सरकार ने परिसीमन बिल क्यों पेश किया? इसके दो कारण बताए गए. पहला यह कि उसे लगा कि परिसीमन को महिला आरक्षण मुद्दे से जोड़कर वह विपक्ष को समर्थन देने के लिए मजबूर कर देगी. साथ ही, बीजेपी का राजनीतिक प्रबंधन इतना मजबूत है कि उसे भरोसा था कि वह विपक्षी सांसदों को बिल के पक्ष में वोट देने के लिए ‘राजी’ कर लेगी.
दूसरा संभावित कारण यह है कि सरकार को लगा कि वह हर हाल में जीत जाएगी. उसे पता था कि बिल पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाना मुश्किल होगा. लेकिन उसने सोचा कि अगर बिल फेल भी हो गया, तो भी वह विपक्ष को महिला आरक्षण के खिलाफ वोट देने के लिए ‘फंसा’ देगी.
और हुआ भी ऐसा ही. बिल के गिरने के बाद, सरकार के समर्थन वाले न्यूज़ चैनल उस विवादित परिसीमन हिस्से को कम दिखा रहे हैं, जिसकी वजह से बिल गिरा. इसके बजाय इसे “महिला बिल” बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि विपक्ष ने महिला आरक्षण के खिलाफ वोट किया.
अब क्यों?
अगर दूसरा कारण ही असली वजह था, तो यह बहुत ज्यादा चालाकी भरा लगता है. महिला आरक्षण, जिस पर सरकार ने 12 साल तक कोई कदम नहीं उठाया, उसे एक विवादित बिल में सिर्फ विपक्ष को ‘फंसाने’ के लिए जोड़ना बीजेपी की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाता है.
लेकिन यह वजह भी पूरी तरह पर्याप्त नहीं लगती. विपक्ष को अभी ‘फंसाने’ की कोशिश क्यों? विधानसभा चुनाव से पहले क्यों नहीं? बंगाल चुनाव से पहले यह मुद्दा उठाना अब देर से लगता है. लोकसभा चुनाव के करीब तक इंतजार क्यों नहीं किया?
मुझे नहीं लगता कि महिला आरक्षण का असली लागू होना चुनाव के नतीजों पर ज्यादा असर डालेगा, लेकिन यह प्रधानमंत्री के लिए एक प्रतीकात्मक मुद्दा बन सकता था, जिस पर वह चुनाव प्रचार करते.
या शायद नहीं. दो दशक से ज्यादा समय से इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है, लेकिन इसके चुनावी असर का कोई ठोस सबूत नहीं है. और क्या महिलाएं सच में उन बुजुर्ग पुरुष नेताओं की बात मानेंगी, जो कहते हैं कि वे उनकी मदद करना चाहते हैं, जबकि वे खुद एक दशक से ज्यादा समय से सत्ता में हैं?
अगर एक तरफ, मान लीजिए, प्रियंका गांधी के नेतृत्व में अभियान हो और दूसरी तरफ बीजेपी के वरिष्ठ पुरुष नेताओं का अभियान, तो क्या महिलाएं जरूरी तौर पर मानेंगी कि पुरुष ही उनके पक्ष में हैं?
असल में, मुझे नहीं लगता कि ज्यादातर महिलाएं महिला आरक्षण के संभावित लाभार्थियों से खुद को जोड़ पातीं. आज के भारत में राजनीति आम लोगों से इतनी दूर लगती है कि शायद ही कोई महिला कहे—“वाह! इसका मतलब मैं भी सांसद बन सकती हूं.”
और यही इस संयुक्त महिला आरक्षण-परिसीमन बिल की एक बड़ी समस्या है. विपक्ष ने इसे इसलिए हराया क्योंकि इससे हिंदी पट्टी के राज्यों से सांसदों की संख्या बहुत बढ़ जाती, जहां बीजेपी सबसे मजबूत है.
