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Saturday, 26 September, 2026
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ज्ञानेश कुमार को हटाने का सवाल सिर्फ चुनाव आयोग का नहीं, बल्कि मोदी की छवि का भी है

हो सकता है कि मोदी सरकार ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए तैयार न हो, लेकिन विवाद को जारी रहने देने के अपने जोखिम हैं.

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मैं आपको चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए अनगिनत आरोपों को बार-बार दोहराकर बोर नहीं करना चाहता. इससे पहले कि द इंडियन एक्सप्रेस ने रितिका चोपड़ा की वह रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें चुनाव आयोग के अंदर मतभेदों का खुलासा हुआ, हममें से ज्यादातर लोग सोच चुके थे कि इस संवैधानिक संस्था के अंदर हालात कितने खराब हो चुके हैं.

अगस्त 2025 में, यानी एक साल से भी ज्यादा समय पहले, मैंने यहां लिखा था: “अब मैं ऐसे बहुत कम लोगों को जानता हूं जो हमारे मौजूदा चुनाव आयुक्तों की इज्जत करते हैं. खास तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देश के एक बड़े हिस्से का सम्मान खो दिया है.”

इस फरवरी में मैंने दिप्रिंट में ज्ञानेश कुमार के बारे में लिखा था: “आधुनिक भारत के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा आदमी नहीं रहा, जिसका सम्मान इतना कम हो और जिसे हमारे लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक संभालने का काम दिया गया हो.”

अगले महीने मैंने लिखा था कि अगर ज्ञानेश को वास्तव में चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता की चिंता है, तो उन्हें बढ़ती आलोचना के बीच इस्तीफा दे देना चाहिए, जिसमें उन पर पक्षपाती और एकतरफा होने के आरोप लगाए जा रहे हैं.

इसलिए मैं बार-बार वही बात दोहराकर ऐसा नहीं लगना चाहता जैसे मेरी रिकॉर्ड अटक गई हो. मैं यह नहीं दोहराऊंगा कि ज्ञानेश का पद पर बने रहना भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी शर्म की बात है. क्योंकि मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग यह पहले से जानते हैं. उनकी बेपरवाह और बेशर्म प्रतिक्रिया भी अब किसी को हैरान नहीं करती. हमें उनसे इससे बेहतर की उम्मीद ही नहीं है.

अब सिर्फ एक सवाल बचता है: आगे क्या होगा?

अगर ज्ञानेश पद पर बने रहते हैं तो क्या होगा?

एक जवाब तो साफ है. यह उम्मीद मत कीजिए कि कुमार खुद सम्मानजनक तरीके से इस्तीफा देंगे. एक सम्मानित व्यक्ति कहेगा: “मैं इस विवाद को और लंबा नहीं करना चाहता और भारतीय लोकतंत्र को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता, इसलिए मैं पद छोड़ दूंगा.”

वह यह भी कह सकते हैं: “हालांकि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है, लेकिन मेरा पद पर बने रहना लोगों के चुनावी व्यवस्था पर भरोसे को प्रभावित करेगा.”

सरकार उनका इस्तीफा स्वीकार कर सकती है और लंबे समय से सरकार के लिए एक भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में काम करने और अनुच्छेद 370 तथा राम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े सरकार के काम में शामिल रहने के लिए कुछ समय बाद उन्हें राजदूत बना सकती है. या फिर राज्यपाल भी बनाया जा सकता है, एक ऐसा पद जिसके लिए अब मानक बहुत नीचे गिर चुके हैं. इस बीच, ज्ञानेश की जगह एक और भरोसेमंद व्यक्ति को लाया जा सकता है.

लेकिन ऐसा नहीं लगता कि ज्ञानेश अपनी इच्छा से पद छोड़ेंगे. और मुझे नहीं लगता कि सरकार अभी उन्हें उनके कार्यालय से खींचकर बाहर निकालने के लिए तैयार है. इस समाधान के लिए उन्हें धक्का देकर बाहर करना पड़ेगा, क्योंकि वह खुद छलांग लगाकर बाहर नहीं जाएंगे.

