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Saturday, 26 September, 2026
होमदेशपांच महीने जेल में, घर पर बढ़ता कर्ज: नोएडा प्रदर्शन में गिरफ्तार युवाओं की जिंदगी कैसे थमी

पांच महीने जेल में, घर पर बढ़ता कर्ज: नोएडा प्रदर्शन में गिरफ्तार युवाओं की जिंदगी कैसे थमी

नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में अब भी जो लोग जेल में बंद हैं, उनमें युवा फ़ैक्ट्री वर्कर, छात्र और एक्टिविस्ट शामिल हैं—ये सभी 20-29 साल की उम्र के हैं—और इनकी ज़िंदगी अभी आकार ले ही रही थी.

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यह नोएडा में मज़दूरों के विरोध और उसके बाद हुई कार्रवाई से बनी स्थिति पर एक सीरीज़ का पार्ट 2 है. पार्ट 1 यहां पढ़ें.

नई दिल्ली: जब उनका नाम अदालत की तीखी सुनवाई और खबरों की सुर्खियों के बीच था, तब 25 साल की लॉ स्टूडेंट आकृति चौधरी, जिन पर अप्रैल में नोएडा में मजदूरों के वेतन को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप है, अकेले सेल में बंद थीं और उन्हें “FOMO” हो रहा था.

उन्हें NEET पेपर लीक के खिलाफ CJP प्रदर्शन और DUSU चुनाव में शामिल न हो पाने का अफसोस है. जेल में बंद रहते हुए वह अपना समय पढ़ने, वैन गॉग की Sunflowers (सूरजमुखी) पेंटिंग को दोबारा बनाने और जब मौका मिले तो दूसरी महिला कैदियों के साथ महाभारत पर चर्चा करने में बिताती हैं.

16 सितंबर को गौतम बुद्ध नगर जिला जेल में मुलाकातियों और कैदियों के बीच लगी जाली के पीछे से दिप्रिंट से बात करते हुए आकृति ने कहा कि जेल ऐसी जगह है, जिनका इस्तेमाल बाहर निकलकर विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं और बुजुर्गों के मन में डर पैदा करने के लिए किया जाता है. उन्होंने कहा, “जेल के गलियारों तक पहुंचने के बाद अब मुझे उस चीज का डर नहीं लगता, जिससे वे मुझे डराना चाहते हैं.”

लेकिन नोएडा के मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के मामले में जेल में बंद आकृति अकेली Gen Z सदस्य नहीं हैं. खबरों की सुर्खियों से दूर, पांच महीने बाद भी जेल में बंद लोगों में युवा फैक्ट्री मजदूर और दूसरे छात्र और कार्यकर्ता शामिल हैं. ये सभी 20 साल की उम्र के आसपास हैं और उनकी जिंदगी अभी बननी ही शुरू हुई थी. कुछ लोग इस दौरान अपनी परीक्षाएं नहीं दे पाए और उनकी नौकरियां चली गईं, जबकि दूसरों की पढ़ाई और करियर रुक गए हैं. उनके परिवारों पर लंबे समय तक जेल में रहने की वजह से बढ़ते कानूनी खर्च और कर्ज का बोझ भी पड़ा है.

इनमें अंशु कुशवाहा भी हैं, जो फरवरी में अपना हरदोई का घर छोड़कर नोएडा आए थे. उनके दिमाग में दो बातें थीं: अपने बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनना और अपनी पढ़ाई जारी रखना. सितंबर तक दोनों ही चीजें रुक गई थीं.

20 साल के अंशु ने गौतम बुद्ध नगर जिला जेल में सलाखों के पीछे से दिप्रिंट से कहा, “मैंने एक भी पैसा नहीं कमाया है. इसके बजाय मेरे पिता को दोनों अलग-अलग मामलों के वकीलों को 34,000 रुपये तक देने के लिए कर्ज लेना पड़ा.”

