श्रीनगर: कश्मीर के घुमंतू चरवाहों के बकरवाल समुदाय में एक लड़की को स्कूल भेजना भी एक तरह की लग्जरी माना जाता है. इसलिए जब 2014 में नाजिया बीबी ने शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहनकर खो-खो खेलना शुरू किया, तो लोग तरह-तरह की बातें करने लगे. यह किसी को सोचने में भी नहीं आता था.
आज वह राष्ट्रीय स्तर की खो-खो चैंपियन हैं. 2025 में अपनी टीम के साथ खो-खो वर्ल्ड कप जीतने के बाद, वह ऐसा करने वाली जम्मू-कश्मीर की पहली मुस्लिम महिला बनीं. नाजिया बीबी अब बड़े और खूबसूरत सपने को जी रही हैं, भले ही कश्मीर अभी इस बदलाव के साथ कदम मिलाने में पीछे रह गया है.
इस गर्व और लगातार कोशिश के पीछे एक दर्द भी है, जो उन्हें परेशान करता रहता है.
23 साल की नाजिया बीबी ने दिप्रिंट से कहा, “खो-खो वर्ल्ड कप जीतना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हर महीने बीतने के साथ यह जीत फीकी लगने लगी है. हमारी जीत को एक साल से ज्यादा हो गया है, लेकिन मुझे जम्मू-कश्मीर सरकार से अभी तक एक रुपया भी नहीं मिला है.”
जम्मू-कश्मीर में क्रिकेट और फुटबॉल के मुकाबले खो-खो लंबे समय तक पीछे रहा है. जम्मू-कश्मीर ने क्रिकेट में परवेज रसूल, अब्दुल समद और औकिब नबी जैसे क्षेत्रीय सितारे और फुटबॉल में मेहराजुद्दीन वाडू, अब्दुल मजीद काकरो और इशफाक अहमद जैसे खिलाड़ी दिए हैं. लेकिन जनवरी 2025 में पहला वर्ल्ड कप होने के साथ खो-खो अचानक चर्चा में आ गया. इसमें अटैकर नाजिया बीबी भी विजेता टीम का हिस्सा थीं. वह केंद्र शासित प्रदेश से भारत के लिए खो-खो खेलने वाली पहली मुस्लिम आदिवासी खिलाड़ी बनीं.

लेकिन उनकी जीत के बाद जो हुआ, वह उनकी उम्मीद की गई खुशी और सम्मान से काफी अलग रहा. दूसरे राज्यों की उनकी वर्ल्ड कप विजेता साथी खिलाड़ियों को लाखों, यहां तक कि करोड़ों रुपये के इनाम मिले. वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने सिर्फ 40,000 रुपये देने का ऐलान किया. एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह पैसा उनके खाते में नहीं आया है.
हम चाहते हैं कि नाजिया जम्मू-कश्मीर में एक आइकन बनें.
सुधांशु मित्तल, खो-खो फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष
उन्होंने कहा, “क्या राज्य सरकार किसी वर्ल्ड कप विजेता के साथ ऐसा व्यवहार करती है? मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है. ये 40,000 रुपये कुछ नहीं, बल्कि एक अपमान हैं.” श्रीनगर में डल झील के पास एक कैफे में ट्रैक पैंट पहने नाजिया बीबी ने यह बात कही. सालों तक बाहर ट्रेनिंग करने की वजह से उनके गालों पर धूप से त्वचा को नुकसान साफ दिखाई दे रहा था. उन्होंने कहा, “क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं मुस्लिम महिला हूं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं बकरवाल समुदाय से हूं? अगर सत्ता में बैठे लोग यहां खेलों को बढ़ावा देने की योजना इसी तरह बनाएंगे, तो यह कभी काम नहीं करेगा.”
अब नाजिया बीबी पहले कॉमनवेल्थ खो-खो चैंपियनशिप के शुरू होने का इंतजार कर रही हैं. यह टूर्नामेंट पहले मार्च 2026 में कश्मीर में होना था, लेकिन अब इसे दिसंबर के आखिरी हफ्ते तक टाल दिया गया है और जगह भी बदलकर हरियाणा कर दी गई है. भारतीय टीम के खिलाड़ियों के नाम अभी घोषित नहीं हुए हैं और नाजिया बीबी को उम्मीद है कि उनका नाम टीम में होगा.