सरकार उन्हें हटाने में इसलिए हिचकिचाएगी क्योंकि उसे ज्ञानेश से बहुत प्यार है या उसमें सख्ती की कमी है, ऐसा नहीं है. असली वजह यह है कि ज्ञानेश को हटाने से प्रधानमंत्री की छवि पर क्या असर पड़ेगा.

मोदी और UPA से मिली सीख

BJP में कोई भी व्यक्ति UPA के आखिरी दिनों से मिली सीख को नहीं भूला है. BJP को याद है कि जब विवाद बढ़ते गए, तो UPA ने प्रेस द्वारा निशाना बनाए गए लोगों को हटाने का फैसला किया. इसका नतीजा यह हुआ कि मनमोहन सिंह एक ऐसे कमजोर नेता के रूप में दिखाई दिए जो दबाव के आगे झुक जाते थे. और हर मंत्री को हटाने से प्रेस और विपक्ष की और लोगों को निशाना बनाने की भूख बढ़ती गई.

नरेंद्र मोदी नहीं चाहते कि उनकी सरकार के साथ ऐसा हो. जब से उन्होंने पद संभाला है, उन्होंने प्रेस के साथ तिरस्कार भरा व्यवहार किया है और दबाव के आगे झुकने से इनकार किया है.

इसी वजह से उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान को हटाने में इतना समय लगाया. प्रधान ने जुलाई 2026 में शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था, इसके बाद कि युवाओं के नेतृत्व में जंतर मंतर और दूसरी जगहों पर कई हफ्तों तक प्रदर्शन हुए थे.

नरेंद्र मोदी ने तभी कार्रवाई की जब जंतर मंतर के प्रदर्शन पूरे देश में फैलने का खतरा पैदा हो गया और उन्हें डर लगा कि वह युवाओं का समर्थन खो सकते हैं. हालांकि अब उन्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है. रिपोर्टों के मुताबिक, ज्ञानेश युवा मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करने में व्यस्त रहे हैं.

इसलिए अगर यह सरकार आखिरकार ज्ञानेश को हटा देती है, तो ऐसा सिर्फ इसलिए होगा क्योंकि मोदी के पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा होगा.

सरकार का हिसाब-किताब

तो अगर ज्ञानेश पद पर बने रहते हैं तो क्या होगा?

चुनावी व्यवस्था के उनके कथित दुरुपयोग का मुद्दा शायद खत्म नहीं होगा. प्रेस को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया किसी के नियंत्रण में नहीं है. और सरकार अब यह समझ रही है कि न्यूज चैनलों का भेड़ की तरह समर्थन और “सूत्रों” के नाम पर छपने वाली पहले से तैयार खबरों का जनता की राय पर असर लगातार कम होता जा रहा है.

जंतर मंतर के प्रदर्शनों के दौरान इससे कोई मदद नहीं मिली और चुनाव आयोग के बारे में सामने आ रहे खुलासों को लेकर जनता में बढ़ते गुस्से को शांत करने में भी इससे कोई मदद नहीं मिली है.

सरकार को उम्मीद है कि ज्ञानेश को हटाने की मांग करने वाले लोग थक जाएंगे. सरकार को लगता है कि एक हफ्ते के अंदर मीडिया के पास नई जानकारी या नए खुलासे खत्म हो जाएंगे. तब तक सरकार बाकी चुनाव आयुक्तों को संभाल सकती है और उन्हें कुछ भी नकारात्मक कहने से रोक सकती है.

सरकार को उम्मीद है कि लोग थक जाएंगे और ज्ञानेश की आलोचना उन्हें उबाऊ और बार-बार दोहराई जाने वाली लगेगी. जनता की दिलचस्पी खत्म हो जाएगी और सरकार कुछ दूसरी चीजों से लोगों का ध्यान भटका देगी.