अंशु ने कहा, “जब मेरे पिता दो महीने पहले मुझसे मिलने आए थे, तो उन्होंने बताया था कि तीसरी FIR के लिए वकील करने के लिए उन्हें फिर से कर्ज लेना पड़ेगा.”

जेल की लोहे की सलाखों के पीछे से कई चेहरे अपने मिलने आए लोगों के बीच अपने परिवारवालों को बेचैनी से ढूंढ रहे थे. सलाखों के उस पार ऐसे पुरुष और महिलाएं थे, जिन पर अलग-अलग तरह और अलग-अलग स्तर के अपराधों के आरोप थे. इनमें अंशु जैसे कुछ लोग भी थे, जिन्हें मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के मामले में गिरफ्तार किया गया था.

अंशु ने याद करते हुए कहा, “जब पुलिस ने 14 अप्रैल को हमें बिना किसी भेदभाव के उठाना शुरू किया, तो मैं बार-बार उन्हें बता रहा था कि मेरे सेमेस्टर के एग्जाम सिर्फ एक हफ्ते दूर हैं और मेरी कोई गलती न होने के बावजूद मैं उन्हें नहीं दे पाऊंगा.”

नोएडा पुलिस ने उन्हें मदरसन इंटरनेशनल के पास से उठाया था, जहां वह काम करते थे.

अंशु B.Sc की पढ़ाई कर रहे थे और साथ ही नोएडा की एक निजी फैक्ट्री में करीब 10 घंटे काम करते थे. अप्रैल के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में दर्ज तीन अलग-अलग FIR में उनका नाम है.

जब पुलिस ने बिना किसी भेदभाव के हमें उठाना शुरू किया, तो मैं बार-बार उन्हें बता रहा था कि मेरे सेमेस्टर के एग्जाम सिर्फ एक हफ्ते दूर हैं और मेरी कोई गलती न होने के बावजूद मैं उन्हें नहीं दे पाऊंगा.

— नोएडा जेल में बंद अंशु कुशवाहा

उन्होंने कहा, “मैं ऑफिस के गेट के सामने खड़ा था. विरोध प्रदर्शन की वजह से गेट बंद था और मुझे नहीं पता था कि हम काम करेंगे या नहीं. मैं सिर्फ आधिकारिक जानकारी का इंतजार कर रहा था.” उन्होंने बताया कि कुछ ही मिनटों में पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया और वहां मौजूद सभी लोगों को बिना किसी फर्क के उठा लिया.

नोएडा पुलिस ने विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ के सिलसिले में 11 FIR दर्ज की हैं. दिप्रिंट की जांच के मुताबिक, कम से कम 11 लोगों को अभी तक जमानत नहीं मिली है. इनमें कम से कम सात लोग 21 से 28 साल की उम्र के हैं. वे या तो डिग्री की पढ़ाई कर रहे हैं या अपना करियर शुरू कर रहे हैं.

‘एक-एक पैसा जोड़ना पड़ रहा है’

जब लाठीचार्ज का असर कम हुआ, तो अंशु ने देखा कि वह नोएडा के अलग-अलग हिस्सों से आए कई मजदूरों के बीच पुलिस कमिश्नरेट के थाने की एक सेल में बंद थे. उन्होंने कहा, “17 अप्रैल को मुझे अपने कई सहकर्मियों के साथ गौतम बुद्ध नगर जेल लाया गया.”

अंशु अपने परिवार में अकेले कमाने वाले थे. उन्होंने अपने परिवार का सहारा बनने के लिए हरदोई का घर छोड़ा था और साथ ही पढ़ाई जारी रखना चाहते थे. उन्होंने कहा, “हम सभी सिर्फ पढ़ाई करने में समय नहीं लगा सकते, इसलिए अपने बुजुर्ग माता-पिता की मदद करने के लिए मैं फरवरी में नौकरी की तलाश में नोएडा आया था.”

