भारत में जेन ज़ी के नेतृत्व में हाल में हुए प्रदर्शन और पड़ोसी देशों में भी युवाओं द्वारा चलाए गए ऐसे आंदोलनों ने सभी को एक बात फिर याद दिलाई है. युवा अब सिर्फ राजनीति का भविष्य नहीं हैं, बल्कि वे राजनीति का वर्तमान भी बनते जा रहे हैं.
इससे भी अहम बात यह है कि इन आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को ऐसी बात याद दिलाई है, जिसे अब वे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. 2029 के लोकसभा चुनाव तक जेन ज़ी के देश का सबसे बड़ा वयस्क वर्ग बनने की उम्मीद है. ऐसे में भारत पर शासन करना चाहने वाली किसी भी पार्टी को उस पीढ़ी का भरोसा जीतना होगा, जो पहले की पीढ़ियों से बिल्कुल अलग तरीके से सोचती है, बातचीत करती है और संगठित होती है.
यह पहली ऐसी पीढ़ी भी है, जिसने इंटरनेट के बिना लाइफ लगभग कभी नहीं देखी. यह पीढ़ी स्मार्टफोन, सस्ते मोबाइल डेटा, सोशल मीडिया और कड़ी आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दौर में बड़ी हुई है. यह सच मायनों में डिजिटल पीढ़ी है, जो दुनिया से पहले की किसी भी पीढ़ी की तुलना में कहीं ज्यादा जुड़ी हुई है.
लेकिन एक ही डिजिटल दुनिया में बड़े होने का मतलब यह नहीं है कि जेन ज़ी के सभी युवा एक जैसा सोचते हैं. वे इस दुनिया को कैसे देखते हैं और उस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, यह उनकी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुसार काफी अलग-अलग होता है.
Gen Z एक जैसी नहीं है
आज जब भारत में Gen Z की बात होती है, तो बहुत से लोगों के दिमाग में सबसे पहले वह स्टूडेंट्स आते हैं जिन्होंने परीक्षा सुधार और जवाबदेही की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. यह वह पीढ़ी है जिसने डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके खुद को एकजुट किया, लोगों को जोड़ा और संस्थाओं पर दबाव बनाया. उनकी मांगें मुख्य रूप से पारदर्शी परीक्षाएं, मंत्रियों की जवाबदेही और ठोस सुधार थीं.
लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि भारत की Gen Z एक जैसी नहीं है और उसे एक जैसा मानना गलती होगी. पहले की हर पीढ़ी की तरह यह पीढ़ी भी अलग-अलग सोच वाली, बंटी हुई और कई विरोधाभासों से भरी हुई है. जो पीढ़ी सोशल मीडिया पर संस्थागत सुधार की मांग कर रही है, वही पीढ़ी उन्हीं प्लेटफॉर्म पर राष्ट्रवादी कंटेंट, स्थानीय खबरें और धार्मिक पहचान से जुड़ा कंटेंट भी साझा कर रही है.
जैसे भारत को सिर्फ एक कहानी से नहीं समझा जा सकता, वैसे ही उसकी Gen Z को भी एक नज़रिए से नहीं समझा जा सकता. देश बहुत बड़ा है और यहां बहुत विविधता है.
मुंबई या बेंगलुरु में बड़ा हो रहा कोई युवा जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता या ग्लोबल पॉप कल्चर जैसे मुद्दों पर ज्यादा बात कर सकता है, लेकिन छोटे शहरों और गांवों के बहुत से युवाओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं. उनके लिए स्थायी नौकरी पाना, सरकारी परीक्षा पास करना, परिवार की आर्थिक मदद करना और अपना भविष्य बेहतर बनाना ज्यादा जरूरी होता है.
यही फर्क आर्थिक वर्ग में भी दिखाई देता है. इंग्लिश मीडियम के प्राइवेट स्कूल से पढ़ा एक Gen Z स्टूडेंट वैश्विक अवसरों, वर्क फ्रॉम होम और विदेश में पढ़ाई जैसी सुविधाओं तक आसानी से पहुंच सकता है. वहीं करोड़ों दूसरे युवा, जिन्हें ये सुविधाएं नहीं मिलतीं, गिग इकोनॉमी में काम कर रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं या कॉलेज के बाद अपनी पहली स्थायी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
और दूसरी तरफ युवा कांवड़िये हैं. हर श्रावण में लाखों युवा, जिनमें से कई छोटे शहरों और गांवों से आते हैं, भगवान शिव के लिए गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हैं. भारत के बाहर के लोगों और यहां तक कि कई शहरी भारतीयों के लिए शायद यह वह जगह नहीं होगी, जहां वे Gen Z को देखने की उम्मीद करेंगे, लेकिन इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर अपनी यात्रा रिकॉर्ड करते हुए इन युवाओं को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.