‘वह लड़की’ कहने का मतलब बदल गया
जब भी नाजिया बीबी का नाम आता है, कोच मोहम्मद ताहिर गर्व से भर जाते हैं. पिछले तीन साल से वह उनके अनौपचारिक ट्रेनर हैं. वह खुद भी जम्मू-कश्मीर के लिए चैंपियनशिप में खो-खो खेल चुके हैं. उन्होंने बाकी लोगों से बहुत पहले नाजिया की क्षमता पहचान ली थी.
उन्होंने कहा, “हम दोनों ग्रीन फील्ड गांधी नगर में प्रैक्टिस करते थे. मैंने उसे इसलिए नोटिस किया क्योंकि वह जल्दी आ जाती थी और देर तक अकेले ट्रेनिंग करती थी. मैंने बस उसकी मदद करना शुरू किया क्योंकि उसमें इतनी लगन थी.”
ऐसे दिन भी थे जब मैं बहुत रोती थी. मेरी उम्र की लड़कियों में इतनी ताकत होना आम बात नहीं थी. लोग अक्सर कहते थे, ‘वह बकरी का दूध पीती है’, इसलिए उसमें इतनी ताकत है.
नाजिया बीबी
खेल उनके लिए खुद को साबित करने का तरीका बन गया. यह उन छात्रों के खिलाफ उनका हथियार था जो गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल, बाजार कासाबान में उन्हें चिढ़ाते और ताने देते थे. वहां बकरवाल समुदाय के बहुत कम छात्र थे, इसलिए उन्हें निशाना बनाना आसान था. वह बताती हैं कि उन्हें “नीची जाति”, “गंदे दिखने वाले लोग”, “सुंदर नहीं” जैसे नामों से बुलाया जाता था.
नाजिया बीबी ने कहा, “जब भी कोई खेल प्रतियोगिता आने वाली होती थी, मेरे शिक्षक मुझसे कहते थे कि अपना गुस्सा वहां निकालो और खुद को साबित करो. मैं लंबी कूद, रिले रेस, फुटबॉल, हर खेल में सबसे अच्छी खिलाड़ी बनने लगी. मैंने अपने स्कूल के लिए राज्य स्तर तक खेला है. एक समय के बाद, किसी भी खेल की बात हो, मेरा नाम हमेशा उसमें होता था.”
शुरुआत में उनकी खेल क्षमता भी लोगों के तानों का कारण बन गई.
नाजिया बीबी ने कहा, “ऐसे दिन थे जब मैं बहुत रोती थी. मेरी उम्र की लड़कियों में इतनी ताकत होना आम नहीं था. लोग अक्सर कहते थे, ‘वह बकरी का दूध पीती है’, इसलिए उसमें इतनी ताकत है.” नाजिया बीबी अभी भी थोड़ी शर्मीली हैं और लोगों से घुलने-मिलने में उन्हें थोड़ा समय लगता है.

लेकिन उन्होंने कभी इन बातों को खुद को कमजोर नहीं करने दिया. इसके बजाय, हर ताना उनके लिए एक ईंट बन गया. उन्होंने इन बातों के नीचे दबने के बजाय इन्हीं से खुद को मजबूत बनाया.
उन्हें पांचवीं कक्षा में स्कूल में पहली बार खो-खो से परिचित कराया गया था. लेकिन दौड़ना उनका पहला प्यार था. हालांकि, उन्होंने जिन दूसरे खेलों को आजमाया, उनके मुकाबले खो-खो के लिए जम्मू-कश्मीर में एक व्यवस्थित व्यवस्था थी. जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग जिलों से 400 तक छात्र अनौपचारिक टूर्नामेंट में हिस्सा लेने आते थे और खिलाड़ियों की मदद के लिए एक खो-खो एसोसिएशन भी था. दौड़ के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी.
उन्होंने कहा, “मुझे दौड़ में कोई खास भविष्य नजर नहीं आया, क्योंकि हमें ट्रेनिंग देने के लिए कोई कोच नहीं थे, जो हमें इस दिशा में तैयार करते कि हम राष्ट्रीय स्तर पर खेल सकें. खो-खो में मैं अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का सपना देख सकती थी.”
लेकिन दूसरे छात्र ही अकेली समस्या नहीं थे. उनके माता-पिता जम्मू के नगरोटा में बस गए थे. उनके दादा-दादी की तरह वे जम्मू और कश्मीर के बीच मौसम के हिसाब से घूमकर पशु चराने वाली जिंदगी नहीं जीते थे. लेकिन फिर भी उनका परिवार एक पारंपरिक दुनिया में रहता था. उनके पिता भेड़ और बकरियों का कारोबार करते हैं और लड़कियों को आम तौर पर आगे की पढ़ाई या करियर बनाने की इजाजत कम ही मिलती है.

