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Thursday, 24 September, 2026
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नोएडा मजदूर प्रदर्शन पर कार्रवाई की कीमत: नौकरी गई, पढ़ाई छूटी, ज़िदगी कैसे बदली

नोएडा में कम मजदूरी के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन मजदूरों के लिए नौकरी जाने, बार-बार कोर्ट जाने और आपराधिक मामले का दाग लेकर आया. दिप्रिंट ने पता लगाया कि वे अपनी ज़िंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कैसे कर रहे हैं.

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नई दिल्ली: नोएडा में कम मजदूरी और बढ़ती जीवन-यापन की लागत के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सैकड़ों लोग जेल गए और कई मजदूरों की नौकरी चली गई. पांच महीने बाद भी इन मामलों का असर उनकी ज़िंदगी पर बना हुआ है. रोज़ी-रोटी चली गई, पढ़ाई प्रभावित हुई और कई लोग अब भी जेल में हैं. अदालतें पुलिस के बड़े साजिश वाले मामले के कुछ पहलुओं पर सवाल उठा रही हैं. दिप्रिंट ने अप्रैल के उन 10 दिनों की पड़ताल की, जब मजदूरी को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन आपराधिक कार्रवाई में बदल गया और इसमें फंसे लोगों पर इसका क्या असर पड़ा.

डेढ़ महीने जेल में रहना शायद बहुत लंबा समय न लगे, लेकिन इसका असर पूरी ज़िंदगी रह सकता है, नाई का काम करने वाले पंकज ने दिप्रिंट को बताया. 45 दिनों तक वह 14 अप्रैल की घटनाओं को बार-बार अपने दिमाग में दोहराते रहे और खुद से पूछते रहे कि उनसे कहां गलती हुई.

बिहार के आरा जिले के रहने वाले पंकज ने कहा, “जिस सैलून में मैं काम करता था, वहां उस दिन मेरी छुट्टी थी और मैं कुछ काम मिलने की उम्मीद में लेबर चौक गया था.”

देश में चल रहे खाना पकाने वाली गैस के संकट के दौरान एलपीजी की कीमतें बढ़ने से उनका खर्च बढ़ गया था. उन्होंने कहा, “ब्लैक मार्केट में एक सिलेंडर 3,000 रुपये का मिल रहा था. उस समय ढाबे भी खाने के लिए दोगुने पैसे ले रहे थे, इसलिए मैं कुछ और पैसे कमाने गया था.”

लेकिन कुछ घंटे बाद वह उत्तर प्रदेश पुलिस की एक गाड़ी में हथकड़ी लगाए बैठे थे. उन्हें नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों के विरोध प्रदर्शन में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में पकड़ा गया था. यह विरोध प्रदर्शन बेहतर मजदूरी और काम की बेहतर परिस्थितियों की मांग को लेकर 8 अप्रैल को रिचा ग्लोबल ग्रुप के खिलाफ शुरू हुआ था. पंकज ने कहा कि उनका इससे कोई लेना-देना नहीं था.

13 से 22 अप्रैल के बीच गिरफ्तार किए गए कई लोगों में पंकज भी एक थे. गौतम बुद्ध नगर पुलिस के मुताबिक, विरोध प्रदर्शन के हिंसक होने के बाद कम से कम 200 लोगों को गिरफ्तार किया गया. दिप्रिंट से बात करने वाले कई मजदूरों ने कहा कि शुरुआत में 1,800 लोगों को हिरासत में लिया गया था.

पुलिस ने गौतम बुद्ध नगर कमिश्नरेट के तहत आने वाले पांच पुलिस थानों में BNS की कई धाराओं के तहत 11 एफआईआर दर्ज कीं. इनमें दंगा, हत्या की कोशिश, जानबूझकर चोट पहुंचाना, सरकारी कर्मचारियों को काम करने से रोकने के लिए आपराधिक बल का इस्तेमाल, जबरन घुसना, गलत तरीके से किसी को रोककर रखना, नुकसान पहुंचाना, लापरवाही से काम करना, मानव जीवन को खतरे में डालना आदि धाराएं शामिल थीं.

इसके बाद कई लोगों को रिहा कर दिया गया, लेकिन 11 लोगों को अब तक जमानत नहीं मिली है. इनमें कम से कम आठ एक्टिविस्ट और दो मजदूर हैं, जो अभी भी गौतम बुद्ध नगर जेल में बंद हैं. इनमें सत्याम वर्मा और छात्र-एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और BNS की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.

विरोध प्रदर्शन में शामिल करीब 40,000 मजदूरों में ज्यादातर बिना किसी यूनियन वाले फैक्ट्री मजदूर थे. कुछ नोएडा में घरेलू कामगार भी थे. पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी “पत्थरबाजी”, “आगजनी” और “हिंसा” करने लगे, जिसके बाद प्रदर्शन हिंसक हो गया. पुलिस ने आरोप लगाया कि कई गाड़ियों में आग लगा दी गई और कई मजदूरों के हाथों में डंडे थे.

