मजाज़ लखनवी को मशहूर शख्सियत बनने के लिए मौत का इंतज़ार नहीं करना पड़ा. उन्हें यह पहचान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ही मिल गई थी. सभी शायरों के शायर के तौर पर उन्होंने 1936 में ही अपने विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखा था, जिसका नाम ‘नज़्र-ए-अलीगढ़’ था. आज भी छात्र इसे गाते हैं. यह गीत आम तौर पर अलीगढ़ तराना के नाम से जाना जाता है.
मशहूर सांस्कृतिक पॉडकास्टर परवेज़ आलम ने मजाज़ के जादू का कुछ इस तरह बयां किया: “उनके दौर में अलीगढ़ में पढ़ने वाले छात्रों और बाद में आने वालों के लिए मजाज़ किसी खुदा से कम नहीं थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि उन्होंने शायरी और प्यार से भरी ज़िंदगी जी और उनकी मौत भी इसी जुनून के साथ हुई.”
यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दिनों में लखनवी की लोकप्रियता इतनी थी कि मुस्लिम पर्दा प्रथा को ध्यान में रखते हुए, जिन छात्राओं को वह पर्दे के पीछे से पढ़ाते थे, वे उनके फोटो को अपने तकिए के नीचे रखकर सोती थीं. वे यह तय करने के लिए उनके नाम की पर्चियां भी निकालती थीं कि वह किसके हैं.
ज्यादा रूढ़िवादी सोच वाली युवा छात्राएं कहती थीं कि शादी के बाद वे अपने बेटे का नाम ‘मजाज़’ रखेंगी. उनके चाहने वालों की दीवानगी ऐसी थी!
अलीगढ़ की शान
लखनवी का जन्म ब्रिटिश भारत के आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के अयोध्या जिले के रुदौली गांव में हुआ था. यह इलाका अब उत्तर प्रदेश में है. उनका परिवार मध्यम दर्जे का ज़मीन का मालिक था. परिवार बहुत अमीर नहीं था, लेकिन उसमें गंगा-जमुनी तहजीब थी. यह उत्तर भारत की मिली-जुली संस्कृति है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम साथ रहते हैं. यह भावना परिवार में कई पीढ़ियों तक बनी रही.
उनके छोटे भाई अंसार हरवानी स्वतंत्रता सेनानी, छात्र नेता और सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी थे. आज़ादी के बाद अंसारी तीन बार सांसद बने. लखनवी, लेखिका सफिया के बड़े भाई थे. सफिया की शादी शायर जां निसार अख्तर से हुई थी. उनके बच्चे लेखिका जावेद अख्तर और शायर व मनोविश्लेषक सलमान अख्तर थे. लखनवी के भतीजे और अंसार हरवानी के बेटे गायक नासिर हरवानी हैं. आज़ादी की लड़ाई, साहित्य और कला उनके बड़े परिवार के लिए बहुत अहम थे.
मजाज़ लखनवी की शायरी की विरासत आज भी हमारे लिए गर्व की बात है, लेकिन उनकी शोहरत के चरम पर हुई दुखद मौत का दुख हमेशा इस विरासत के साथ जुड़ा रहेगा. उनकी मौत सिर्फ 44 साल की उम्र में सर्दियों की एक ठंडी रात को हुई.
मजाज़ अपने माता-पिता के बहुत लाडले बेटे थे. उनके जन्म से पहले माता-पिता ने अपने दो छोटे बेटों को खो दिया था. इसी वजह से उनकी मां उनकी ज़रूरत से ज्यादा देखभाल करती थीं और उन्हें बचाकर रखती थीं. उन्हें देर रात तक पढ़ना और लिखना पसंद था, इसलिए वे रात में जागने वाले इंसान बन गए. इसी वजह से उनकी बहनों ने उनका नाम ‘जग्गन भैया’ रख दिया.
