श्रीनगर: इस महीने चार दिनों तक श्रीनगर के INOX मल्टीप्लेक्स और शेर-ए-कश्मीर कंवेन्शन सेंटर में सीट पाने के लिए दर्शकों की भीड़ लगी रही. ‘तसरुफदार’ और ‘बट्ट कोच’ जैसी कश्मीरी फिल्मों को देखने के लिए हॉल दर्शकों से भरे रहे. जम्मू-कश्मीर के फिल्म निर्माताओं की बनाई पांच फिल्मों में से तीन ने जम्मू-कश्मीर के पहले इंचरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ जम्मू एंड कश्मीर 2026 (IFFJK) में पुरस्कार जीते.
एक ऐसे इलाके के लिए, जिसे दशकों तक बाहरी लोग कैमरे में कैद करते रहे हैं, कश्मीर अब कुछ अलग करने की कोशिश कर रहा है: अपने बारे में, अपने लोगों के लिए फिल्में बनाना. तीन दशकों से ज्यादा समय तक संघर्ष, कर्फ्यू और सांस्कृतिक गतिविधियों पर रोक के दौर से बाहर निकलते हुए, कश्मीर में स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री धीरे-धीरे आकार ले रही है. स्थानीय फिल्म निर्माता, कलाकार और फिल्म क्रू इस एरिया में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. स्थानीय स्तर पर टैलेंट और कहानियों की कमी नहीं है, लेकिन बिखरी हुई फिल्मों को एक टिकाऊ इंडस्ट्री में बदलने के लिए जिस पोस्ट-प्रोडक्शन क्षमता की ज़रूरत है, वह अभी भी कम है. साथ ही, यह भी जरूरी है कि इंडस्ट्री पूरी तरह बॉलीवुड की मशीनरी पर निर्भर न रहे.
अभिनेता मीर सरवर ने कहा, “मुझे लगता है कि कश्मीर के सिनेमा को ज्यादा इंडेपेंडेंट फिल्मों की ज़रूरत है. हम काम के लिए बाहर क्यों देखते हैं? कोई ऑफिस फिल्में नहीं बनाता, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग बनाते हैं. कश्मीर के पास लोग हैं, चाहे वे अभिनेता हों, निर्माता हों, फिल्म निर्माता हों या संगीतकार. यह सब मिलकर काम करने की बात है.”
मीर सरवर का दावा है कि कम से कम 90 प्रतिशत फ्रीलांस कश्मीरी फिल्म मेकर्स ने उनके साथ अपनी पहली फिल्म बनाई है. उन्होंने कहा, “एक फिल्म इंडस्ट्री का पूरा माहौल बनाने के लिए लोगों को भरोसा दिखाना होगा और जोखिम लेना होगा. हम फिल्म सिटी बनने का इंतजार करके फिल्में नहीं बना सकते. हम फिल्में बनाएंगे, ताकि फिल्म सिटी बन सके.”

दशकों से कश्मीर हिंदी सिनेमा के पसंदीदा शूटिंग बैकग्राउंड में से एक रहा है. इसकी घास के मैदान, झीलें और पहाड़ ‘कश्मीर की कली’ और ‘जब-जब फूल खिले’ से लेकर ‘बजरंगी भाईजान’, ‘हैदर’ और ‘राज़ी’ तक फिल्मों के पर्दे पर नज़र आते रहे हैं.
लेकिन जब कश्मीरियों ने खुद कहानी में अपनी जगह बनाई, तो यह इलाका अक्सर राजनीति और संघर्ष तक सीमित कर दिया गया. अब स्थानीय फिल्म मेकर्स कैमरे का रुख बदलने की कोशिश कर रहे हैं. वे अपनी कहानियां खुद बताना चाहते हैं और ऐसी कहानियां सामने ला रहे हैं जो सिर्फ कश्मीर की खूबसूरती और राजनीति तक सीमित नहीं हैं. इनमें घर छोड़ने का दर्द, कश्मीरी पंडितों और कश्मीरी मुसलमानों के बीच संबंध, प्रेम कहानियां, रोजमर्रा की जिंदगी और यहां तक कि कॉमेडी भी शामिल है.