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने उस समय कहा था कि हिंसा में शामिल “भड़काऊ तत्वों” और “बाहरी लोगों” का पता लगाया जा रहा है और उनकी पहचान होने के बाद “कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी”.

इन्फोग्राफिक: सोहम सेन/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: सोहम सेन/दिप्रिंट

ज़मानत के बाद की ज़िंदगी

पंकज को इस मामले में जमानत मिले अब करीब तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन जब वह गौतम बुद्ध नगर की जिला जेल से बाहर आए, तो उनकी सालों की मेहनत खत्म हो चुकी थी.

उन्होंने कहा, “जब पुलिस ने मुझे लेबर चौक से पकड़ा, तो उन्होंने मेरी इज्ज़त खराब कर दी. लोगों को नहीं पता कि मामला क्या था या आरोप सही थे या नहीं, लेकिन लोगों ने मेरे बारे में पहले ही फैसला कर लिया.”

सिर्फ उनकी प्रतिष्ठा ही नहीं गई, सैलून की नौकरी भी चली गई. उन्होंने कहा, “मैं नाई समुदाय से आता हूं और मेरे पिता और भाई दोनों दिल्ली में बाल काटने का काम करते हैं, लेकिन इसके बावजूद मुझे यहां दो महीने तक कोई काम नहीं मिला.”

दो महीने तक बेरोजगार रहने के बाद परेशान पंकज ने दिल्ली-एनसीआर से बाहर रहने वाले रिश्तेदारों से संपर्क करना शुरू किया. आखिरकार, रिहाई के तीसरे महीने में उनके जीजा ने गुजरात के एक सैलून में उनके लिए नौकरी ढूंढ दी. उन्होंने कहा, “इस राज्य में मुझे कोई नहीं जानता. यहां अकेलापन भी है और आज़ादी भी.”

19 साल के आशीष कुमार के लिए आपराधिक मामला और डेढ़ महीने जेल में रहना उनके भविष्य को पटरी से उतार चुका है. उन्होंने कहा, “मैं फैक्ट्री में काम करते हुए ग्रेजुएशन कर रहा था और सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. अब मेरे पास नौकरी नहीं है और इस (पुलिस) मामले के साथ सरकारी नौकरी मिलने की भी कोई उम्मीद नहीं है.”

जिस दिन कुमार को गिरफ्तार किया गया, उस दिन वह घर जा रहे थे. रास्ते में वह “पुलिस को लोगों पर कार्रवाई करते हुए” देखने के लिए रुक गए. उन्होंने कहा, “मैं घर के कपड़ों में था और मेरे हाथ में नोएडा से अपने बिहार के सीवान जाने का टिकट था.” उन्हें प्रदर्शन कर रहे मजदूरों के साथ पकड़ लिया गया.

पंकज और कुमार की तरह मुकेश भी अपनी ज़िंदगी के इस बुरे दौर को लेकर परेशान रहते हैं. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हर हफ्ते हमें एक या दो बार कोर्ट आना पड़ता है और रोज़ कमाने वाले लोगों के लिए इसका मतलब है काम और पैसे के कई घंटे गंवाना.”

जेल में रहने का असर उनकी मानसिक स्थिति पर भी पड़ा है. उन्होंने कहा, “जब पुलिसवाले मुझे गिरफ्तार कर रहे थे, तो मैं उनसे बार-बार कह रहा था कि मेरी परीक्षा है, मुझे जाने दो.”

वाराणसी के रहने वाले 20 साल के मुकेश रिचा ग्लोबल में काम करने के साथ बी.एससी इन फार्मेसी की पढ़ाई कर रहे थे.

अब मुकेश को आईने में अपना चेहरा देखने में भी परेशानी होती है और जरा सी आवाज़ से वह डर जाते हैं. उन्होंने कहा, “मैं बस अपनी बी.फार्मा पूरी होने का इंतज़ार कर रहा हूं. उसके बाद मैं कभी दिल्ली-एनसीआर वापस नहीं आऊंगा.”

यह सब कहां से शुरू हुआ

मुकेश को याद है कि यह सब मजदूरों की बढ़ती लागत और खाली होती जेब से शुरू हुआ था. उन्होंने कहा, “कुछ लोग एचआर के ऑफिस में वेतन बढ़ाने की मांग करने गए थे. उन्होंने बताया कि 10,000-15,000 रुपये की कम आमदनी में जीवन-यापन का खर्च पूरा नहीं हो रहा था.”

मांगें धीरे-धीरे बढ़ती गईं, लेकिन जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो मजदूरों ने फैक्ट्री के एचआर अधिकारियों से कहा कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, वे काम बंद रखेंगे.

उन्होंने कहा, “पहले कुछ लोगों ने काम बंद किया, फिर बड़ी संख्या में मजदूर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने लगे क्योंकि हर कोई सच में परेशान था.” 9 और 10 अप्रैल के बीच वह “Richa Global” नाम के एक वॉट्सऐप कम्युनिटी ग्रुप में शामिल हो गए, जिसमें कम से कम 1,400 लोग थे.