जब नाजिया बीबी मैदान पर एक लड़ाई लड़ रही थीं, तो उनके माता-पिता मैदान के बाहर दूसरी लड़ाई लड़ रहे थे. उन्हें सवालों और लोगों की बातों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने नाजिया को इन सब से बचाकर रखा.
जब वह मैच खेलने के लिए बाहर जाने लगीं, तो पड़ोसी परिवार को ताने देते थे. वे कहते थे, “आपने अपनी लड़की को दिल्ली भेज दिया, पता नहीं वह वहां क्या करेगी.”
ताहिर को याद है कि नाजिया बीबी शुरू में वर्ल्ड कप के लिए आवेदन तक करने में हिचक रही थीं. उन्होंने जम्मू-कश्मीर के बाहर की दुनिया कभी नहीं देखी थी और इतना बड़ा कदम उनके लिए डराने वाला था.
उन्होंने कहा, “मैं अपने हर कदम और फैसले को लेकर बहुत सोचती हूं क्योंकि मेरे माता-पिता मुझे वह सब करने दे रहे हैं जो मैं करना चाहती हूं. मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहती. इसलिए कोई फैसला लेने से पहले मैं दो-तीन बार सोचती हूं.”
2024 में जम्मू-कश्मीर से चार खिलाड़ियों, दो लड़कों और दो लड़कियों को राष्ट्रीय कैंप के लिए चुना गया था. इनमें से सिर्फ एक खिलाड़ी को अंतिम टीम में जगह मिलनी थी.
ताहिर ने कहा, “मैंने उससे कहा कि खुद पर ध्यान दो और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहो. लोग तुम्हें नीचे खींचने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे, हमें उनसे ऊपर उठना होगा. एक लड़की ने जम्मू-कश्मीर की इमेज बना दी. वह हमेशा ‘वह लड़की’ रहेगी जिसने जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व किया.”
इनाम और अफवाहें
जब बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन की रंजना सरनिया ने 2023 एशियन खो-खो चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया, तो वह असम में एक “आइकन” बन गईं. यह बात खो-खो फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सुधांशु मित्तल ने कही. वह चाहते हैं कि नाजिया बीबी भी जम्मू-कश्मीर के लिए ऐसा ही करें.
मित्तल ने कहा, “सरनिया की सफलता से वहां के युवाओं में नई ऊर्जा आई. हम चाहते हैं कि नाजिया जम्मू-कश्मीर में एक आइकन बनें.”
मित्तल यह भी मानते हैं कि वर्ल्ड कप जीतने के बावजूद नाजिया बीबी को नजरअंदाज किया गया है. उन्होंने उन्हें केंद्र सरकार की ओर से सभी वर्ल्ड कप विजेताओं को दिए जाने वाले 30 लाख रुपये के इनाम का भरोसा दिया है.
उन्होंने कहा, “नाजिया समेत नौ खिलाड़ियों ने फॉर्म नहीं भरा था. हम अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं और उन्हें वह पैसा दिला रहे हैं जिसकी वह हकदार हैं.”

नाजिया बीबी कहती हैं कि उन्हें अपने केंद्र शासित प्रदेश की सरकार से ज्यादा मित्तल के वादे पर भरोसा है. वह यह भी कहती हैं कि उन्हें खो-खो सर्किट में एक बुरी अफवाह का सामना करना पड़ा. अफवाह यह थी कि राष्ट्रीय टीम में उनका चयन उनकी प्रतिभा के आधार पर नहीं हुआ, बल्कि किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए उन्हें “राजनीतिक कोटा” के तहत टीम में लिया गया.
मित्तल और भारत की महिला खो-खो टीम के मुख्य कोच सुमित भाटिया, दोनों ने इस दावे को साफ तौर पर खारिज किया. मित्तल के मुताबिक, टीम का चयन 70-30 की नीति के तहत होता है. 70 प्रतिशत जगह मेरिट के आधार पर दी जाती हैं, जबकि बाकी 30 प्रतिशत उन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए होती हैं, जो सही मार्गदर्शन मिलने पर शीर्ष स्तर के खिलाड़ी बन सकते हैं. यह टीम की वर्तमान क्षमता और उसके भविष्य के बीच जानबूझकर रखा गया संतुलन है.
मित्तल ने कहा, “नाजिया में वह क्षमता थी. यह गलत धारणा है कि उनके धर्म या जाति की इसमें कोई भूमिका थी.”
