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Saturday, 18 April, 2026
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ईरान पर ट्रंप-नेतन्याहू का दांव: क्या फिर लौट रही है ‘रिजीम चेंज’ की नीति?

अमेरिका के लक्ष्य अधूरे रह गए, अब उसके पास न तो इतनी ताकत है और न इतना जोश है कि वह युद्ध फिर शुरू कर सके; और ईरान? घुटने टेकने की जगह वह पूरे संकल्प के साथ लड़ा. उसकी बागडोर अब ज्यादा कट्टरपंथी लोगों के हाथ में है

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इज़रायल और अमेरिका ईरान के खिलाफ जो जंग लड़ रहे हैं उसकी शुरुआत उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से की थी और इस जंग को जीतने का दावा करने वाले, खासकर अमेरिका, जिस तरह गतिरोध वाली हालत में फंसे हुए हैं वह भी उतना ही नाटकीय है. ‘नाटकीयता’ का तत्व ईरान के शीर्ष आध्यात्मिक, सैन्य, वैचारिक एवं बौद्धिक नेतृत्व की हत्या में निहित था और गतिरोध का तत्व हार मानने से ईरान के जिद्दी इनकार में निहित है. इन सबसे कुछ सवाल उभरते हैं.

हत्याएं क्या आपके दुश्मन के सफाए की गारंटी हो सकती हैं? क्या इससे बेहतर कोई समझदारी वाला तरीका हो सकता है? क्या इज़रायल-अमेरिका गठबंधन अपनी खास चाल चलना भूल गया? क्या ऐसे किसी और युद्ध का इतिहास हमें कुछ और सिखाता है? भारत के जो अनुभव रहे हैं उनसे क्या कुछ सीख मिलती है? इन सवालों में से पहले सवाल का जवाब ना है, बाकी सवालों के जवाब हां हैं.

हमें इज़रायल और अमेरिका को अलग-अलग समझना पड़ेगा. इज़रायल अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लंबे समय से लड़ रहा है. वह इसलिए निराश होगा कि ईरान में सरकार नहीं बदली, लेकिन ईरान कमजोर हुआ है, उसके परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा है और उसका मिसाइल सिस्टम काफी हद तक खत्म हो गया है— ये सब कम कीमत पर मिली बड़ी सफलताएं हैं.

लेबनान में भी कार्रवाई, और मजबूत हो रहे हिज्बुल्ला का कमजोर होना उसके लिए फायदा ही है. अगर इज़रायल अपने आसपास की स्थिति देखते हुए समय खरीदना चाहता था, तो यह एक अच्छी रणनीति थी. इसके अलावा, इज़रायल अपनी मर्ज़ी से जब चाहे युद्ध कर सकता है या शांति कर सकता है.

लेकिन अमेरिका का क्या? उसके ज्यादातर लक्ष्य वही थे जो इज़रायल के थे और कुछ लक्ष्य उसके अपने हितों से जुड़े थे. वह ईरान में सत्ता बदलना चाहता था, उसके परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहता था और खाड़ी देशों (जीसीसी) को सुरक्षा का भरोसा देना चाहता था.

इन तीनों में वह सफल नहीं हो पाया. ईरान में वही सरकार बनी रही, बल्कि अब ज्यादा कट्टरपंथी लोग सत्ता में आ गए हैं. जहां तक यूरेनियम का सवाल है, ईरान उसे वापस करने या अपने परमाणु कार्यक्रम को निगरानी में लाने को तैयार नहीं है. उसके मिसाइल लॉन्चर कम हुए हैं, लेकिन उन्हें रोकने वाले सिस्टम भी कम हो गए हैं. और जब-जब डोनल्ड ट्रंप या उनके ‘सेक्रेटरी ऑफ वार’ पीट हेगसेथ यह कहते हैं कि ईरान की नौसेना और वायुसेना खत्म हो गई है, तब इस पर हंसी आती है. असल में, ईरान के पास छोटी नौसेना थी और ठीक से वायुसेना थी ही नहीं.


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और अरब देशों का क्या हुआ? छोटे लेकिन हिम्मती यूएई को छोड़ दें तो बाकी अरब देश डरे हुए और युद्ध से बचते हुए दिखे. लंबे समय से वे पश्चिमी देशों पर निर्भर रहे हैं. उन्होंने इज़रायल को अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने दिया और फिलिस्तीन के मुद्दे पर सिर्फ औपचारिक बातें करते रहे.

कुछ देश दोनों तरफ का साथ देते रहे हैं. जैसे कतर, जिसने एक तरफ अमेरिका को अपना सबसे बड़ा सैन्य अड्डा बनाने दिया है और दूसरी तरफ ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’, हमास और ईरान से भी संबंध बनाए रखे हैं. सऊदी अरब यह मानता रहा है कि पाक मस्जिदों का रक्षक होने के कारण उसे सुरक्षा मिलेगी. उसे अमेरिकी सेना पर पूरा भरोसा था. अब ये सभी देश सदमे में हैं. ‘जीसीसी’ देशों को अपने आधुनिक इतिहास में पहली बार हमला झेलना पड़ा, और उन्हें न अपनी सेना से पूरी सुरक्षा मिली, न अमेरिका से.

