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Friday, 25 September, 2026
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भारत को विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता घटानी होगी, मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार बढ़ाना होगा: CEA

'ऑफ द कफ' में एडिटर-इन-चीफ़ शेखर गुप्ता से बात करते हुए नागेश्वरन कहते हैं कि इम्पोर्टेड इनपुट पर निर्भरता के कारण अर्थव्यवस्था सप्लाई में रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो जाती है.

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नई दिल्ली: भारत को जरूरी चीजों, जैसे केमिकल, ऊर्जा और बेस मेटल्स के लिए विदेशी सप्लाई चेन पर अपनी निर्भरता तुरंत कम करने की जरूरत है. साथ ही, देश को मैन्युफैक्चरिंग और ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली सर्विसेज का विस्तार करना चाहिए, ताकि नौकरियां पैदा हो सकें. मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को मुंबई में दिप्रिंट के ऑफ द कफ कार्यक्रम में यह बात कही.

एडिटर-इन-चीफ शेखर गुप्ता से बात करते हुए नागेश्वरन ने कहा कि आयात किए जाने वाले सामान पर निर्भरता से अर्थव्यवस्था सप्लाई में रुकावट के प्रति कमजोर हो जाती है. खासकर तब, जब ये सामान कुछ ही स्रोतों से आते हों.

उन्होंने कहा, “जब आपके इम्पोर्ट का बड़ा हिस्सा इंटरमीडिएट या कैपिटल गुड्स होता है, तो ज़ाहिर है आप कमज़ोर होते हैं.” इंटरमीडिएट गुड्स वे इनपुट हैं जिनका इस्तेमाल दूसरे प्रोडक्ट बनाने में होता है, जबकि कैपिटल गुड्स में प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी और इक्विपमेंट शामिल हैं.

नागेश्वरन ने कहा कि यह कमजोरी सिर्फ केमिकल तक सीमित नहीं है. यह ऊर्जा और बेस मेटल्स तक भी फैली हुई है, जिनके लिए भारत अभी भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है. उन्होंने कहा, “कोई भी देश दूसरे देशों की सप्लाई चेन, उसके इस्तेमाल को हथियार की तरह करने की क्षमता और उन जगहों के कारण हमेशा कमजोर या निर्भर नहीं रह सकता, जो सप्लाई को रोक सकती हैं, चाहे बात बुनियादी सामान की ही क्यों न हो.”

उन्होंने कहा कि भारत को इस समस्या का समाधान “असाधारण तेजी और गंभीरता” के साथ करना होगा.

मैन्युफैक्चरिंग की भूमिका

नागेश्वरन ने कहा कि भारत का जवाब सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि हर आयात किए जाने वाले सामान को देश में ही बनाना शुरू कर दिया जाए. इसके बजाय, देश को या तो जरूरी चीजें खुद बनानी चाहिए, आयात के स्रोतों को अलग-अलग करना चाहिए, या दोनों तरीके अपनाने चाहिए. उन्होंने कहा, “हमें या तो खुद बनाना होगा, या अपने स्रोतों को अलग-अलग करना होगा, या दोनों का इस्तेमाल करना होगा.”

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भारत को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां वह इतनी महत्वपूर्ण क्षमता विकसित कर सके कि उसे वैश्विक सप्लाई चेन में रणनीतिक फायदा मिल सके. यह तरीका देश की रोजगार की समस्या से भी सीधे जुड़ा है. कार्यक्रम में एक प्रतिभागी ने अनुमान लगाया कि अगले 10-15 साल में करीब 150 मिलियन लोग काम करने वाली आबादी में शामिल हो सकते हैं. वहीं करीब 100 मिलियन लोग खेती से गैर-कृषि नौकरियों में जा सकते हैं और करीब 100 मिलियन महिलाएं संभावित रूप से काम करने वाली आबादी में शामिल हो सकती हैं.

नागेश्वरन ने कहा कि जुलाई 2024 के बजट में सरकार ने रोजगार पर ध्यान दिया था. इसमें इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, पहली बार नौकरी पाने वालों और कर्मचारियों के प्रोविडेंट फंड में सरकार की ओर से कुछ योगदान देने की तैयारी जैसे कदम शामिल थे. हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार खुद नौकरियों का मुख्य स्रोत नहीं हो सकती. उन्होंने कहा, “आखिरकार रोजगार का निर्माण निजी क्षेत्र में होता है, सरकार में नहीं.”

नागेश्वरन ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनी रहेगी, भले ही अर्थव्यवस्था में इसके हिस्से को लेकर सवाल उठते रहे हों. उन्होंने कहा कि gross value added यानी GVA में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा, जो अलग-अलग क्षेत्रों से पैदा होने वाली वैल्यू को दिखाता है, स्थिर कीमतों पर मापने पर मोटे तौर पर स्थिर रहा है.

