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Thursday, 24 September, 2026
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डॉक्टरेट की डिग्री बढ़ी लेकिन मौके नहीं: भारत में कैसे PhD के बाद करियर का संकट मंडराया

पिछले एक दशक में PhD में दाखिले लगभग तीन गुना हो गए हैं, लेकिन फैकल्टी, पोस्ट-डॉक्टरल और रिसर्च के सीमित मौकों की वजह से कई ग्रेजुएट एकेडमिक क्षेत्र से बाहर करियर बनाने के बारे में सोच रहे हैं.

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नई दिल्ली: हरियाणा के रहने वाले 25 साल के एक युवक ने 2020 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स में PhD करने के लिए दाखिला लिया. शुरू से उसका ऐसा करने का प्लान नहीं था. उसका असली प्लान कॉमर्स में मास्टर डिग्री पूरी करके किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने का था, जैसा उसके कई बैचमेट्स ने किया.

इस स्कॉलर का कहना है कि मास्टर डिग्री करते समय उसकी अकादमिक क्षेत्र में रुचि बढ़ गई, इसलिए उसने अपना मन बदल लिया. अभी भी उसे पक्का नहीं पता कि वह टीचिंग के पेशे में जाना चाहता है या नहीं, लेकिन उसे PhD करने का फैसला लेने का कोई अफसोस नहीं है.

भारत में पिछले एक दशक में PhD में दाखिले की संख्या लगभग तीन गुना हो गई है, लेकिन PhD के बाद करियर के रास्ते सीमित हैं. पोस्ट-डॉक्टरल मौकों की कमी और अकादमिक क्षेत्र में कम सैलरी की वजह से कई लोग यूनिवर्सिटी के बाहर करियर तलाश रहे हैं. इनमें कॉरपोरेट R&D या विदेश जाकर रिसर्च की नौकरी करना भी शामिल है.

हरियाणा के इस PhD स्कॉलर ने कहा, “यह अनुभव काफी अच्छा रहा है, लेकिन जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ा, मुझे समझ आया कि मैं टीचिंग की नौकरी नहीं करना चाहता और करियर के दूसरे विकल्प तलाशना चाहता हूं. हालांकि, PhD के बाद अकादमिक क्षेत्र में मौके बहुत सीमित हैं.” उसने अपनी पहचान जाहिर नहीं करने की इच्छा जताई.

उसके मुताबिक, PhD के बाद रिसर्च और टीचिंग दो विकल्प हैं, लेकिन ज्यादातर असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरियां कॉन्ट्रैक्ट पर होती हैं. इनमें दूसरी नौकरियों जैसी स्थायी नौकरी और नौकरी की सुरक्षा नहीं होती.

सरकारी संस्थानों में सैलरी भी चिंता की बात है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के हाल के नोटिस के मुताबिक, गेस्ट फैकल्टी को एक लेक्चर के लिए 1,500 रुपये मिलते हैं और महीने में अधिकतम 50,000 रुपये तक मिल सकते हैं, जबकि उनके लिए भी रेगुलर असिस्टेंट प्रोफेसर जैसी ही योग्यताएं जरूरी हैं. वहीं, एक रेगुलर असिस्टेंट प्रोफेसर की शुरुआती बेसिक सैलरी 57,700 रुपये प्रति माह है. इसमें भत्ते शामिल नहीं हैं.

उसकी यह दुविधा आज भारत में बढ़ती संख्या में डॉक्टरेट कर रहे छात्रों के सामने खड़े एक बड़े सवाल को दिखाती है.

सरकार की जुलाई में जारी उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण यानी AISHE रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में PhD में दाखिले 2014-15 में 1.17 लाख से बढ़कर 2023-24 में 3.44 लाख हो गए. यानी करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई. इस रिपोर्ट में सरकारी और प्राइवेट दोनों संस्थानों को शामिल किया गया है.

हालांकि, मई में जारी नीति आयोग के एक आकलन में PhD के बाद करियर के कमजोर रास्तों की ओर ध्यान दिलाया गया. इसमें कहा गया कि पोस्ट-डॉक्टरल व्यवस्था सीमित है, भर्तियों में देरी होती है और फुल-टाइम फैकल्टी और रिसर्चर की कई जगहें खाली हैं.

