भारतीय संघ तथा कुछ राज्य सरकारों की शैक्षिक नीतियां हाल के समय में शैक्षणिक स्वतंत्रता के प्रश्न को उठाने के लिए उत्तरदायी रही हैं. शिक्षा मंत्रालय द्वारा विश्वविद्यालयों से उनकी राय प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रसारित विश्वविद्यालय (मानकों का विनियमन) विधेयक की इन संस्थाओं ने इस आधार पर कड़ी आलोचना की कि यह उनकी स्वायत्तता को खतरे में डालता है और शैक्षणिक स्वतंत्रता को संकट में डाल सकता है. उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों के कार्य में हस्तक्षेप के प्रश्न पर एक विवाद बढ़ता हुआ प्रतीत होता है. बंबई में बंबई विश्वविद्यालय से संबंधित कानून को समेकित करने हेतु एक विधेयक प्रकाशित किया गया है और इसकी इस आधार पर आलोचना हुई है कि यह विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को पर्याप्त मान्यता नहीं देता. ये तथा इसी प्रकार के अन्य घटनाक्रम उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वतंत्रता के स्वरूप की ओर जनता का ध्यान निरंतर अधिक आकर्षित करेंगे. इस टिप्पणी का उद्देश्य इस समस्या का संक्षेप में विश्लेषण करना तथा उन संभावित दिशाओं को स्पष्ट करना है जिनमें, लोकतांत्रिक जीवन-पद्धति को प्रोत्साहित करने की हमारी चिंता को ध्यान में रखते हुए, इसका समाधान खोजा जा सकता है.
शैक्षणिक स्वतंत्रता की स्पष्ट परिभाषा तैयार करना और उसकी सटीक सीमाएं बताना एक कठिन कार्य है और संभवतः ऐसा कार्य पूर्णतः विवाद से मुक्त भी नहीं हो सकता. इससे बेहतर यह है कि उसका एक सामान्य वर्णन प्रस्तुत किया जाए, जो उससे संबंधित व्यावहारिक समस्याओं से निपटने में उपयोगी सिद्ध हो सके. सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि ऐसी स्वतंत्रता शिक्षा-पिरामिड के सभी स्तरों पर कार्यरत संस्थाओं के लिए आवश्यक है. यद्यपि प्रारंभिक शिक्षा स्तरों पर ‘मार्गदर्शन’ और ‘सहजता’ के संबंधित क्षेत्रों और इन दोनों के बीच संबंधों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, फिर भी विचारधारा थोपने की रोकथाम एक ऐसा मुद्दा है जिस पर आम सहमति है. साथ ही, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय सार्वजनिक प्राधिकरण की जिम्मेदारी को आम तौर पर इन स्तरों पर अधिक प्रत्यक्ष माना जाता है और उनकी ओर से कुछ हद तक नियंत्रण अपरिहार्य समझा जाता है. जैसे-जैसे हम शिक्षा-संरचना में ऊपर बढ़ते हैं, शिक्षण शिक्षा में परिवर्तित होने लगता है, ‘पद्धति’ का स्थान ‘विषय-वस्तु’ लेने लगती है और वही आगे चलकर सत्य की खोज को बढ़ावा देने का साधन बनती है. इसलिए स्वतंत्रता की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट तथा अनिवार्य हो जाती है. इसी कारण ऐसी स्वतंत्रता को एक मुक्त समाज के सबसे बुनियादी और जीवन्त सिद्धांतों में से एक माना जाने लगा है.
