वहीं, हसीना की घर वापसी से जुड़े बयान भी हर बार खबर बने, लेकिन अब बांग्लादेश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और सोशल मीडिया यूजर्स हसीना की वापसी वाले बयानों को गंभीरता से लेने के बजाय मजाक में लेने लगे हैं. यह शायद वह प्रतिक्रिया नहीं है, जो हसीना और उनकी टीम चाहती होगी.
बुधवार को एक पॉडकास्ट में नेत्रा न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ तसनीम खलील ने कहा कि वह एक लाख बांग्लादेशी टका की शर्त लगाने को तैयार हैं कि हसीना बांग्लादेश नहीं लौटेंगी. इस पॉडकास्ट का लिंक फेसबुक पर शेयर करते हुए बांग्लादेश के राजनीतिक विश्लेषक मुबाशर हसन ने लिखा कि वह भी एक लाख टका और जोड़ने को तैयार हैं.
उधर, बांग्लादेश की सड़कों पर 2024 के जुलाई आंदोलन के प्रमुख छात्र नेता शादिक कायम ने हसीना का प्रतीकात्मक फांसी जुलूस निकाला, जिस पर भीड़ ने तालियां बजाकर समर्थन जताया.
इस बीच, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने 5 अगस्त को हसीना को “फरार और नरसंहार के मामले में दोषी ठहराई गई व्यक्ति” बताते हुए कहा, “ढाका को गहरा अफसोस है कि भारत सरकार को पहले ही इस कार्यक्रम के दोनों देशों के संबंधों पर पड़ने वाले संभावित असर के बारे में बताया गया था, इसके बावजूद इस सार्वजनिक कार्यक्रम की अनुमति दी गई.” विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि हसीना को ऐसा मंच देना “भारत और बांग्लादेश के बीच सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए भी नुकसानदायक है.”
पत्रकार नजमुल अहसान के अनुसार, उन्हें याद नहीं कि बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने पहले कभी किसी दूसरे देश के खिलाफ इतनी कड़ी प्रतिक्रिया दी हो. उन्होंने एक्स पर लिखा, “शेख हसीना की मौजूदगी ने दोनों देशों के रिश्ते सुधारने की उम्मीद को और कमजोर कर दिया है. अब तारीक रहमान की नई दिल्ली यात्रा पर भी अनिश्चितता छा गई है.”
तो सवाल यह है कि बुधवार की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से आखिर शेख हसीना ने क्या हासिल किया?
क्या शेख हसीना लौटेंगी?
बांग्लादेश में भारत की पूर्व हाई कमिश्नर वीणा सिकरी ने दिप्रिंट से कहा कि दिसंबर में वापसी का फैसला शेख हसीना का आखिरी राजनीतिक दांव हो सकता है, लेकिन यह एक सराहनीय कदम है.
उन्होंने कहा, “हो सकता है उन्होंने देश का माहौल समझकर यह फैसला लिया हो. तारीक रहमान की सरकार, यूनुस की अंतरिम सरकार से बेहतर नहीं है. बांग्लादेश के लोग मौजूदा हालात से परेशान हैं. मीडिया नई सरकार के नियंत्रण में है, इसलिए वह देश के असली माहौल को नहीं दिखा रहा, जबकि लोग बदलाव चाहते हैं.”
लेकिन एक आवामी लीग नेता, जो इस समय एक दूसरे देश में निर्वासन में रह रहे हैं, उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा कि हसीना के करीबी लोग उन्हें यह भरोसा दिला रहे हैं कि अगर वह बांग्लादेश लौटती हैं, तो तारीक रहमान की चुनी हुई सरकार गिर जाएगी, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो.
उन्होंने कहा, “हमारी नेता अब बेचैन हो गई हैं. उन्हें भारत में रहते हुए दो साल हो गए हैं. इस बीच आवामी लीग के बिना चुनाव हो चुका है. एक चुनी हुई सरकार देश चला रही है. हमारी पार्टी के नेता या तो जेल में हैं या फिर फेसबुक पर 1971 जैसी क्रांति की अपील करने वाले ‘फेसबुक वॉरियर’ बन गए हैं. सच यह है कि हमारे पास नेता की वापसी की कोई पक्की योजना नहीं है. हम सिर्फ हालात का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे हैं.”
जब भी शेख हसीना की घर वापसी होगी, वह सिर्फ भारत और बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की बड़ी खबर बनेगी.
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री को अपनी टीम के साथ इस वापसी की पूरी योजना बनानी चाहिए. इसे सिर्फ एक राजनीतिक दिखावा (पॉलिटिकल गिमिक) नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि अपनी राजनीतिक विरासत वापस पाने के लिए यह उनका आखिरी बड़ा राजनीतिक दांव भी हो सकता है.
दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख उनके निजा विचार हैं.
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