लेकिन जम्मू-कश्मीर की फिल्म इंडस्ट्री अभी भी छोटी है और इसके बारे में आंकड़े भी बहुत कम हैं. पिछले पांच साल में कश्मीर में बनी कुछ ही फीचर फिल्में सामने आई हैं. इनमें ‘वेलकम टू कश्मीर’ (2023) शामिल है, जिसे कथित तौर पर करीब 5 करोड़ रुपये के बजट में बनाया गया था. इसके अलावा ‘हर्मुख’ (2025) है, जो कश्मीरी-कन्नड़ क्रॉसओवर फिल्म है. इनके साथ कुछ स्वतंत्र शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री भी बनी हैं.
ज्यादातर कश्मीरी फिल्में कुछ ही सिनेमाघरों में रिलीज़ होती हैं, इसलिए इनके बॉक्स ऑफिस के भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. उदाहरण के लिए, ‘वेलकम टू कश्मीर’ के बारे में बताया गया था कि श्रीनगर के INOX में वीकेंड पर इसके शो हाउसफुल रहे, लेकिन इसकी आधिकारिक कमाई के आंकड़े जारी नहीं किए गए.

अब जब जम्मू-कश्मीर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आयोजित हुआ है, तो कश्मीरी सिनेमा को लेकर चर्चा फिर शुरू हो गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह उत्साह उस बुनियादी ढांचे, प्रतिभा और पैसे में बदल पाएगा, जो एक फिल्म इंडस्ट्री को लंबे समय तक चलाने के लिए जरूरी है.
फिल्म की शूटिंग अपने आप में समस्या नहीं है. फिल्म निर्माता दानिश रेंज़ू ने बताया कि उनकी फिल्म ‘सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइज़’ की पूरी शूटिंग कश्मीर में हुई थी. इसमें सबा आज़ाद को छोड़कर स्थानीय कलाकारों और क्रू ने काम किया था, लेकिन फिल्म का पोस्ट-प्रोडक्शन फिर भी मुंबई से करवाना पड़ा.
दानिश रेंज़ू ने कहा, “मेरी नज़र में सबसे बड़ी समस्या एजुकेशन की कमी है. यहां के यंग्सटर्स टैलेंटेड हैं, लेकिन उन्हें सही दिशा नहीं मिल रही है. कश्मीर में फिल्म मेकिंग को अभी भी बड़े स्तर पर एक अच्छे करियर के रूप में नहीं देखा जाता. यूनिवर्सिटीज में आर्ट्स के कोर्स हैं, लेकिन फिल्म निर्देशन या प्रोडक्शन जैसे खास क्षेत्रों की पढ़ाई के लिए बहुत कम विकल्प हैं. इसलिए बच्चों को पता नहीं होता कि उन्हें किस दिशा में काम करना चाहिए.”
अंधेरे दौर से ‘नई सुबह’ तक
घाटी का आखिरी चल रहा सिनेमा हॉल 1999 में बंद हो गया था, जब कश्मीर में उग्रवाद तेज़ी से पैर पसार रहा था. इसके बाद दो दशकों से ज्यादा समय तक बड़े पर्दे पर फिल्म देखना लगभग संभव ही नहीं था. सितंबर 2022 में यह बदला, जब INOX ने श्रीनगर में अपना पहला मल्टीप्लेक्स खोला. ‘लाल सिंह चड्ढा’ की स्क्रीनिंग के साथ 23 साल बाद पहली बार घाटी में सिनेमा फिर लौटा.
इसी मल्टीप्लेक्स में बाद में ‘वेलकम टू कश्मीर’ (2023), ‘हर्मुख’ (2025), ‘शुशुर–द फ्रॉज़न टाइम्स’ और ‘तसरुफदार’ जैसी कश्मीरी फिल्में भी दिखाई गईं. ये फिल्में बॉलीवुड, टॉलीवुड या यहां तक कि पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के हिसाब से बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट नहीं थीं, लेकिन हर फिल्म एक छोटी-सी पहली शुरुआत थी: कश्मीरी कहानी, कश्मीरी पैसे से बनी, कश्मीरी कलाकारों के साथ और कश्मीरी दर्शकों के लिए एक थिएटर में दिखाई गई. पांच साल पहले ऐसा कोई फिल्म सर्किट मौजूद नहीं था.

फिल्म निर्माता कैप्टन राहुल बली, जिन्होंने ‘लव इन वियतनाम’ को सपोर्ट किया था और जिसकी कुछ शूटिंग जम्मू में हुई थी, मौजूदा समय की तुलना “एक नई सुबह” से करते हैं.