शैक्षणिक स्वतंत्रता का अर्थ यह कहा जा सकता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने कार्यकलापों में स्वतंत्रता और स्वायत्तता प्राप्त हो; उनके शैक्षणिक तथा प्रशासनिक निकाय पाठ्यक्रम निर्धारित करने, पुस्तकों का चयन करने, अध्ययन-सूचियां एवं संदर्भ सामग्री सुझाने, प्रवेश के न्यूनतम मानक तय करने, डिग्री, डिप्लोमा तथा अन्य उपाधियों के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित करने, तथा संबद्ध या घटक संस्थाओं की प्रकृति और कार्यप्रणाली को विनियमित करने के मामलों में किसी बाहरी प्रभाव या प्राधिकरण से उनकी स्वतंत्रता से है. इसका अर्थ अनुसंधान की स्वतंत्रता भी है—अर्थात किसी ऐसे प्रश्न पर, जिसे अनुसंधान योग्य समझा जाए, तथ्य एकत्र करने, उन्हें व्यवस्थित करने, तथा उनसे निकाले गए निष्कर्षों सहित प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता. इसका अर्थ यह भी है कि शिक्षक को निर्धारित पाठ्यक्रम अपने ढंग से पढ़ाने की स्वतंत्रता हो; अपने कार्य से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबंधित सभी सामग्री तक उसे स्वतंत्र पहुंच हो और ऐसा करते हुए विषय की समझ और सराहना बढ़ाने के लिए वह मुद्दों, घटनाओं, व्यक्तियों या विवादों पर वैसी टिप्पणी कर सके जैसी वह आवश्यक समझे. यह भी आवश्यक है कि एक नागरिक के रूप में शिक्षक समुदाय के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हो, बशर्ते ऐसी भागीदारी उसके शिक्षक-कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले और जहां तक इन कर्तव्यों का संबंध है, निर्णायक तत्व उसके शैक्षणिक एवं प्रशासनिक पर्यवेक्षकों का निर्णय होना चाहिए, न कि किसी बाहरी प्राधिकरण की प्रथमदृष्टया राय.
लोकतांत्रिक दिशा में हमारे विकास के स्तर को देखते हुए यह स्वाभाविक है कि शैक्षणिक स्वतंत्रता की समस्या हमारे देश में अन्य स्थानों से भिन्न रूप में उत्पन्न हो. हमारे पास औपचारिक लोकतांत्रिक संविधान तो है, परंतु गहरे लोकतांत्रिक भावनाएं या परंपराएं लगभग नहीं हैं. हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता पर अभी व्यापक खतरा नहीं है; कुल मिलाकर उन्हें अभी स्वायत्तता प्राप्त करनी है. दूसरी ओर, वर्तमान व्यवस्था को निरंतर इस रूप में चित्रित किया गया है कि वह मूलतः विदेशी शासन की प्रशासनिक मशीनरी चलाने के लिए उपयुक्त कर्मियों को तैयार करने हेतु बनाई गई थी. इससे शिक्षा के प्रति एक स्थूल उपयोगितावादी दृष्टिकोण पैदा हुआ है, जो उसकी उपयोगिता के प्रति बढ़ते संशय के कारण और भी भद्दा बन गया है. परिणामस्वरूप व्यवस्था पाठ्यक्रम-प्रधान हो गई है; शिक्षक पुस्तकों में उलझे हैं; और छात्र, डिग्री-लालसा के कारण, केवल परीक्षाओं तक सीमित हो गए हैं. यद्यपि अतीत की तुलना में स्थिति सुधरी है, फिर भी हमारे शैक्षिक मानक विश्व के अनेक देशों की तुलना में कमतर प्रतीत होते हैं. इस प्रकार हमारी शैक्षिक स्थिति की एक विशेषता यह है कि हमारे विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वतंत्रता का विस्तार करने तथा उनकी कार्यकुशलता और मानकों में सुधार सुनिश्चित करने की समस्या एक साथ उपस्थित होती है. समय बीतने, संख्या बढ़ने और संस्थानों में भीड़ बढ़ने के साथ-साथ, या शिक्षण-माध्यम जैसे प्रश्नों के कारण, इन समस्याओं के और गंभीर होने की आशंका है.
मूल प्रश्न के संबंध में दो भिन्न दृष्टिकोण धीरे-धीरे स्पष्ट होते दिखाई देते हैं. एक दृष्टिकोण यह है कि कार्यकुशलता और शैक्षिक मानकों में सुधार बाहरी नियंत्रण के बिना संभव नहीं है और यह नियंत्रण प्रत्यक्ष रूप से या राजनीतिक सत्ता की देखरेख में होना चाहिए. दूसरा दृष्टिकोण उन लोगों का है जो कहते हैं कि शैक्षणिक संस्थानों की स्वतंत्रता का विस्तार उनके कार्य और शैक्षिक स्तर सुधारने की अनिवार्य पूर्वशर्त है. पहला दृष्टिकोण सरकारों की नीतियों में दिखाई देता है; दूसरा विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की रिपोर्ट तथा अंतर-विश्वविद्यालय बोर्ड, विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षाविदों के विचारों में. इन दोनों दृष्टिकोणों में से किसी एक का चयन टालना संभव नहीं है.