पूर्व UGC चेयरपर्सन प्रोफेसर एम. जगदीश कुमार ने कहा कि PhD में दाखिलों में हुई बढ़ोतरी को उसके संदर्भ में देखना जरूरी है.

कुमार ने ThePrint से कहा, “यह संख्या बड़ी लग सकती है, लेकिन यह भारत में उच्च शिक्षा में कुल दाखिलों का सिर्फ करीब 0.76 प्रतिशत है.” उन्होंने 2023-24 में करीब 4.5 करोड़ उच्च शिक्षा छात्रों में से लगभग 3.43 लाख PhD छात्रों का जिक्र करते हुए यह बात कही.

उन्होंने कहा कि केवल PhD छात्रों की संख्या बढ़ने से यह तय नहीं होता कि भारत में रिसर्च स्कॉलर्स की संख्या जरूरत से ज्यादा है या कम.

उन्होंने कहा, “रिसर्च की गुणवत्ता, अच्छे सुपरवाइजर की उपलब्धता, फंडिंग, PhD पूरी करने की दर और डिग्री पूरी करने के बाद छात्र क्या करते हैं, ये सब चीजें भी महत्वपूर्ण हैं.”

सिर्फ PhD में दाखिले ही नहीं बढ़े हैं. PhD की डिग्री पाने वालों की संख्या भी बढ़ी है, हालांकि यह बढ़ोतरी धीरे हुई है. भारत में 2014-15 में 21,830 PhD दी गई थीं, जबकि 2023-24 में 37,986 PhD दी गईं. यानी 74 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. एक दशक में करीब 3.16 लाख PhD दी गईं.

इन आंकड़ों की हर साल सीधे तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि दाखिला और डिग्री पूरी होने में अलग-अलग समय लगता है. आमतौर पर डॉक्टरेट प्रोग्राम पूरा करने में कई साल लगते हैं.

लेकिन इन दोनों आंकड़ों को साथ देखने पर पता चलता है कि भारत की उच्च शिक्षा और रिसर्च व्यवस्था में डॉक्टरेट करने वालों की संख्या काफी बढ़ रही है.

ज्यादा लोग PhD क्यों कर रहे हैं

विशेषज्ञों और स्कॉलर्स ने ThePrint से बातचीत में PhD में दाखिलों की संख्या बढ़ने के कई कारण बताए.

पूर्व IIT दिल्ली डायरेक्टर और इस समय BITS Pilani के ग्रुप V-C प्रोफेसर वी. रामगोपाल राव ने कहा, “अब ज्यादा यूनिवर्सिटीज में डॉक्टरेट प्रोग्राम हैं, संस्थान रिसर्च को ज्यादा महत्व दे रहे हैं और ज्यादा छात्र PhD की अहमियत समझ रहे हैं. फेलोशिप की वजह से छात्र अपने परिवार पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना रिसर्च कर सकते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “अकादमिक करियर में डॉक्टरेट को दिए जाने वाले महत्व की वजह से भी इसकी मांग बढ़ती है. कुछ छात्रों के लिए नौकरी के बाजार में अनिश्चितता के कारण पढ़ाई जारी रखना ज्यादा अच्छा विकल्प लग सकता है.”

इसी अवधि में भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी काफी बढ़ी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 से 2021-22 के बीच 341 यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी स्तर के संस्थान बनाए गए. वहीं, कॉलेजों की संख्या 38,498 से बढ़कर 45,473 हो गई.

राव ने कहा कि इस बढ़ोतरी के साथ-साथ रिसर्च की क्षमता भी बढ़ाना जरूरी है.

उन्होंने कहा, “एक अच्छे डॉक्टोरल प्रोग्राम के लिए अच्छे सुपरवाइजर, पर्याप्त फंडिंग और ऐसा रिसर्च माहौल चाहिए, जो छात्रों को सवाल पूछने और स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए प्रोत्साहित करे. ज्यादा सीटें खोलना आसान है. लेकिन इन चीजों को तैयार करने में कई साल लगते हैं.”

PhD में दाखिलों की बढ़ती संख्या का एक कारण उच्च शिक्षा व्यवस्था में हुआ एक और बदलाव भी है. यह बदलाव MPhil को बंद करना है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP 2020 में MPhil को बंद करने की सिफारिश की गई थी और 2022 में इसे लागू कर दिया गया.