जब पहली तनख्वाह मिली, तो कटौती के बाद कुशवाहा के पास सिर्फ 12,000 रुपये बचे. उन्होंने बताया कि किराया, राशन और आने-जाने का खर्च देने के बाद घर भेजने के लिए उनके पास मुश्किल से कुछ बचता था.

मैं FIR नंबर 164 में उसकी जमानत के लिए आवेदन करने वाले चौथे वकील को रखने के लिए रिश्तेदारों और पड़ोसियों से छोटी-छोटी रकम उधार लेना शुरू कर चुका हूं.

— अंशु के पिता

उन्हें जेल में बंद हुए पांच महीने हो चुके हैं और पांच महीने से उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिली है.

अंशु के नाम तीन FIR हैं. इनके नंबर 164, 165 और 169 हैं. उन्हें 165 और 169 में जमानत मिल चुकी है, लेकिन FIR नंबर 164 में अभी जमानत नहीं मिली है.

FIR नंबर 165 और 169 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अलग-अलग धाराओं के तहत अंशु पर दंगा करने, हत्या की कोशिश, सरकारी कर्मचारी को जानबूझकर चोट पहुंचाने, चोट पहुंचाने के लिए घर में घुसने, गलत तरीके से किसी को बंद रखने, आपराधिक साजिश और आग या विस्फोटक से नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं.

इसके अलावा, उन पर BNS की उन धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया है जो गलत तरीके से रोकने, गलत तरीके से बंद रखने, चोट पहुंचाने के लिए घर में घुसने और शांति भंग करने के लिए जानबूझकर अपमान करने से जुड़ी हैं. इस FIR में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है.

दिप्रिंट से फोन पर बात करते हुए उनके पिता परमानंद कुशवाहा ने कहा कि वह अपने बेटे को जेल से बाहर निकालने के लिए एक-एक पैसा जोड़ रहे हैं. उन्होंने कहा, “मैं कई रिश्तेदारों और पड़ोसियों से छोटी-छोटी रकम उधार लेना शुरू कर चुका हूं, ताकि चौथे वकील को रख सकूं. वह FIR नंबर 164 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में अंशु की जमानत की अर्जी लगा सके.”

परमानंद ने यह भी कहा कि पहले वकील ने 10,000 रुपये लेने के बावजूद उनके बेटे के मामले पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे उनके कुछ पैसे बर्बाद हो गए. “इसके बाद दूसरे वकील ने सिर्फ एक जमानत के लिए 15,000 रुपये लिए और तीसरे वकील को अंशु की दूसरी FIR के लिए 14,000 रुपये देने पड़े.”

Infographics: Shruti Naithani/ThePrint
इन्फोग्राफिक्स: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

अंशु कुशवाहा ने कहा कि उनका परिवार ही अकेला ऐसा परिवार नहीं है जो वकील की फीस जुटाने के लिए परेशान है. उन्होंने कहा, “आकाश और भूपी को भी वकीलों की फीस देने में परेशानी हो रही थी, लेकिन अब उन्हें भी जमानत मिल गई है, क्योंकि उनके परिवारों ने कानूनी फीस भरने के लिए लोगों से मांगकर और कर्ज लेकर पैसे जुटाए.”

जमानत के लिए जमानती ढूंढना भी बड़ी मुश्किल

अंशु के पास एक कमजोर दिखने वाला आदमी खड़ा था, जिसने पांच महीने से अपने माता-पिता को नहीं देखा था. 28 साल के अमन सोनी ने सलाखों के पीछे से दिप्रिंट से कहा, “मेरे पिता को मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं हैं और मेरी मां बुजुर्ग हैं. वह कभी अकेले घर से बाहर नहीं निकली हैं. इसलिए पिछले पांच महीनों में मेरे बहनोई ही मुझसे मिलने वाले अकेले व्यक्ति हैं और वह भी सिर्फ एक बार.”