बली ने कहा, “वह अंधेरे का दौर था और अब मुझे नई सुबह दिखाई दे रही है. मैं 1995 से 1998 की बात कर रहा हूं. कश्मीर के लिए वह बहुत, बहुत बुरा दौर था. अब हम उस सिनेमा को फिर बना रहे हैं, जो संघर्ष से पहले यहां हुआ करता था. हम शम्मी कपूर या राजेश खन्ना के दौर वाले कश्मीर को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं और फिर उसे सिर्फ खूबसूरत नजारों से आगे ले जाना चाहते हैं.”
बली ने 1995 से 2000 तक भारतीय सेना में सेवा की थी. उन्होंने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि इसे देखकर कई और फिल्म निर्माता यहां आएंगे.”
नवंबर 2022 में बली ने भारतीय सेना की उत्तरी कमांड की ओर से आयोजित शॉर्ट-फिल्म फेस्टिवल ‘दिल मांगे मोर’ का आयोजन किया था. इसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से 15,000 एंट्री आई थीं.
अगर मैं आपको एक चुटकुला सुनाऊं तो आप हंसेंगे. अगर मैं वही चुटकुला दोबारा सुनाऊं तो शायद आप फिर हंसें, लेकिन अगर मैं वही चुटकुला तीसरी बार सुनाऊं, तो आपको गुस्सा आएगा. जब हम एक ही चुटकुले पर बार-बार नहीं हंस सकते, तो हम एक ही समस्या पर बार-बार क्यों रोते रहें? जो हुआ वह बुरा था. हम रोए. अब आगे बढ़ते हैं और अब सकारात्मक हिस्से को देखते हैं
— राहुल बली, फिल्म मेकर
उन्होंने कहा, “दिलचस्प बात यह थी कि जमा की गई 15,000 शॉर्ट फिल्मों में से एक भी किसी नकारात्मक विषय पर नहीं थी. कहानी कहने की क्षमता और नज़रिया मौजूद था, बस उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत थी.”
बली अब इस फेस्टिवल का दूसरा एडिशन आयोजित करने की योजना बना रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि इसमें 50,000 एंट्री आएंगी. उन्होंने माना कि अप्रैल 2025 में हुआ पहलगाम हमला कश्मीर में फिल्म निर्माण के लिए एक झटका था, लेकिन उन्होंने ऐसी घटनाओं को “अस्थायी रुकावट” बताया.
उन्होंने कहा, “जब भी कश्मीर में कुछ होता है, टीआरपी के लिए उसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जिससे डर पैदा होता है. इससे सभी के लिए आसानी से पैसा बनता है. मैं बस इतना कहूंगा, ‘जहां जख्म नहीं है, वहां उसे मत कुरेदिए.’”
बली ने कहा कि वह ऐसी परियोजनाओं से बचते हैं, जिनमें किसी समुदाय को नकारात्मक तरीके से दिखाया जाए या अतीत के दर्द का इस्तेमाल किया जाए.
शम्मी कपूर का डल लेक के पानी के किनारे ‘तारीफ करूं क्या उसकी’ गाना लोकप्रिय लोगों की कल्पना में कश्मीर की रोमांटिक छवि बनाने में मददगार रहा. इसके बाद यश चोपड़ा ने घाटी को बॉलीवुड का स्विट्जरलैंड बना दिया. दशकों तक पर्दे पर कश्मीर का मतलब प्यार रहा.

इसके बाद संघर्ष, विस्थापन और राजनीति के साल आए. 2015 से 2025 के बीच कम से कम 15 चर्चित फिल्मों ने इसी दौर और विषयों को अपनी कहानी का हिस्सा बनाया. इनमें ‘फितूर’ (2016), ‘हाफ विडो’ (2017), ‘हामिद’ (2018), ‘राज़ी’ (2018), ‘नॉ फादर्स इन कश्मीर’ (2019), ‘शिकारा (2020), ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और ‘आर्टिकल 370’ (2024) शामिल हैं. इस तरह की इससे पहले की एक फिल्म ‘हैदर (2014)’ थी.
लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के अंदर अब यह सोच बढ़ रही है कि कश्मीर को पर्दे पर सिर्फ दुख और उग्रवाद के जरिए नहीं दिखाया जा सकता.