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी की PhD स्कॉलर अंतरा चक्रवर्ती ने कहा कि जो छात्र अकादमिक करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए मास्टर डिग्री के बाद PhD करना अब तेजी से अगला कदम बन गया है.

उन्होंने कहा, “पहले MPhil की डिग्री आपको यह सीखने की शुरुआती ट्रेनिंग देती थी कि PhD रिसर्च कैसे करनी है.” उनके मुताबिक, MPhil हटने के बाद “मास्टर डिग्री के बाद ज्यादातर छात्रों के पास, अगर वे अकादमिक क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो PhD करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.”

UGC की जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी JRF और ICSSR की डॉक्टोरल फेलोशिप जैसी फेलोशिप भी छात्रों के PhD करने के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं, ऐसा पटना यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर शांतनु कुमार ने कहा.

उन्होंने कहा, “खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में मास्टर डिग्री के बाद नौकरी के बहुत कम विकल्प हैं. जो नौकरियां मिलती हैं, उनमें अक्सर कम सैलरी होती है. अगर आप पढ़ाई में अच्छे हैं और अकादमिक क्षेत्र में रुचि रखते हैं, तो फेलोशिप मिलने पर PhD करना ज्यादा संभव विकल्प बन जाता है.”

UGC की JRF में अभी पहले दो साल हर महीने 37,000 रुपये मिलते हैं. इसके बाद बचे हुए समय के लिए हर महीने 42,000 रुपये मिलते हैं. इसके साथ हर साल एक कॉन्टिजेंसी ग्रांट भी मिलता है.

ICSSR की फुल-टर्म डॉक्टोरल फेलोशिप में दो साल तक हर महीने 20,000 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा हर साल 20,000 रुपये का कॉन्टिजेंसी ग्रांट भी मिलता है.

AISHE रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं में डॉक्टोरल दाखिलों में काफी बढ़ोतरी हुई है. AISHE के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं का PhD में दाखिला 2014-15 में करीब 47,700 से बढ़कर 2023-24 में 1.71 लाख हो गया. यानी 259 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

चक्रवर्ती ने कहा कि महिलाओं के लिए PhD करना कुछ पारंपरिक उम्मीदों को भी टाल सकता है, जो मास्टर डिग्री के बाद अक्सर सामने आती हैं, जैसे शादी करना और घर बसाना. साथ ही उन्होंने कहा कि मास्टर डिग्री के बाद स्थिर नौकरी की कमी छात्रों के सामने कम विकल्प छोड़ सकती है, खासकर अगर वे अकादमिक क्षेत्र में बने रहना चाहते हैं.

PhD में तेजी, लेकिन ‘करियर के रास्ते आकर्षक नहीं’

हालांकि, डॉक्टोरल स्कॉलर्स के लिए बड़ा सवाल यह है कि डिग्री के बाद क्या होगा.

2026 में NITI Aayog के एक आकलन में भारत की रिसर्च व्यवस्था में “आकर्षक करियर रास्तों की कमी” की बात कही गई. इसमें कहा गया कि भारत बड़ी संख्या में STEM PhD ग्रेजुएट तैयार कर रहा है, लेकिन PhD के बाद करियर के रास्ते अच्छी तरह विकसित नहीं हैं.

इसमें कमजोर पोस्ट-डॉक्टरल व्यवस्था, भर्तियों में देरी और स्वीकृत फैकल्टी और रिसर्चर पदों के खाली रहने की बात कही गई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और बायोटेक्नोलॉजी जैसे नए क्षेत्रों में सरकारी सैलरी प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले कम आकर्षक हो सकती है.

IIT दिल्ली से मैनेजमेंट स्टडीज में PhD करने वाले निमिश जोसेफ की हमेशा से अकादमिक क्षेत्र में रुचि थी. लेकिन MTech की पढ़ाई के लिए लोन लेने के बाद उन्होंने फैसला किया कि पहले कमाई करना जरूरी है. उनके मुताबिक, शुरुआत में टीचिंग की नौकरियों में करीब 25,000-30,000 रुपये महीने मिलते थे, जबकि इंडस्ट्री में काम कर रहे उनके दोस्त काफी ज्यादा कमा रहे थे.