अमन पर भी उन्हीं तीन FIR में मामला दर्ज है. उन्होंने कहा, “मुझे FIR 164, 165 और 169 में जमानत मिल गई है, लेकिन मेरा परिवार पांच ऐसे लोगों का इंतजाम नहीं कर पा रहा है जो जमानती बनने के योग्य हों. इसी वजह से मैं अभी भी जेल में हूं.”

जमानती बॉन्ड एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसमें कोई तीसरा व्यक्ति, जैसे परिवार का सदस्य, दोस्त या नियोक्ता, कुछ पैसे या संपत्ति जमा करता है. अगर आरोपी फरार हो जाता है, तो यह पैसा या संपत्ति जब्त की जा सकती है.

मुझे FIR नंबर 164, 165 और 169 में ज़मानत मिल गई है, लेकिन मेरा परिवार ऐसे 5 लोगों का इंतिज़ाम नहीं कर पा रहा है जो ज़मानत देने के लिए योग्य हों, इसलिए मैं अभी भी जेल में हूं.

— 28 साल के अमन सोनी

अमन ने दिप्रिंट को बताया कि उत्तर प्रदेश के अमेठी में उनका परिवार तीन जमानती का इंतिज़ाम कर चुका है, लेकिन उन्हें रिहा कराने के लिए दो और लोगों की जरूरत है. उन्होंने कहा, “मैं ऐसे परिवार से आता हूं जिसके पास जमीन या संपत्ति नहीं है. इसलिए मेरे परिवार को उन तीन लोगों को ढूंढने में बहुत परेशानी हुई, जिनके पास मेरी जमानत के लिए संपत्ति थी. अब वे दो और लोगों को ढूंढ रहे हैं.”

अमन ने अक्टूबर 2025 में मदरसन इंटरनेशनल में नौकरी शुरू की थी, ITI का कोर्स पूरा करने के तुरंत बाद. उन्होंने कहा, “मदरसन की लखनऊ फैक्ट्री में आने से पहले मैं अमेठी में एक किराने की दुकान पर काम करता था. मैं हाल ही में नोएडा आया था और इसके छह महीने बाद ही जेल पहुंच गया.”

परिवार में अकेले कमाने वाले अमन को नहीं पता कि जेल की यह अवधि खत्म होने के बाद उनका क्या होगा. उन्होंने कहा, “मेरे साथ गिरफ्तार हुए कई मजदूरों ने कहा कि वे नौकरी के लिए दोबारा दिल्ली-NCR नहीं आएंगे. वे अपना छोटा कारोबार शुरू करेंगे या खेतों में मजदूरी करेंगे, लेकिन बड़े शहरों में नहीं आएंगे.”

लेकिन अमन के लिए यह विकल्प नहीं था. उन्होंने कहा, “मुझे नौकरी के लिए हर फैक्ट्री के दरवाजे पर जाकर काम मांगना पड़ेगा. कानूनी फीस की वजह से मेरा परिवार पहले ही कर्ज में डूब चुका है.”

Akriti Chaudhary at a protest. | Special arrangement
एक विरोध प्रदर्शन में आकृति चौधरी | विशेष व्यवस्था

अमन के बहनोई संजय सोनी ने फोन पर दिप्रिंट को बताया कि अमन की कानूनी फीस के लिए उन्हें 1.7 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा. “मैं उत्तराखंड में डेकोरेटर का काम करता हूं. मुझे अपनी थोड़ी-बहुत बचत निकालनी पड़ी और बाकी पैसे दोस्तों से उधार लेने पड़े, ताकि अमन की कानूनी फीस और नोएडा आने-जाने का खर्च दे सकूं. कई जमानतियों ने भी अपनी संपत्ति के कागजात देने के बदले कुछ पैसे मांगे.”

अमन हर दिन जेल अधिकारियों के अपने नाम पुकारने का इंतजार करते हैं. उन्होंने कहा, “जब भी वे मेरा नाम पुकारते हैं, मैं सांस रोककर इंतिजार करता हूं कि शायद अब वे कहेंगे कि मुझे रिहा किया जा रहा है.”