बली ने कहा, “कोई भी उनसे वह दर्द नहीं छीन रहा है. ज़ाहिर है, जिन लोगों ने बुरा दौर देखा है, उनके लिए यह आसान नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि अब हमें आगे बढ़ना चाहिए.”
वह चाहते हैं कि ऐसी और फिल्में बनें, जो कश्मीर की संस्कृति, कला, रोजमर्रा की ज़िंदगी, प्यार और कश्मीरी मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के बीच रिश्ते को भी दिखाएं.
उन्होंने कहा, “अगर मैं आपको एक चुटकुला सुनाऊं तो आप हंसेंगे. अगर मैं वही चुटकुला दोबारा सुनाऊं तो शायद आप फिर हंसें. लेकिन अगर मैं वही चुटकुला तीसरी बार सुनाऊं, तो आपको गुस्सा आएगा. जब हम एक ही चुटकुले पर बार-बार नहीं हंस सकते, तो हम एक ही समस्या पर बार-बार क्यों रोते रहें? जो हुआ वह बुरा था. हम रोए. अब आगे बढ़ते हैं और अब सकारात्मक हिस्से को देखते हैं.”

क्या फिल्म निर्माता आगे बढ़ सकते हैं?
फिल्म निर्माता कपिल मट्टू के लिए आगे बढ़ने का मतलब ज़रूरी नहीं है कि अतीत को पीछे छोड़ देना. उनकी शॉर्ट फिल्म ‘तसरुफदार’, जिसका प्रीमियर IFFJK में हुआ, एक अधेड़ उम्र के कश्मीरी मुस्लिम की कहानी है. वह अपने दिवंगत पिता के बचपन के दोस्त शंभू नाथ की आत्मा से मिलता है, जो एक कश्मीरी पंडित थे.
मट्टू ने कहा, “वह दर्द मौजूद है. वह हमेशा रहेगा. मैं मानता हूं कि कश्मीर सिर्फ संघर्ष और खूबसूरत नज़ारों से कहीं ज्यादा है, लेकिन जहां तक उस दर्द की बात है, वह भी मौजूद है और वह हमारी रचनात्मकता में भी दिखाई देगा.”
“वह दर्द मौजूद है. वह हमेशा रहेगा. मैं मानता हूं कि कश्मीर सिर्फ संघर्ष और खूबसूरत नजारों से कहीं ज्यादा है. लेकिन जहां तक उस दर्द की बात है, वह भी मौजूद है और वह हमारी रचनात्मकता में भी दिखाई देगा.”
— कपिल मट्टू, फिल्म मेकर
फेस्टिवल में दिखाई गई जम्मू-कश्मीर की एक और फिल्म ‘बट्ट कोच’ भी गुस्से के बजाय यादों और खोने के दर्द के जरिए कश्मीर को देखती है. इसमें पोश्कर नाथ कौल (एमके रैना) की कहानी है, जो जम्मू में रहने वाले एक बुजुर्ग कश्मीरी पंडित हैं.
अपनी पत्नी की मौत के बाद और याददाश्त कमजोर होने के बीच वह 35 साल में पहली बार कश्मीर में अपने पुश्तैनी घर लौटते हैं. यह उनका पलायन के बाद पहली बार वहां जाना है. फिल्म दुख, विस्थापन, पहचान और अपने मन को शांति देने की तलाश को दिखाती है. इसमें बदला और गुस्सा दिखाने से बचा गया है.

लेकिन इस फेस्टिवल ने पर्दे पर कश्मीर को दिखाने की एक और संभावना भी सामने रखी. खास मेहमान के तौर पर फेस्टिवल में शामिल हुए फिल्म मेकर इम्तियाज़ अली और श्रीराम राघवन ने कहा कि वे घाटी से ज्यादा कॉमेडी, पारिवारिक ड्रामा और रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियां देखना चाहते हैं.
रेंज़ू ने कहा, “हम कश्मीरी लोग बहुत मजाकिया होते हैं. इसलिए कश्मीर में बनी कॉमेडी दिलचस्प होगी.” उन्होंने बताया कि अपनी आने वाली फिल्म में वह कुछ ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे हैं.
सरकार की पहल
सरकार ने भी इस बढ़ती रफ्तार के साथ कदम मिलाने की कोशिश की है. जम्मू-कश्मीर फिल्म पॉलिसी, जिसे पहली बार 2021 में बनाया गया था और 2024 में अपडेट किया गया, इसमें फिल्मों की शूटिंग के लिए सब्सिडी और सिंगल-विंडो मंजूरी की व्यवस्था की गई. यही एक बड़ी वजह है कि बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मों की शूटिंग फिर से बड़ी संख्या में घाटी में होने लगी है.
