जीवन हमेशा एक दौड़ की तरह रहा है और रहेगा. लेकिन उस दौड़ में कोई आनंद नहीं, जिसमें पहले से ही निर्णायक यह तय कर दें कि सभी प्रतियोगी एक साथ लक्ष्य तक पहुंचेंगे.
लेखक एमएच मोदी ने 1980 में लिखा था कि ब्यूरोक्रेट्स, पॉलिटिशियंस, बिज़नेसमैन और ट्रेड यूनियन बॉस के नए ग्रुप के बीच मिलीभगत कुछ हद तक शॉर्ट-टर्म फ़ायदों की वजह से और कुछ हद तक इसलिए बनी रहती है क्योंकि उन्हें सिस्टम से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता.
1989 में मीनू मसानी ने लिखा था कि ज़मीनी स्तर पर सतर्क लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन व्यक्तित्व पूजा, पार्टी के ‘हाई कमांड’ के प्रति अंधी वफादारी, चापलूसी और ऐसी नियंत्रित अर्थव्यवस्था हैं, जहां आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए परमिट-लाइसेंस ज़रूरी शर्त बन जाता है.
1971 में बी.एस. अय्यर ने लिखा था कि लगातार बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी की बुराइयों के लिए कैपिटलिज़्म ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि राजनेताओं की नीतियां ज़िम्मेदार हैं जो इसके काम को पंगु बना देती हैं.
जी.एन. लवांडे ने 1958 में लिखा था कि एक वेलफेयर स्टेट में, कानून के शासन को खराब कर दिया गया है और जनता की राय और संप्रभुता को मंत्रियों के अलोकतांत्रिक आदेशों से बदला जा रहा है.
लिबर्टेरियन कमेंटेटर एमए वेंकट राव ने 1963 में लिखा था कि क्लास वॉर पर आधारित होने के कारण, मार्क्सवाद पर आधारित कोई भी राज्य खुद को दूसरे सभी देशों के खिलाफ, कड़े और पूरी तरह से विरोध में खड़ा कर लेगा.
अगर सरकार टैक्सपेयर्स का पैसा देश को बेहतर बनाने में खर्च करना चाहती है, तो ज्यादा अदालतें बनाए, टूटती हुई नौकरशाही को सुधारे, लेकिन, ज़ाहिर है, नेता सिर्फ अपने बारे में सोचेंगे.