जोसेफ ने दोबारा अकादमिक क्षेत्र में आने से पहले 7.5 साल से ज्यादा समय इंडस्ट्री में काम किया. अब वह St Stephen’s College में professor of practice के रूप में काम कर रहे हैं.

लेकिन वह पारंपरिक असिस्टेंट प्रोफेसर वाला रास्ता नहीं अपनाना चाहते. उनके मुताबिक, शुरुआत में इसमें आर्थिक फायदा कम है.

उनका अनुभव उस समस्या को दिखाता है जिसकी पहचान NITI Aayog ने पूरे सिस्टम के स्तर पर की है. ज्यादा रिसर्चर्स तैयार करने का मतलब अपने आप ज्यादा रिसर्च करियर बनना नहीं है.

IIT दिल्ली में अगस्त 2024 में ग्रेजुएट हुए छात्रों के एक एग्जिट सर्वे में पाया गया कि 47 PhD छात्र पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च के मौकों या फैकल्टी पदों का इंतजार कर रहे थे.

संस्थान ने कहा कि लगभग 5 प्रतिशत ग्रेजुएट जो अभी भी अपने लिए सही करियर के मौके तलाश रहे थे, उनमें बड़ी संख्या PhD स्कॉलर्स की थी, जो विदेश में पोस्ट-डॉक्टरल मौके तलाश रहे थे.

NITI Aayog ने अलग से ज्यादा पढ़े-लिखे और कुशल रिसर्चर्स के विदेश जाने की समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया है. उसने कहा कि भारत के टॉप AI रिसर्चर्स का एक बड़ा हिस्सा विदेश में काम करता है, जहां उन्हें बेहतर फंडिंग वाली रिसर्च लैब और करियर के ज्यादा स्पष्ट रास्ते मिलते हैं.

32 साल की अंचल ने 2023 में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में PhD पूरी की. उनके लिए फैसला ज्यादा सीधा था.

PhD पूरी करने के बाद उन्होंने भारत में नौकरी के लिए आवेदन नहीं किया. इसके बजाय उन्होंने अमेरिका में पोस्ट-डॉक्टरल फेलोशिप के लिए आवेदन किया और उनका चयन हो गया. फेलोशिप के दौरान उन्होंने फिलाडेल्फिया की एक यूनिवर्सिटी में काम किया. उनका कहना है कि वहां की रिसर्च सुविधाओं और लैब ने यह सोच बदल दी कि वह अपना करियर कहां बनाना चाहती हैं.

उन्होंने कहा, “मैं वहां की सुविधाएं देखकर हैरान थी. वे बहुत बेहतरीन थीं. हम भारत में ऐसी लैब और सुविधाओं के बारे में सोच भी नहीं सकते.”

इस अनुभव के बाद उन्होंने भारत लौटने के बजाय अमेरिका में फुल-टाइम नौकरी तलाशने का फैसला किया. उन्होंने ThePrint से कहा, “मैंने तय किया कि मैं यहीं फुल-टाइम नौकरी करूंगी. अभी मैं इस प्रक्रिया में हूं.”

फरवरी 2026 में राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने कहा कि पहले भारत में पर्याप्त रिसर्च व्यवस्था न होने की वजह से वैज्ञानिकों और रिसर्चर्स का “कुछ स्तर तक पलायन” हुआ है. विभाग ने यह भी कहा कि एडवांस्ड ट्रेनिंग और अलग-अलग रिसर्च व्यवस्थाओं का अनुभव हासिल करना भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने के कारणों में शामिल है.

प्रोफेसर राव के मुताबिक, भारत ने डॉक्टोरल शिक्षा का विस्तार तो किया, लेकिन रिसर्चर्स के आसपास की पूरी व्यवस्था को उतना विकसित नहीं किया. राव ने कहा, “मेरी चिंता यह है कि हमने रिसर्च में आने के रास्ते तो बढ़ाए हैं, लेकिन उसके बाद क्या होगा, इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया.”

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस रिसर्च व्यवस्था को बढ़ाना क्यों जरूरी है. 2023 में भारत में हर 10 लाख लोगों पर 354 रिसर्चर्स थे. इसके मुकाबले चीन में 2,107 और अमेरिका में 4,937 रिसर्चर्स थे.