बाद में सरकार ने मौखिक रूप से भरोसा दिया कि बड़े संसद में हर राज्य का अनुपात वही रहेगा, लेकिन यह बात बिल में लिखी नहीं गई थी. और मान भी लें कि सरकार अपनी बात पर कायम रहती, तब भी इसका मतलब यही होता कि सैकड़ों नए सांसद बनते.
और यही इस बिल की सबसे बड़ी कमी थी. इसमें यह मान लिया गया था कि भारत के लोग ज्यादा सांसद चाहते हैं.
लेकिन क्या सच में ऐसा है? मुझे इसमें शक है.
एक तर्क जो टूट जाता है
आज नेताओं के प्रति लोगों में इतना अविश्वास है कि यह समझाना मुश्किल है कि अगर टैक्सपेयर्स का अरबों रुपये सिर्फ और नेताओं को आरामदायक जिंदगी देने में खर्च किया जाए, तो लोगों की जिंदगी बेहतर होगी.
संसद की संरचना बदलने के पक्ष में कुछ तर्क हैं. जैसे—“जनसंख्या बढ़ी है, इसलिए संसद में भी बदलाव होना चाहिए.” दूसरा तर्क है कि अलग-अलग क्षेत्रों का आकार बहुत अलग है.
दक्षिणी राज्य कहते हैं कि जनसंख्या ज्यादा हिंदी पट्टी में बढ़ी है, जबकि दक्षिण ने शिक्षा और आय में बेहतर प्रदर्शन किया है, तो उन्हें सजा क्यों मिले? कम सफल राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण में नाकामी के लिए इनाम क्यों मिले?
इस पर दोनों तरफ से तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सांसद लोगों की जिंदगी में फर्क लाते हैं?
जरा चुनाव की प्रक्रिया को देखें. हर सीट पर चुनाव में कम से कम 100 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. यह पैसा अक्सर कारोबारियों से अवैध रूप से लिया जाता है—या तो रिश्वत के रूप में या दबाव डालकर.
अगर 200 से ज्यादा नई सीटें जुड़ेंगी, तो खर्च और भ्रष्टाचार दोनों बढ़ेंगे.
फिर हर सांसद पर होने वाला खर्च—दिल्ली में बड़े घर, यात्रा और सुविधाएं—ये सब अलग. और जब चुनाव लड़ने के लिए काला पैसा लिया जाता है, तो वह यहीं खत्म नहीं होता. राजनीति महंगा काम है.
लोग यह सब नजरअंदाज कर सकते हैं, अगर उन्हें लगे कि सांसद कोई जरूरी काम करते हैं. लेकिन ज्यादातर लोगों को लगता है कि सांसद सिर्फ दबाव समूहों का हिस्सा हैं. फैसले ऊपर कुछ गिने-चुने लोग लेते हैं, और सांसद सिर्फ आदेश मिलने पर वोट करने आते हैं.
कहा जा सकता है कि विपक्षी सांसद सरकार को जवाबदेह बनाते हैं, लेकिन सदनों के संचालन की पक्षपातपूर्ण व्यवस्था के कारण वे ऐसा कर भी नहीं पाते.
इसलिए लोगों को यह समझाना मुश्किल है कि सांसद वही काम कर रहे हैं, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी. और यह समझाना और भी मुश्किल है कि सैकड़ों नए सांसद बनने से उनकी जिंदगी बदल जाएगी.
अगर सरकार सच में टैक्सपेयर्स का पैसा देश को बेहतर बनाने में लगाना चाहती है, तो ज्यादा अदालतें बनाए, ज्यादा जज नियुक्त करे, ज्यादा पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग दे और गिरती हुई नौकरशाही को सुधारे.
लेकिन, जाहिर है, नेता अपने बारे में ही सोचेंगे.
परिसीमन के पीछे एक तर्क जरूर है. लेकिन संसद के कामकाज और नेताओं की हकीकत उस तर्क को कमजोर कर देती है.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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