अधिकारियों का कहना है कि इस नीति के लागू होने के बाद पांच साल में जम्मू-कश्मीर में 350 से ज्यादा फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग हुई. इनमें ‘डंकी’, ‘आर्टिकल 370’, ‘वेदा’ और ‘लिओ’ शामिल हैं.
हम सभी बैठकर शिकायत कर सकते हैं, लेकिन हमें खुद भी जिम्मेदारी लेनी होगी. हम सरकार के फिल्म सिटी बनाने का इंतज़ार करके नहीं बैठ सकते
— मीर सरवर, एक्टर
फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के लोगों से कैमरा उठाकर अपनी कहानियां खुद बताने की अपील की. उन्होंने बाहर के फिल्म निर्माताओं से भी कहा कि वे कश्मीर के जाने-पहचाने खूबसूरत इलाकों से आगे देखें और यहां की असली कहानियों और जमीन से जुड़ी हकीकत को समझें.
IFFJK के उद्घाटन समारोह में अब्दुल्ला ने कहा, “हमारी कहानियां खोजिए. हमारे लोगों की बात सुनिए, हमारे संगीतकारों की बात सुनिए, शहर की गलियों से गुजरिए और इस जमीन की जीवंत संस्कृति को अपनी कहानियों में शामिल होने दीजिए.”

जो सितारे बाहर गए और वापस लौटे
जब मीर सरवर एक्टर बनने के लिए मुंबई गए, तो उन्हें रातोंरात सफलता नहीं मिली. वह बताते हैं कि उन्हें सिर्फ ब्लैक कॉफी और दिन में एक बार खाना खाकर गुजारा करना पड़ा. सरवर अपनी बेटी के जन्म के समय भी वहां नहीं पहुंच सके.
उन्होंने कहा, “ज़िंदगी में कुछ हासिल करने के लिए आपको यही कीमत चुकानी पड़ती है.”
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से ट्रेनिंग लेने वाले सरवर 2014 में मुंबई गए थे. वहां उन्हें ‘बजरंगी भाईजान’,‘केसरी’ और ‘जॉली एलएलबी-2’ जैसी फिल्मों में काम मिला. आज वह बॉलीवुड में एक जाना-पहचाना नाम हैं, लेकिन स्थानीय फिल्म निर्माताओं को बढ़ावा देने के लिए वह कश्मीरी फिल्मों और प्रोडक्शंस में भी काम करते रहते हैं, और कई बार इसके लिए फीस भी नहीं लेते.
सरवर ने कहा, “मेरा मानना है, ‘अगर हम हरकत नहीं करेंगे तो बरकत नहीं होगी.’
फिल्म ‘कश्मीर डेली’ इसका उदाहरण है.” 2017 में बनी इस फिल्म को “छोटे बजट” में बनाया गया था. सरवर ने इसमें “स्पॉट बॉय से लेकर प्रोड्यूसर तक” का काम किया. उन्होंने पत्रकार हुस्सैन दुर्रानी की भूमिका भी निभाई.

सरवर ने कहा, “फिल्म बनाने में हमें तीन साल लगे और हमने एक आम DSLR कैमरे का इस्तेमाल किया. हमारे पास पैसे नहीं थे. किसी को पैसे नहीं मिले. फिल्म बनी और Eros को कम रकम में बेच दी गई. यह लोगों के देखने के लिए उपलब्ध है और इसे हमेशा याद रखा जाएगा. इसलिए हम सभी बैठकर शिकायत कर सकते हैं, लेकिन हमें खुद भी जिम्मेदारी लेनी होगी. हम सरकार के फिल्म सिटी बनाने का इंतजार करके नहीं बैठ सकते.”
यह धारणा काफी आम है कि कश्मीरी महिलाओं के लिए फिल्मों में काम करने का सपना पूरा करना संभव नहीं है, लेकिन फरहाना भट्ट और सादिया खतीब जैसी अभिनेत्रियां इसे गलत साबित कर रही हैं.