मौजूदा कीमतों के आंकड़ों में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा कम होता हुआ दिखता है. इसकी एक वजह यह है कि कृषि की कीमतें ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं. वहीं मैन्युफैक्चरिंग को आयात से मुकाबला करना पड़ता है और उसकी कीमतों में आम तौर पर कम बढ़ोतरी होती है. उन्होंने कहा, “भारत में मैन्युफैक्चरिंग जिंदा है और पूरी ताकत से चल रही है.”

नागेश्वरन ने कहा कि भारत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे सकता है. ज्यादा विकसित राज्य सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोकेमिकल्स जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दे सकते हैं. वहीं दूसरे राज्य ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान दे सकते हैं.

उन्होंने कहा कि एग्रो-प्रोसेसिंग यानी कृषि उत्पादों को प्रोसेस करने के क्षेत्र में भी विस्तार की काफी गुंजाइश है. भारत अक्सर कच्चा माल दूसरे देशों को निर्यात करता है, जहां उसे प्रोसेस किया जाता है. देश में ही ज्यादा प्रोसेसिंग क्षमता बनाने से नौकरियां पैदा हो सकती हैं और इन उद्योगों के आसपास एक बड़ा इकोसिस्टम भी तैयार हो सकता है.

AI नौकरी के बाजार को बदल सकता है

सर्विसेज सेक्टर को भी लोगों को रोजगार देने में भूमिका निभानी होगी, खासकर ऐसे समय में जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों को बदल रहा है. नागेश्वरन ने कहा कि AI IT सेक्टर में शुरुआती स्तर की नौकरियों को प्रभावित कर सकता है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि इससे कुल उत्पादन कम होगा या नहीं.

रोजगार के लिए उन्होंने ऐसे क्षेत्रों की ओर इशारा किया जहां इंसानों के साथ सीधा संपर्क अभी भी जरूरी है. इनमें हॉस्पिटैलिटी, टूरिज्म, बुजुर्गों की देखभाल, खास जरूरत वाले बच्चों की देखभाल, फिजियोथेरेपी और स्पोर्ट्स कोचिंग शामिल हैं. उन्होंने कहा, “AI भारत को यह समझने के लिए मजबूर कर सकता है कि उसके पास सेवाओं और मैन्युफैक्चरिंग दोनों में बड़ी संख्या में लोगों की जो ताकत है, उसका इस्तेमाल कैसे किया जाए.”

इसका मतलब है कि रोजगार की चुनौती सिर्फ फैक्ट्रियों का उत्पादन बढ़ाने से ज्यादा बड़ी है. भारत को ऐसी मैन्युफैक्चरिंग, एग्रो-प्रोसेसिंग और सर्विसेज के मिश्रण की जरूरत होगी जो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दे सके और साथ ही ज्यादा वैल्यू वाली क्षमताएं भी विकसित कर सके.

FTA और भारतीय कंपनियां

नागेश्वरन ने रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग के मौकों को भारत के free trade agreements यानी FTAs से भी जोड़ा. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौता और यूरोप के साथ भारत का जुड़ाव ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले सामान और सेवाओं के लिए मौके खोल सकता है. लेकिन छोटी भारतीय कंपनियों को भी बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए जरूरी हिस्से बनाकर वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनना होगा.

उन्होंने कहा, “अगर आप रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनना चाहते हैं, तो आपको ऐसी चीज पहचाननी होगी जिसके बिना काम न चल सके और फिर उसे बनाना शुरू करना होगा.”

इससे भारतीय कंपनियों को उन कोशिशों से फायदा मिल सकता है जिनके तहत दुनिया की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में अलग-अलग देशों को शामिल कर रही हैं, ताकि वे किसी एक देश पर बहुत ज्यादा निर्भर न रहें. नागेश्वरन ने कहा कि यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग में भारत को अभी भी चीन से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है.

साथ ही, उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में हुई प्रगति का उदाहरण दिया. यह दिखाता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका बढ़ा सकती है. इसलिए चुनौती यह है कि ऐसे उद्योग बनाए जाएं जो नौकरियां पैदा कर सकें, निर्यात बढ़ा सकें और कमजोर सप्लाई चेन पर निर्भरता कम कर सकें.

नागेश्वरन ने कहा कि भारत को घरेलू उत्पादन को अलग-अलग स्रोतों से आयात करने की व्यवस्था के साथ जोड़ना चाहिए और उन क्षेत्रों में क्षमता विकसित करनी चाहिए जहां वह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन सकता है. इससे सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है और साथ ही मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और रोजगार के नए मौके पैदा हो सकते हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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