यह “वॉट्सऐप ग्रुप” बाद में जांच का केंद्र बन गया. यूपी पुलिस की ओर से दाखिल कई चार्जशीट में इसका ज़िक्र है. पुलिस ने चार्जशीट में आरोप लगाया कि इस वॉट्सऐप ग्रुप का इस्तेमाल “साजिश की पहले से योजना बनाने” के लिए किया गया था.

12 से 22 अप्रैल के बीच दिप्रिंट से बात करने वाले कई पूर्व मजदूरों ने कहा कि कम से कम 1,800 लोगों को हिरासत में लिया गया था.

पुलिस ने क्या कहा

पुलिस ने कहा कि कमिश्नरेट के पांच पुलिस थानों में 11 एफआईआर दर्ज की गईं और 200 लोगों को आरोपी बनाया गया. दिप्रिंट को मिली तीन चार्जशीट में 13 लोगों को मुख्य “साजिशकर्ता” बताया गया है और कई एफआईआर में उनका नाम लिया गया है.

चार्जशीट में कहा गया है कि फैक्ट्री मजदूरों ने नोएडा में सड़कें जाम कर दीं और कई “गैरकानूनी मांगें” रखीं.

चार्जशीट में कहा गया, “उन्हें प्रशासनिक स्तर पर समझाने की पूरी कोशिश की गई, जो सफल नहीं हुई. इसके बावजूद प्रशासन ने शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश जारी रखी.”

इसके बाद पुलिस ने कहा कि 11 अप्रैल को 1,500-2,000 मजदूरों ने मुख्य दादरी रोड को जाम कर दिया और “NSEZ के सामने भड़काऊ भाषण दिए और प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया, जिससे भीड़ ने दंगा किया.”

पुलिस ने आगे आरोप लगाया कि इसके बाद “भीड़” ने इलाके में कई जगहों पर “निजी संपत्ति में तोड़फोड़ की, धक्का दिया, मारपीट की, गाली दी, जान से मारने की धमकी दी और पुलिस पर पत्थर फेंके, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए.”

घटना के बाद पुलिस ने अदालतों से कहा कि सत्याम वर्मा और आकृति चौधरी समेत कई मजदूरों ने “पहले से बनाई गई साजिश के तहत आपराधिक मदद की और मजदूर आंदोलन को हिंसक बना दिया.”

नोएडा मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के एक महीने से कुछ ज्यादा समय बाद पुलिस ने सत्याम वर्मा और आकृति चौधरी पर सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत मामला दर्ज किया.

अदालतों ने क्या कहा

नोएडा की सेशन कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट में हुई कई सुनवाई के दौरान अदालतों ने यूपी पुलिस की कार्रवाई, आरोपों और पेश किए गए सबूतों पर सवाल उठाए हैं.

एक मामले में सेशन कोर्ट की बेंच ने कहा कि “सिर्फ भीड़ में शामिल होना इरादे का सबूत नहीं है.” अदालत ने पुलिस के आरोपों के समर्थन में वीडियो सबूत भी मांगे. एक अन्य सेशन कोर्ट के आदेश में कहा गया, “गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई वीडियो सबूत नहीं है.”

एक मामले में, जब सरकारी वकील ने चाउमीन ठेले वाले, रिक्शा चालक और पानी बेचने वाले लोगों को चश्मदीद गवाह के तौर पर पेश किया, तो अदालत ने कहा कि यह “स्पष्ट नहीं है” कि इन गवाहों की आरोपियों से पहचान कैसे हुई. बेंच ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं रखी गई है, जिससे कथित अपराध करने में आरोपी की कोई खास और सक्रिय भूमिका साबित हो.”

इस बीच, 2 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के मामले में छात्र-एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी. अदालत ने राज्य की ओर से बनाई गई “मनगढ़ंत कहानी” के आधार पर उनकी गिरफ्तारी और पांच महीने की हिरासत पर कड़ी टिप्पणी की.

अदालत ने माना कि यह सत्ता का गलत इस्तेमाल था और कहा कि चौधरी ने लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के लिए कुछ नहीं किया था. उन्होंने कहा कि आदेश में बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी और सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत को भी महत्वपूर्ण बताया गया है. चौधरी पर इससे जुड़े कई दूसरे एफआईआर में अब भी मामले दर्ज हैं.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें आकृति चौधरी के खिलाफ NSA का मामला रद्द किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम पर भी डीयू की ग्रेजुएट की निवारक हिरासत को मंजूरी देने के लिए जुर्माना लगाया.

इस बीच, वर्मा ने अपना मामला वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. माना जा रहा है कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत मांग रहे हैं, जहां NSA के आरोपों से जुड़े मामले की सुनवाई 7 अक्टूबर को होनी है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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