भदरवाह में जन्मी सादिया खतीब ने विधु विनोद चोपड़ा की ‘शिकारा’ (2020) से फिल्मी करियर शुरू किया. इसमें उन्होंने उग्रवाद और पलायन के दौरान एक कश्मीरी पंडित किशोरी का किरदार निभाया. इस भूमिका के लिए उन्हें Filmfare Best Female Debut के लिए नामांकन मिला. इसके बाद उन्होंने ‘रक्षा बंधन’ और ‘द डिप्लोमैट’ जैसी फिल्मों में काम किया.

पिछले कई वर्षों में जम्मू-कश्मीर ने बॉलीवुड को मोहित रैना, कुणाल खेमू, मानव कौल, हिना खान, संजय सूरी और अली गोनी जैसे कलाकार दिए हैं.
इसके अलावा श्रीनगर में जन्मी अभिनेत्री ज़ायरा वसीम भी हैं, जिन्होंने दंगल में बेटियों में से एक की भूमिका निभाकर पहचान बनाई और बाद में ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में मुख्य भूमिका निभाई. उन्होंने 2019 में अभिनय छोड़ दिया.
रेंज़ू भी इस पीढ़ी की उस कहानी का उदाहरण हैं, जिसमें लोग बाहर गए, पढ़ाई की और फिर वापस लौटे. उन्होंने UCLA में स्क्रीनराइटिंग की पढ़ाई की. 2015 में उन्होंने AT&T की कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर फिल्में बनाने का फैसला किया और श्रीनगर लौट आए.
उन्होंने ‘हाफ विडो’(2017) का निर्देशन किया. यह उन महिलाओं की कहानी थी, जिनके पति उग्रवाद के दौरान लापता हो गए थे. इसकी शूटिंग ज्यादातर स्थानीय कलाकारों और क्रू के साथ हुई थी. इनमें अभिनेत्री नीलोफर हामिद भी शामिल थीं.

उन्होंने रेंज़ू म्यूजिक नाम का एक म्यूजिक लेबल भी शुरू किया. इसका मकसद कश्मीरी, बाल्टी और पहाड़ी भाषाओं के संगीत को हिंदी और अंग्रेजी रिलीज के साथ मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचाना है.
इसके कलाकारों में नूर मोहम्मद, हुजैफ नज़र, मसरत उन निसा और दुहा शाह शामिल हैं. इसकी शुरुआती रिलीज़ में कश्मीरी संगीतकारों को शंकर महादेवन, सोनू निगम और अली सेठी जैसे स्थापित कलाकारों के साथ जोड़ा गया.
इश्फाक कावा जैसे गायकों ने भी कश्मीरी भाषा के अपने बनाए हुए संगीत के जरिए यूट्यूब पर बड़ी संख्या में दर्शक बनाए हैं. स्थानीय स्तर पर उन्हें कभी-कभी अरिजीत सिंह और ब्रायन एडम्स के बीच का मेल भी बताया जाता है. इनमें से कई कलाकारों ने कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली और न ही किसी म्यूजिक लेबल के साथ काम किया.
रसिक इम्तियाज खान के कश्मीरी गाने ‘Lolan’ को देश के सबसे बड़े म्यूजिक लेबलों में से एक ज़ी म्यूजिक पर जगह मिली.
रेंज़ू ने कहा, “कश्मीर के संगीत में भारत के लोगों से जुड़ने की क्षमता है. मैंने अपने शो ‘सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइज़’ में कश्मीरी गानों को रखने पर खास ध्यान दिया, क्योंकि अगर इनका अनुवाद किया जाता तो इनका मतलब खो जाता. गाने Dil Tsooran को पूरे भारत से इतना प्यार मिला, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी. लेकिन यह संगीत सभी लोगों से जुड़ गया.”
उन्होंने कहा, “इससे मुझे भरोसा मिला कि कश्मीरी संगीत पूरे भारत के दर्शकों तक पहुंच सकता है.”
एक और फिल्म निर्माता, जिन्होंने पहचान, संघर्ष, विस्थापन, धर्म और इंसानी पीड़ा जैसी कहानियों को भारतीय स्वतंत्र सिनेमा तक पहुंचाया है, वह हैं राहत काज़मी.
निर्देशक, लेखक और निर्माता के तौर पर उनके काम में ‘मंटोस्तान’, ‘रब्बी’, ‘मिलियन डॉलर नोमैड’, ‘साइड ए एंड साइड बी’, ‘साइनाइड’, ‘कंट्री ऑफ ब्लाइंड’ और ‘लिहाफ: द क्विल्ट’ शामिल हैं.