पुलिस की कार्रवाई का असर सिर्फ उन लोगों तक नहीं रहा जो फैक्ट्री में काम करने के लिए नोएडा आए थे. अभी भी जेल में बंद लोगों में युवा कार्यकर्ता और ग्रेजुएट भी हैं, जो आगे की पढ़ाई और करियर बना रहे थे.

जेल के डर और निराशा से आगे

जहां अंशु और अमन को दूसरे कैदियों के साथ रखा गया है, वहीं विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए कुछ अन्य लोगों को अकेले सेल में रखा गया है, क्योंकि उन्हें हाई रिस्क कैदी माना गया है.

अकेले सेल में बंद हिमांशु ठाकुर (24) और आकृति (25) ने दिप्रिंट को बताया कि मुश्किल समय के बावजूद उन्होंने उन कामों को करना बंद नहीं किया है, जिनकी उन्हें हमेशा परवाह रही है. वे पढ़ना, लिखना और लोगों को साथ जोड़ना जारी रखे हुए हैं.

हिमांशु और आकृति उन आठ कार्यकर्ताओं में शामिल हैं, जिन पर सभी 11 FIR में मामले दर्ज हैं. दोनों पर BNS की उन धाराओं के तहत मामले हैं जो हत्या की कोशिश, गलत तरीके से बंद रखने, नुकसान पहुंचाने, सरकारी कर्मचारी को गंभीर चोट पहुंचाने, खतरनाक हथियारों के साथ दंगा करने और आपराधिक धमकी देने से जुड़ी हैं.

Akriti Chaudhary in a classroom. | Special arrangement
कक्षा में आकृति चौधरी। | विशेष व्यवस्था

दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर 13 मई को सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था. 2 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस हिरासत के आधार की आलोचना की और राज्य की कहानी को “गढ़ी हुई कहानी” बताया. कोर्ट ने NSA का आदेश रद्द कर दिया. कोर्ट ने राज्य को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया, जिसे नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की सैलरी से वसूला जाना था. उन्होंने ही यह आदेश दिया. 23 सितंबर को अपील की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने NSA के आरोप को रद्द करने वाले फैसले पर रोक लगा दी, जबकि IAS अधिकारी रूप मंजूरी दी थी.

जिला मजिस्ट्रेट ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 23 सितंबर को अपील की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने NSA के आरोप को रद्द करने वाले फैसले पर रोक लगा दी, जबकि IAS अधिकारी रूपम पर लगाया गया जुर्माना हटा दिया.

Himanshu Thakur writes a protest slogan. | Special arrangement
हिमांशु ठाकुर विरोध का नारा लिखते हुए | विशेष व्यवस्था

इस बीच, आकृति को 11 में से छह FIR में अभी तक जमानत नहीं मिली है. इनमें FIR नंबर 169, 116, 117, 151 और 157 शामिल हैं, जिनमें उन पर हत्या की कोशिश, आपराधिक साजिश और गलत तरीके से बंद रखने सहित कई आरोप लगाए गए हैं.

‘अब मुझे उस चीज से डर नहीं लगता, जिससे वे मुझे डराना चाहते हैं’

आकृति ने दिप्रिंट को बताया कि अब उन्हें डर नहीं लगता, लेकिन उन्हें “FOMO” जरूर है.

उन्होंने कहा, “मुझसे मिलने आए दोस्तों से मुझे पता चला कि भारत के युवा NEET घोटालों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं. उस समय मुझे बहुत ज्यादा FOMO हुआ. हममें से ज्यादातर लोग इस मुद्दे का समर्थन करना और उनके साथ खड़ा होना चाहते थे.”

वह सितंबर में हुए DUSU चुनाव के दौरान भी मैदान में रहना चाहती थीं. उन्होंने कहा, “सलाखों के पीछे बिताए दिन आपको समाज की ऐसी बड़ी घटनाओं से दूर कर देते हैं.”