अगर विपक्ष ज्ञानेश के खिलाफ फिर से महाभियोग प्रस्ताव भी लाता है, तो वह संसद के दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों पर भरोसा कर सकता है कि वे उसे भी दबा देंगे, जैसा कि उन्होंने पिछले प्रस्ताव के साथ किया था.

और अभी तक कम से कम, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जुड़े कई मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया है. इसलिए सरकार शायद कोर्ट की इस उदासीनता पर भी भरोसा कर सकती है.

यह तरीका काम कर सकता है, क्योंकि इस तरह की रणनीति पहले भी निश्चित रूप से काम कर चुकी है.

दिल्ली का SIR पूरा हिसाब बदल सकता है

आखिर में, हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जनता की राय क्या है. इस विवाद के इतना बढ़ने की एक वजह दिल्ली में SIR की प्रक्रिया को लेकर लोगों में गुस्सा है.

दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ वोटर हैं. इनमें से SIR की गिनती के दौरान करीब 47 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए. जो करीब 97 लाख वोटर ड्राफ्ट लिस्ट में बचे, उनमें से करीब 33 लाख लोगों को उनकी जानकारी में गड़बड़ी होने के कारण नोटिस भेजे गए.

जो लोग सालों से वोट देते आए हैं, अब उनसे कहा जा रहा है कि वे साबित करें कि उन्हें वोट देने का अधिकार है.

सिर्फ कोई बदमाश, मूर्ख या ज्ञानेश कुमार ही यह मान सकता है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर जनता में गुस्सा नहीं होगा.

मुझे लगता है कि सरकार में कोई न कोई ज्ञानेश से कहेगा कि इस गड़बड़ी को जल्दी ठीक करो. ऐसा होने के बाद सरकार उम्मीद करेगी कि मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर जनता का गुस्सा कम हो जाएगा और प्रदर्शन भी कम महत्वपूर्ण लगने लगेंगे.

क्या इस विवाद को काबू में किया जा सकता है?

क्या यह आकलन सही है?

समस्या का एक हिस्सा खुद ज्ञानेश हैं. हो सकता है कि निजी जिंदगी में वह बहुत अच्छे इंसान हों, लेकिन सार्वजनिक तौर पर उनका व्यवहार घमंडी, असंवेदनशील और बहुत नापसंद किया जाने वाला लगता है. उनकी सार्वजनिक छवि ऐसी है कि जब आप सुनते हैं कि वह चुनावी प्रक्रिया में दखल दे रहे हैं, तो किसी को भी इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल नहीं होती.

इसके अलावा, इन प्रदर्शनों और सरकार की ओर से ज्ञानेश के समर्थन के पीछे एक अनकहा एजेंडा आने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी है. यह चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होना है, और ज्ञानेश ने कहा है कि यह चुनाव तय समय पर ही होगा.

सरकार का मानना है कि अगर वह उत्तर प्रदेश में बड़े अंतर से जीतती है, तो वह इस धारणा को खत्म कर सकती है कि उसकी लोकप्रियता कम हो रही है. ज्ञानेश इस रणनीति में एक अहम व्यक्ति हो सकते हैं.

लेकिन अब, जब चुनाव आयोग के इरादों पर इतने सवाल उठ रहे हैं, तो अगर BJP उत्तर प्रदेश में जीत भी जाती है, तब भी उस जीत को शायद पहले जितना वैध नहीं माना जाएगा.

मुझे नहीं लगता कि सरकार ने अभी तय किया है कि उसे क्या करना है. शायद वह यह देखने का इंतजार करेगी कि जनता का गुस्सा बना रहता है या नहीं. अगर ज्ञानेश के खिलाफ लोगों की धारणा और मजबूत होती है, तो सरकार को उन्हें हटाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

लेकिन अगर सरकार इस विरोध को भी झेल जाती है, तब भी यह भावना दूर करना मुश्किल होगा कि इस सरकार के अच्छे दिन अब खत्म हो गए हैं. जब चीजें खराब होती हैं, तो संकट लगातार आते जाते रहते हैं.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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