अगर ध्यान से देखें तो पश्चिम एशिया की यह लड़ाई सिर्फ इज़रायल और ईरान के बीच नहीं है. असल में यह ईरान और खाड़ी के अरब देशों के बीच प्रभाव की लड़ाई है, जिसमें इज़रायल एक तरह से बीच का किरदार है. ईरान की आबादी ‘जीसीसी’ देशों से ज्यादा है और उसकी सेना भी उनसे बड़ी है.

बड़े और गरीब मुस्लिम देशों, खासकर ‘ग्लोबल साउथ’ में, ईरान का इस्लाम अमीर खाड़ी देशों से ज्यादा सच्चा माना जाता है. यह सिर्फ शियाओं तक सीमित नहीं है. बहुत से लोग ईरान को ऐसा देश मानते हैं जो फिलिस्तीन के लिए अमेरिका और इज़रायल से लड़ रहा है, चाहे उसे खुद नुकसान क्यों न हो. यह सोच खाड़ी देशों के बारे में उनकी राय से बिल्कुल अलग है. यूएई को छोड़कर किसी ने जवाबी लड़ाई की बात नहीं की है. वे दोनों पक्षों से फायदा लेने की कोशिश में हैं.

‘जीसीसी’ देशों को ईरान की सैन्य ताकत से ही नहीं, बल्कि इस डर से भी खतरा है कि वह उनके लोगों को भड़का सकता है. और अब यह डर और बढ़ सकता है क्योंकि कई लोग इसे इराक, अफगानिस्तान और सीरिया में हार के बाद पश्चिम के खिलाफ पहली बड़ी प्रतिक्रिया मान रहे हैं. खाड़ी देशों को डर है कि कहीं उनके अपने लोग विद्रोह न कर दें और नया ‘अरब स्प्रिंग’ न शुरू हो जाए.

इसी डर के कारण सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता फिर से सक्रिय किया और अपनी सेना को उसमें शामिल किया. लेकिन पाकिस्तान शायद ही ईरान या इराक के खिलाफ लड़ता दिखेगा. वह वहां पैसे के लिए मौजूद रहेगा. डर इतना है कि कतर ने भी स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर दिए हैं.

निष्कर्ष यह है कि अमेरिका के लक्ष्य पूरे नहीं हुए और उसके पास अब युद्ध दोबारा शुरू करने की ताकत और इच्छा दोनों कम हैं. हेगसेथ ने कहा कि ईरान युद्धविराम चाहता था, लेकिन अब लगता है कि ट्रंप ही समझौता करना चाहते हैं.

अब फिर सवाल उठता है—क्या नेतृत्व की हत्या सही रणनीति थी या बड़ी गलती? ईरान ने झुकने के बजाय मजबूती से लड़ाई लड़ी.

हत्याओं का उलटा असर हुआ. अगर ईरान के नेता जिंदा रहते, तो बातचीत में अमेरिका को ज्यादा फायदा मिलता. किसी समझौते में उनकी बात ज्यादा मायने रखती.

देशों के बीच युद्ध में आखिरकार बातचीत ही करनी पड़ती है. इसलिए शीर्ष नेताओं को आमतौर पर निशाना नहीं बनाया जाता. रूस और यूक्रेन ने भी इसमें सावधानी बरती है.

आतंकवादी संगठनों और किसी देश से बातचीत में फर्क होता है. हिज्बुल्ला, हमास, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूह अलग हैं, जबकि किसी देश के नेता अलग होते हैं.

भारत के अनुभव भी यही बताते हैं. भारत ने उग्रवाद से लड़ते हुए भी उनके नेताओं को बातचीत के लिए जिंदा रखा. मिजो, नगा, मणिपुर और असम के उग्रवादी नेताओं को अक्सर मौका दिया गया. श्रीलंका में भी ऐसे उदाहरण हैं.

कश्मीर में भी भारत ने हथियारबंद और बिना हथियार वाले समूहों में फर्क किया. हुर्रियत नेताओं को सुरक्षा दी जाती रही, यहां तक कि सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेताओं का भी इलाज कराया गया.

भारत में ऐसा एक ही बड़ा ऑपरेशन हुआ—ऑपरेशन ब्लूस्टार—जिसमें भिंडरांवाले मारे गए. इसके बाद लंबे समय तक हिंसा और अलगाववाद बढ़ा.

आखिर में यही समझ आता है कि किसी सरकार या नेतृत्व को खत्म करना चाहे जितना ताकतवर कदम लगे, उसका असर अक्सर उल्टा ही होता है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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