ये सभी एक ही पीढ़ी के हैं. सभी एक ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनका भारत एक जैसा नहीं है. यही फर्क तय करता है कि वे किन राजनीतिक मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हैं, किन नेताओं का समर्थन करते हैं और किस तरह का भविष्य बनाना चाहते हैं.
यही वजह है कि Gen Z की तस्वीर उतनी आसान नहीं है, जितनी पहली नज़र में दिखाई देती है. यही कारण है कि इस पीढ़ी को लेकर इतनी बहस होती है. युवा कांवड़ियों को अक्सर स्वाभाविक रूप से भाजपा समर्थक माना जाता है, जबकि इस पीढ़ी के कई शहरी युवाओं को व्यवस्था के खिलाफ सोच रखने वाला माना जाता है.
हर राजनीतिक दल के लिए चुनौती
तो क्या बीजेपी सिर्फ जेन ज़ी के एक हिस्से को खुश करके सफल हो सकती है? और अगर हो भी जाती है, तो क्या गारंटी है कि यही युवा वोटर आगे भी उसके साथ रहेंगे, अगर उन्हें नौकरी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अनिश्चितता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता रहा?
इसी वजह से बीजेपी को इस पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए. Gen Z पहले की पीढ़ियों की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक है और उसके पास इंतज़ार करने का धैर्य भी कम है. सांस्कृतिक गर्व और पहचान युवा वोटरों को आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन वे हमेशा के लिए अवसरों, सुरक्षित रोजगार और आर्थिक तरक्की की जगह नहीं ले सकते.
बीजेपी सही तौर पर यह कह सकती है कि उसने देश में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया, डिजिटल सेवाओं का विस्तार किया और सरकारी व्यवस्थाओं को आधुनिक बनाया. युवा भारतीय नागरिक और उपभोक्ता के रूप में हर दिन इन बदलावों का फायदा भी उठा रहे हैं, लेकिन उनमें से कई लोगों को अब भी लगता है कि ये उपलब्धियां उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत पूरी नहीं कर पाईं—यानी स्थायी नौकरी और सुरक्षित भविष्य की साफ राह.
इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी राजनीतिक दलों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. सत्ता में होने की वजह से बीजेपी पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ सकता है, लेकिन ऐसी पीढ़ी का भरोसा जीतना, जो पारंपरिक राजनीति पर लगातार कम भरोसा कर रही है, हर राजनीतिक दल के लिए चुनौती होगी.
“असल” Gen Z कौन है और वह सच में क्या चाहता है, इस पर बहस आगे भी चलती रहेगी. लेकिन एक बात अब साफ हो गई है—हर राजनीतिक दल को युवा वोटरों को लेकर अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने की ज़रूरत होगी.
राजनीति को देखने और समझने का उनका तरीका भी बदल रहा है. जेन ज़ी अब अपनी जानकारी ज़्यादातर छोटे वीडियो, इंस्टाग्राम रील्स और डिजिटल क्रिएटर्स से लेता है. जबकि पहले की पीढ़ियां टीवी डिबेट, अखबार और WhatsApp पर ज्यादा समय बिताती थीं. राजनीति भी इस नई हकीकत के हिसाब से खुद को बदल रही है और राजनीतिक दल अपने लोगों तक पहुंचने का तरीका बदल रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि अगला चुनाव जितना जमीन पर लड़ा जाएगा, उतना ही स्मार्टफोन की स्क्रीन पर भी लड़ा जाएगा.
भारत के राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि Gen Z इस इंतज़ार में नहीं है कि नेता उसकी पहचान तय करें. वह अपनी पहचान खुद बना रहा है—क्लासरूम में, कांवड़ यात्रा के रास्तों पर, कोचिंग सेंटरों में, रील्स पर और सड़कों पर.
जो राजनीतिक दल इस विविधता को समझेगा, उसके पास लगभग 38 करोड़ युवा भारतीयों का भरोसा जीतने का मौका उस दल से कहीं ज्यादा होगा, जो यह मानकर चले कि एक ही संदेश सभी युवाओं पर असर करेगा.
आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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