‘भगवान ने दी रफ्तार’
2025 वर्ल्ड कप से पहले दिल्ली में हुए पहले चयन कैंप में जब नाजिया बीबी पहुंचीं, तो कोच भाटिया को उनसे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी. लेकिन 60 खिलाड़ियों में उन्होंने फिटनेस और ट्रेनिंग के टेस्ट में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. शुरुआत में भाटिया ने इसे सिर्फ संयोग माना.
भाटिया ने कहा, “फिर हमने दो-तीन और प्रदर्शन टेस्ट किए और हमने देखा कि वह अभी भी सबसे ऊपर थी. वह बहुत प्रतिभाशाली है. उसका आत्मविश्वास और उसकी लगन, यह अपने आप में हैरान करने वाली थी.”
खो-खो जैसे खेल में रफ्तार, फुर्ती, रणनीति और स्टैमिना की जरूरत होती है. भाटिया कहते हैं कि नाजिया बीबी की सबसे अलग खासियत उनकी रफ्तार है. वह कई तरह की भूमिकाएं भी निभा सकती हैं.
[नाजिया] हर काम उतनी ही सटीकता से कर सकती थीं. आप उन्हें किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं कर सकते थे. उनकी रफ्तार भगवान की देन है और उन्होंने हमारी टीम के लिए खुद को बेहद उपयोगी साबित किया.
-सुमित भाटिया, चीफ कोच, भारत की महिला खो-खो टीम
आमतौर पर 15 खिलाड़ियों की खो-खो टीम अटैकर्स, डिफेंडर्स और वजीरों के आसपास बनाई जाती है. नाजिया बीबी अलग-अलग भूमिकाओं के बीच आसानी से बदल सकती थीं.
उन्होंने कहा, “वह हर काम उतनी ही सटीकता से कर सकती थीं. आप उन्हें किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं कर सकते थे. उनकी रफ्तार भगवान की देन है और उन्होंने हमारी टीम के लिए खुद को बेहद उपयोगी साबित किया.”
कैंप में 60 खिलाड़ी थे, जो नौ या दस राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. इनमें से सिर्फ 15 खिलाड़ी टीम में चुने गए. जम्मू-कश्मीर से इस सूची में अकेला नाम नाजिया बीबी का था.

लेकिन नाजिया के लिए राष्ट्रीय कैंप डराने वाला था. अचानक वह देश की सबसे अच्छी खिलाड़ियों के बीच टीम में जगह बनाने के लिए मुकाबला कर रही थीं.
नाजिया बीबी ने कहा, “मुझमें आत्मविश्वास की कमी थी. मुझे पता था कि ये पूरे भारत के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से हैं. और हर कोई बहुत अच्छा था, इसलिए आप अपनी जगह को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगते हैं.” वह अक्सर बैठकर दूसरे खिलाड़ियों को खेलते हुए देखती थीं और उनके खेल और उनके व्यवहार को समझती थीं.
लेकिन जब टेस्ट शुरू हुए, तो उन्होंने सारी बातों को, यहां तक कि अपने खुद के डर को भी, पीछे छोड़ दिया और अच्छा प्रदर्शन किया.
खो-खो के मैदान पर एक धावक के तौर पर बिताए उनके सालों का उन्हें फायदा मिला. नाजिया बीबी अपनी रफ्तार, तेजी से दिशा बदलने और मैदान पर अचानक तेज दौड़ लगाने पर निर्भर करती हैं.
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सेमीफाइनल में वह शुरुआती भारतीय अटैकर्स में थीं, जिन्हें शुरुआती टर्न के दौरान पकड़ लिया गया था. इसके बाद चैत्रा बी ने हमला जारी रखा और पांच अंकों की ड्रीम रन बनाई. भारत ने आखिरकार यह मैच 66-16 से जीत लिया.
नाजिया बीबी ने कहा, “जब भी मैं भारत के लिए खेली, मैंने अपनी कमियों को अपने प्रदर्शन के रास्ते में नहीं आने दिया. मेरे लिए हर मुकाबला करो या मरो जैसा था.”
हालांकि वह मुख्य रूप से अटैकर हैं, लेकिन वह सिर्फ एक भूमिका तक सीमित नहीं हैं. वर्ल्ड कप में उन्होंने डिफेंस की जिम्मेदारी भी संभाली. उनकी ताकत उनकी एथलेटिक क्षमता है. यानी खेल के बदलते हालात के हिसाब से तेजी पकड़ना, दिशा बदलना और जल्दी प्रतिक्रिया देना.
भाटिया ने कहा कि राष्ट्रीय कैंप के चयन से यह तय होगा कि कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप की टीम में कौन जगह बनाएगा.