फिर भी यह आवश्यक नहीं कि उपर्युक्त दोनों विचारों के समर्थक आपस में टकराएं. यदि एक ओर यह समझ हो कि शिक्षा पर राज्य का ऐसा नियंत्रण, जो उसे उन उद्देश्यों के अधीन कर दे जिन्हें राजनीतिज्ञ वांछनीय मानते हैं, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण का सीधा निषेध है; और दूसरी ओर यह स्वीकार हो कि शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं हो सकती—तो ऐसे टकराव की संभावना आसानी से समाप्त की जा सकती है और इन परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच एक साझा आधार खोजा जा सकता है, जिस पर शैक्षणिक संस्थानों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को बढ़ावा देने के अनुरूप व्यावहारिक समाधान आज़माए जा सकें, ताकि शिक्षा के मानकों में सुधार हो सके.
बाहरी नियंत्रण केवल अनुशासन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. वह मानकों में सुधार नहीं, केवल एकरूपता ला सकता है. वह वर्तमान में उपलब्ध समृद्ध विविधता के स्थान पर नीरस और निष्प्राण समानता स्थापित कर देगा. ऐसा नियंत्रण थोपने का प्रयास करने के बजाय राज्य को, समन्वय के उपयुक्त उपायों और किसी अपूरणीय गिरावट से बचाव के साधनों की व्यवस्था करते हुए, उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता को स्वीकार और सम्मान देना चाहिए. समन्वय की समस्या के समाधान के लिए अंतर-विश्वविद्यालय बोर्ड के सक्रिय कार्य पर भरोसा किया जा सकता है; विश्वविद्यालयों की संरचना निर्धारित करने की राज्य की शक्ति, दूसरी ओर, उनके कार्य में गिरावट के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा है; और विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग द्वारा सुझाए गए स्वरूप की एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी दूसरी सुरक्षा हो सकती है. लोकतांत्रिक जीवन और संस्थानों को बढ़ावा देने से संबंधित लोगों द्वारा ऐसे परिवेश में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को मान्यता न देने का कोई उचित कारण नहीं है. ऐसा करने से इनकार करना केवल वर्तमान को हानि पहुँचाना ही नहीं, बल्कि भविष्य की सभी स्वस्थ संभावनाओं को भी कमजोर करना है.
यह तर्क सुनकर भयभीत होना उचित नहीं होगा कि विश्वविद्यालयों ने अब तक अपने कार्य में अनेक दोष और कमियां दिखाई हैं और यदि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया तो वे और बिगड़ सकते हैं. यह सत्य है कि स्वतंत्रता में उसके दुरुपयोग की संभावना स्वाभाविक रूप से निहित रहती है. किंतु ऐसे दुरुपयोग के विरुद्ध उससे बेहतर कोई सुरक्षा नहीं है जितनी जिम्मेदारी और विवेक की भावना, जिसे केवल स्वतंत्रता ही उत्पन्न कर सकती है. इसलिए ऐसा वातावरण बनाना वांछनीय है जिसमें हमारे विश्वविद्यालय जीवन के आंतरिक सुधारक तत्व उभर सकें और परिस्थिति को प्रभावित कर सकें. वही स्थायी और स्वस्थ सुधार की आधारशिला रखेगा. हमारे विश्वविद्यालयों को निराशा का कारण नहीं समझा जाना चाहिए; बल्कि वे भारत में एक मुक्त समाज के भविष्य के लिए हमारी कुछ गिनी-चुनी आशाओं में से एक हैं.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “शैक्षणिक स्वतंत्रता पर” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से मार्च 1953 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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