आकृति ने कहा कि उन्होंने जेल में अपने समय का अच्छे तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश की है. “हमने लाइब्रेरी की अलमारियों पर पेंट किया, वैन गॉग की Sunflower सीरीज को दोबारा बनाया और यहां महिला कैदियों के साथ महाभारत के कुछ हिस्सों पर चर्चा की.”

आकृति ने “पढ़ने के लिए बाकी” किताबों की एक लंबी सूची पूरी कर ली है. उन्होंने कहा कि उनके दोस्त उन्हें मजदूरों के अधिकार, मजदूर यूनियन बनाने और भारत में राजनीतिक आंदोलनों पर और किताबें लाकर देने के लिए काफी मदद कर रहे हैं.

इस बीच, उत्तराखंड के रहने वाले 24 साल के हिमांशु, जो हंसराज कॉलेज से इतिहास में ग्रेजुएट हैं, ने जेल में रहते हुए NET UGC की परीक्षा पास की. उन्होंने 99.3 पर्सेंटाइल हासिल किया और जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए योग्य हुए.

उनकी बहन नेहा ठाकुर ने कहा, “हमने परीक्षा के लिए जरूरी किताबें उन्हें भेजने की कोशिश की, लेकिन ऐसे समय में भी परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करना पूरी तरह उनकी अपनी मेहनत और दृढ़ता थी.” कानूनी सलाहकार की ओर से मजिस्ट्रेट से अनुमति मांगने के बाद नेहा को NET UGC परीक्षा में शामिल होने की अनुमति मिली थी. जेल अधिकारियों ने नेहा को परीक्षा केंद्र तक पहुंचाया और परीक्षा पूरी होने के बाद उन्हें वापस जेल ले आए.

उन्होंने बताया कि जब नोएडा पुलिस ने हिमांशु को इस मामले में गिरफ्तार किया और 11 FIR में उनका नाम डाला, तब वह दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में अपने PhD इंटरव्यू से सिर्फ कुछ दिन दूर थे. उन्होंने आगे कहा, “हिमांशु को आठ मामलों में जमानत मिल चुकी है और तीन अन्य लंबित मामलों में कोर्ट के फैसले का इंतजार है.”

जिन तीन FIR में हिमांशु को अभी जमानत नहीं मिली है, उनमें पुलिस ने BNS की उन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है जो हत्या की कोशिश, दंगा, हथियारों के साथ दंगा और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों से जुड़ी हैं.

उनके वकील कॉलिन गोंजाल्विस के मुताबिक, उनकी कानूनी टीम ने जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया है. गोंजाल्विस ने फोन पर दिप्रिंट को बताया, “हमारी कानूनी टीम FIR नंबर 149, 158 और 172 के संबंध में हिमांशु की जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में पहले ही आवेदन कर चुकी है. हमें उम्मीद है.”

हिमांशु पर्यावरण और मजदूरों के इतिहास पर रिसर्च करने में रुचि रखते हैं. फिलहाल, हालांकि, उनकी पढ़ाई से जुड़ी योजनाएं रुकी हुई हैं. लेकिन जेल में वह जो किताबें पढ़ रहे हैं, वे उस रिसर्च से जुड़ी हैं जिसे वह जेल से बाहर आने के बाद करना चाहते हैं.

उन्होंने कुछ नामों का उल्लेख किया, “मास्टर्स, सर्वेंट्स, और मजिस्ट्रेट – डगलस हे और पॉल क्रेवेन द्वारा, वर्किंग लाइव्स एंड वर्कर मिलिटेंसी: द पॉलिटिक्स ऑफ लेबर इन कोलोनियल इंडिया – रवि आहूजा द्वारा, द एवरीडे पॉलिटिक्स ऑफ लेबर: वर्किंग लाइव्स इन इंडियाज इनफॉर्मल इकोनॉमी – गीर्ट डी नेवे द्वारा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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