उन्होंने कहा, “अगर नाजिया कैंप के लिए चुनी जाती हैं, तो वह निश्चित रूप से टीम में जगह बनाएंगी.”
मिट्टी या मैट
नाजिया बीबी की मुश्किलें सिर्फ जाति और पहचान तक सीमित नहीं थीं. सुविधाओं की कमी भी उनके लिए उतनी ही बड़ी और लगातार बनी रहने वाली समस्या रही है.
खो-खो की परेशानियां वही हैं, जिनका सामना जम्मू-कश्मीर के लगभग हर खेल ने सालों से किया है. लगातार आने वाली सरकारों ने खेलों की सुविधाओं को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी, जबकि प्रशासनिक व्यवस्था के कमजोर होने और बार-बार राजनीतिक बदलाव ने लंबे समय की योजनाओं को लगातार नुकसान पहुंचाया.
कुछ साल पहले, जम्मू-कश्मीर हैंडबॉल एसोसिएशन ने बताया था कि जम्मू में उसके नियमित ट्रेनिंग सेंटर तीन से घटकर एक रह गए हैं. क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी कई सालों तक जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन की खराब हालत को लेकर लगातार शिकायत की, जब तक कि 2021 में BCCI ने इसकी जिम्मेदारी नहीं संभाल ली. इसके बाद पिछले साल रणजी ट्रॉफी में जीत मिली.

खो-खो भी इस समस्या से बच नहीं पाया है. पूरे इलाके में इस खेल के लिए सिर्फ एक मैट वाला मैदान है. यह जम्मू के गांधी नगर में ग्रीन फील्ड में है. बाकी हर जगह मिट्टी यानी साधारण कच्चे मैदानों से ही काम चलाया जाता है. इसका ट्रेनिंग और प्रदर्शन पर सीधा असर पड़ता है.
पहले खो-खो आमतौर पर मिट्टी पर खेला जाता था, लेकिन पिछले दस साल में बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में सिंथेटिक मैट का इस्तेमाल होने लगा है. अल्टीमेट खो-खो लीग, वर्ल्ड कप और राष्ट्रीय चैंपियनशिप अब पूरी तरह मैट पर खेली जाती हैं. मित्तल ने इसे इस खेल के लिए एक “टर्निंग पॉइंट” यानी बड़ा बदलाव बताया.
मैट की सतह एक जैसी होती है, उसमें कुशन होता है और खेल के दौरान लगाई जाने वाली डाइव, पीछा करने और अचानक दिशा बदलने जैसी गतिविधियों में जोड़ों पर इसका असर भी कम होता है. मिट्टी के मैदान असमान होते हैं, गिरने पर ज्यादा चोट लग सकती है और उनमें मैट जैसी पकड़ और एक जैसी सतह नहीं होती.
ताहिर ने कहा, “अगर आप सिर्फ मिट्टी के मैदान पर ट्रेनिंग लेते हैं, तो मैट वाले मैदान पर आपका प्रदर्शन प्रभावित होगा. और चोट लगने की संभावना भी ज्यादा होगी.”
इसका मतलब है कि जम्मू-कश्मीर के ज्यादातर खो-खो खिलाड़ी अभी भी ऐसी सतहों पर ट्रेनिंग कर रहे हैं, जो उस तकनीक के हिसाब से सही नहीं हैं, जिसके आधार पर बाद में राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका आकलन किया जाएगा.
नाजिया बीबी ने कहा, “हमें पहचान मिलने और लोग हमें देखने तक पहुंचने में बहुत लंबा समय लगा. हमें ज्यादा ध्यान की जरूरत है. एसोसिएशन को सही तरीके से चलाने के लिए ज्यादा पैसे चाहिए, अच्छी डाइट के लिए पैसे चाहिए, जूतों के लिए पैसे चाहिए और सबसे जरूरी, अच्छी खेल सुविधाओं के लिए पैसे चाहिए.”
फिलहाल, उनके खर्च उनके पिता उठाते हैं. खो-खो के अलावा वह जम्मू में पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई करना चाहती हैं. उन्होंने एक स्थानीय सरकारी कॉलेज से BA किया है. जो चीज अब भी उन्हें हिम्मत देती है, वह वर्ल्ड कप फाइनल के लिए स्टेडियम में जाने की याद है.
उन्होंने कहा, “उस समय मेरे अंदर बहुत सारी भावनाएं चल रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे जमीन से उठाकर आसमान में सितारों के बीच बैठा दिया गया हो. हम जैसे लोगों के लिए बड़े सपने देखना आसान नहीं है.”
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