काज़मी ने 2017 में ‘मंटोस्तान’ से निर्देशन की शुरुआत की. उन्होंने बताया कि उनके पास पैसे नहीं थे और रघुबीर यादव और वीरेंद्र सक्सेना जैसे कलाकार बिना फीस के फिल्म से जुड़े. फिल्म की शूटिंग 5D कैमरे से हुई.
उन्होंने कहा कि उनका मकसद सिर्फ फिल्म बनाना था. उस समय पुरस्कार जीतना या किसी बड़े फिल्म फेस्टिवल में फिल्म का सफल होना उनके दिमाग में नहीं था.
उन्होंने कहा, “फिल्म बनाने के छह महीने बाद हम Cannes में थे. इसे नेटफ्लिक्स ने खरीद लिया. UK Asian Film Festival और BAFTA जैसे प्लेटफॉर्म ने हमारी फिल्म को पहचान दी और पुरस्कार भी दिए. यह फिल्म कुछ लाख रुपये में बनी थी और इसने उससे दस गुना ज्यादा कमाई की.”
काज़मी “स्थानीय कहानियां, वैश्विक दर्शकों के लिए” के विचार का मजबूती से समर्थन करते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म इंडस्ट्री बढ़ रही है, लेकिन समाज को भी बदलना होगा और ज्यादा कश्मीरी युवाओं को बाहर जाकर काम करने की इजाजत देनी होगी.
उन्होंने कहा, “हमारी संस्कृति और हमारे परिवार हमें बाहर जाने नहीं देते. क्योंकि हमें बताया जाता है कि यह हमारे लिए नहीं है. यहां अगर कोई लड़की बैंड शुरू करती है, तो उसे बैन कर दिया जाता है.”
काज़मी ने कहा कि कश्मीर ईरान से सीख सकता है, जिसने बड़े फिल्म निर्माता, कलाकार और खिलाड़ी दिए हैं.
उन्होंने कहा, “यह एक मुस्लिम देश है और वहां युद्ध और दूसरी मुश्किलें चल रही हैं, लेकिन उन्होंने जिस तरह की प्रतिभाएं पैदा की हैं…अमेरिका भी उनकी फिल्मों से प्रभावित है. वे ऑस्कर जीतते हैं. क्यों? क्योंकि उन्होंने अपनी प्रतिभा को खत्म नहीं होने दिया.”
आगे क्या?
कश्मीर की फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के लिए घाटी को तुरंत दो चीज़ों की ज़रूरत है: एक फिल्म स्कूल और पोस्ट-प्रोडक्शन की सुविधाएं. फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुए कलाकारों और फिल्म निर्माताओं के बीच यही सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रहा.
रेंज़ू ने कहा, “कश्मीर में एक भी ऐसा फिल्म स्कूल नहीं है, जो खास तौर पर फिल्मों की पढ़ाई के लिए बना हो.”
स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए सरकार की तरफ से कोई नियमित ग्रांट नहीं है, स्क्रीनराइटिंग की पढ़ाई या प्रशिक्षण के लिए कोई रेजिडेंसी नहीं है, प्रोफेशनल पोस्ट-प्रोडक्शन हाउस नहीं हैं. यहां तक कि कैमरा और साउंड के जरूरी सामान को स्थानीय स्तर पर किराए पर लेना भी मुश्किल हो सकता है.
फिल्म बनाने को लेकर गंभीर ज्यादातर युवा कश्मीरियों को ट्रेनिंग के लिए घाटी छोड़कर मुंबई, दिल्ली या विदेश के संस्थानों में जाना पड़ा है. इससे फिल्म बनाना उन लोगों के लिए ज्यादा आसान हो जाता है, जो बाहर जाकर ट्रेनिंग लेने और फिर वापस आने का खर्च उठा सकते हैं.

रेंज़ू ने कहा, “सरकार को स्थानीय फिल्म निर्माताओं की मदद करनी चाहिए और उनका हाथ पकड़कर उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि वे अपनी कहानियां बता सकें. सरकार को ऐसे लोगों और संस्थानों को तैयार करना चाहिए, जो आने वाली प्रतिभाओं को मार्गदर्शन दे सकें. यहां तीन से चार साल तक मार्गदर्शन की जरूरत है.”