उनके पिता सरकारी नौकरी में थे और उनकी तैनाती आगरा में थी. इसी वजह से मजाज़ ने 1929 में आगरा से स्कूल की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने वहीं सेंट जॉन्स इंटरमीडिएट कॉलेज में दाखिला लिया. उस समय उनका सपना इंजीनियर बनने का था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. शायरी उनका इंतज़ार कर रही थी और उसने उन्हें खुली बाहों से अपना लिया.
उन्होंने आगरा में कॉलेज के दिनों में शायरी करना शुरू किया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद इसे बहुत ऊंचाइयों तक पहुंचाया. अलीगढ़ में ही उनका संपर्क फैज अहमद फैज, फानी बदायूंनी, मखदूम मोहिउद्दीन, साहिर लुधियानवी और इस्मत चुगताई जैसे बड़े शायरों और लेखकों से हुआ. लखनवी की पहली किताब, जिसका नाम ‘आहंग’ (धुन) था, 1938 में छपी. इसकी प्रस्तावना खुद फैज अहमद फैज ने लिखी थी.
चुगताई ने कहा, “नई पीढ़ी ने उनकी शायरी को अपनाया और उसे अपने दिलों में धड़कते हुए महसूस किया.” इस पहली किताब में उनकी कुछ सबसे मशहूर गजलें भी थीं. इनमें ‘ऐ गम-ए-दिल क्या करूं’ भी शामिल थी. बाद में इस गजल को तलत महमूद ने फिल्म ‘ठोकर’ (1953) में गाया था.
अलीगढ़ से लखनवी नई दिल्ली आ गए और ऑल इंडिया रेडियो में बतौर अनाउंसर काम करने लगे. वह उर्दू पत्रिका ‘आवाज़’ के संपादकों में से एक भी थे. दिल्ली में उनका समय एक प्रेम प्रसंग में दिल टूटने के बाद जल्दी खत्म हो गया. वह इस दुख से कभी उबर नहीं पाए और शराब में डूब गए. उन्हें एक खूबसूरत और पढ़ी-लिखी, ऊंचे तबके की महिला से बेइंतहा मोहब्बत हो गई थी. वह महिला पहले से शादीशुदा थीं. वह भी उनके प्यार का जवाब देती थीं, लेकिन उनके साथ रहने के लिए अपना आरामदायक घर छोड़ने को तैयार नहीं थीं.
इस्मत चुगताई ने मुझसे कहा, “हमारे सबसे अच्छे शायरों के साथ समस्या यह है कि वे अपने ही तबके की किसी महिला से शादी करके संतुष्ट नहीं होते. मजाज़ के साथ भी ऐसा ही था.”
लखनवी की मौत 5 दिसंबर 1955 को हुई. वह लखनऊ की एक शराबखाने में अपने दोस्तों के साथ शराब पीने गए थे. उस समय उन्होंने सिर्फ सफेद चिकनकारी का कुर्ता पहना हुआ था. उनके दोस्त घर लौट गए, लेकिन वह छत पर ही सो गए. अगली सुबह वह मृत पाए गए.
यह एक ऐसी दुखद घटना थी, जिसका दुख आज तक उनके परिवार, दोस्तों और चाहने वालों को है. भारत सरकार ने उनकी याद में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया. प्यार और क्रांति पर लिखने वाले सबसे बड़े शायरों में से एक लखनवी को उर्दू शायरी का जॉन कीट्स भी कहा जाता है. उनके भांजे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. मां की मौत के बाद दोनों ने अपना बचपन अपने नाना-नानी के घर में अपने मामू मजाज़ के साथ बिताया था.
जावेद अख्तर के मुताबिक, लखनवी उन्हें सिर्फ शायरी नहीं सिखाते थे, बल्कि उनके साथ क्रिकेट भी खेलते थे. हाल के वर्षों में सलमान अख्तर ने शायर की विरासत को याद करने के लिए दिल्ली और लंदन में कार्यक्रम आयोजित किए हैं. लखनवी के भांजे नासिर हरवानी ने उनकी ‘कमाल-ए-इश्क है’ और दूसरी रचनाएं गाईं. शायर दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी शायरी आज भी जिंदा है.
निरुपमा दत्त लेखिका, कवयित्री और पत्रकार हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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