उन्होंने कहा, “उन्हें अपने काम और कला पर मेहनत करनी होगी. उनका काम खुद अपनी पहचान बनाए. यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें J&K के लोग सुधार कर सकते हैं.”
रेंज़ू जैसे फिल्म मेकर्स अपनी फिल्मों की करीब 80 प्रतिशत शूटिंग कश्मीर में करते हैं. मेकअप और कॉस्ट्यूम से लेकर लाइन प्रोडक्शन तक अलग-अलग विभागों में स्थानीय लोग जिम्मेदारी संभालते हैं. लेकिन पोस्ट-प्रोडक्शन की बात आती है तो उन्हें भी मुंबई का रुख करना पड़ता है.
आज जो सुविधाएं मौजूद हैं, उनमें ज्यादातर छोटे स्तर की हैं. स्थानीय डायरेक्टरी में श्रीनगर में कुछ प्रोडक्शन हाउस दर्ज हैं, जिनमें राजबाग का राइज प्रोडक्शन केएमआर और सुलेखा तथा जस्टडायल पर मौजूद कुछ अन्य नाम शामिल हैं.
इनमें से ज्यादातर शादी की वीडियो शूटिंग, इवेंट कवरेज और सामान्य एडिटिंग जैसी सेवाएं देते हैं. फिल्मों के पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए जरूरी कलर ग्रेडिंग, साउंड डिजाइन या विजुअल इफेक्ट्स जैसी खास सुविधाएं आम तौर पर उपलब्ध नहीं हैं.
Trisna Films जैसी लाइन-प्रोडक्शन और फिक्सर कंपनियां जम्मू-कश्मीर में बाहर से आने वाले फिल्म क्रू के लिए अपनी सेवाओं में पोस्ट-प्रोडक्शन का काम भी बताती हैं. लेकिन फिल्म निर्माताओं का कहना है कि ऐसी सेवाएं प्रिमियर, अविड और फाइनल कट जैसे एडिटिंग सॉफ्टवेयर की उपलब्धता तक ही सीमित हैं.
यह ऐसी पूरी पोस्ट-प्रोडक्शन स्टूडियो सुविधा नहीं है, जहां कलर ग्रेडिंग, साउंड डिजाइन और विजुअल इफेक्ट्स की पूरी व्यवस्था हो.
सरवर ने कहा, “मैं कहूंगा कि यहां कुछ प्रतिनिधित्व है, लेकिन ज्यादा से ज्यादा एक-दो स्टूडियो हैं. ये स्टूडियो भी पूरी तरह फिल्मों के लिए नहीं हैं. अगर सही पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाओं वाले और फिल्म स्टूडियो बनें, तो इससे पूरी फिल्म इंडस्ट्री को मजबूत किया जा सकता है…और फिर कश्मीर में फिल्म सिटी का सपना भी दूर की बात नहीं रहेगा.”
सरकार ने भी इस कमी को माना है. IFFJK में मुख्यमंत्री ने ने कहा कि प्रशासन पूरे जम्मू-कश्मीर में पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाओं, उपकरण बैंकों, स्टूडियो और फिल्म शिक्षा संस्थानों में निवेश करने की योजना बना रहा है.
उन्होंने कहा कि लक्ष्य एक “पूरी तरह से शुरू से आखिर तक काम करने वाला फिल्म निर्माण का पूरा सिस्टम” तैयार करना है. यानी इस क्षेत्र को सिर्फ फिल्मों की शूटिंग की जगह के तौर पर नहीं देखा जाएगा.
उन्होंने यह भी कहा कि जिन फिल्मों में स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और क्रू को काम दिया जाएगा, उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिलेगी.
मुख्यमंत्री ने कहा, “हमारे लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह एक आधिकारिक इंडस्ट्री है.”
रेंज़ू ने फिल्म फेस्टिवल को “एक शानदार पहल” बताया.
उन्होंने कहा, “मैं इसे एक शुरुआत और आगे बढ़ने के लिए एक कदम के तौर पर देखता हूं. हमारा सिनेमा बढ़ रहा है. हालांकि अभी यह पूरी तरह से क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री जैसा नहीं है, लेकिन यह उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है.”
उन्होंने कहा, “यह फिल्म फेस्टिवल शानदार है, लेकिन हमें लगातार यह सवाल पूछते रहना होगा: ‘आगे क्या?’”
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