राव ने कहा, “जिस तरह की अर्थव्यवस्था हम बनाना चाहते हैं, उसे सपोर्ट करने के लिए हमारे रिसर्च बेस को काफी बढ़ाना होगा.”

अकादमिक क्षेत्र से आगे बढ़ाने की जरूरत है

इसका जवाब सिर्फ ज्यादा फैकल्टी पद बनाना नहीं हो सकता. बात यह भी है कि भारत के रिसर्च सिस्टम में लंबे समय से PhD के बाद फैकल्टी की नौकरी को मुख्य मंजिल माना जाता रहा है. हालांकि, खासकर सरकारी संस्थानों में फैकल्टी के पद सीमित हैं.

फरवरी 2026 में राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में सरकार ने संसद को बताया कि 2022 से अब तक केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित उच्च शिक्षा संस्थानों में 17,000 से ज्यादा फैकल्टी नियुक्तियां की गई हैं. इनमें केंद्रीय विश्वविद्यालय, IIT, NIT और IIM शामिल हैं.

फिर भी रिटायरमेंट, इस्तीफे, संस्थानों के विस्तार और छात्रों की बढ़ती संख्या की वजह से खाली पद लगातार बनते रहते हैं.

2025 में राज्यसभा में दिए गए एक और जवाब में सरकार ने बताया कि 1 जुलाई 2025 तक सिर्फ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 4,889 शिक्षण पद खाली थे. कुल स्वीकृत फैकल्टी पदों की संख्या बढ़कर 18,951 हो गई थी, लेकिन इनमें से 25.44 प्रतिशत पद खाली थे.

लेकिन इन आंकड़ों का यह मतलब नहीं है कि PhD करने वालों की बढ़ती संख्या के लिए हजारों खाली पद तुरंत उपलब्ध हैं. भर्ती संस्थान और विषय के हिसाब से अलग-अलग होती है, और प्रशासनिक तथा भर्ती प्रक्रिया में देरी के कारण पद खाली रह सकते हैं.

प्रोफेसर राव ने कहा कि भारत को इस बात पर फिर से विचार करने की जरूरत है कि PhD किसी व्यक्ति को किस तरह के करियर के लिए तैयार करती है. उन्होंने अमेरिका में 2024 के इंजीनियरिंग PhD के आंकड़ों का हवाला दिया. इन आंकड़ों के अनुसार, जिन लोगों की नौकरी पक्की थी और जिनमें पोस्टडॉक्टरल पद शामिल नहीं थे, उनमें से लगभग 74 प्रतिशत लोग इंडस्ट्री में जा रहे थे और 14 प्रतिशत अकादमिक क्षेत्र में.

प्रोफेसर राव ने कहा कि भारत में स्थिति काफी हद तक इसके उलट है, जहां PhD के बाद भी फैकल्टी की नौकरी को व्यापक रूप से स्वाभाविक नतीजा माना जाता है.

प्रोफेसर राव ने कहा, “इस सोच को बदलने की जरूरत है. PhD किसी व्यक्ति में ऐसी मुश्किल समस्याओं पर काम करने की क्षमता विकसित करती है, जिनके जवाब मौजूद नहीं होते. उन्होंने कहा कि यह कौशल सिर्फ विश्वविद्यालयों के लिए ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्री, सरकार, सार्वजनिक रिसर्च संस्थानों और स्टार्टअप्स के लिए भी उपयोगी है.”

NITI Aayog ने भी पोस्टडॉक्टरल व्यवस्था को बढ़ाने की सिफारिश की है. इसमें विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में पोस्टडॉक्टरल फेलोशिप को अगले कुछ वर्षों तक हर साल 20 प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गई है.

इसने एक ज्यादा एकीकृत फेलोशिप व्यवस्था और रिसर्च संस्थानों तथा इंडस्ट्री के बीच मजबूत संबंध बनाने की भी सिफारिश की है. इसमें यह माना गया है कि PhD करने वालों को डॉक्टरेट पूरी करने और लंबे समय के रिसर्च करियर में जाने के बीच ज्यादा रास्तों की जरूरत है.

पूर्व UGC चेयरपर्सन कुमार ने कहा कि रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन के लिए सरकार की 1 लाख करोड़ रुपये की फंडिंग, जिसका ऐलान निजी क्षेत्र में रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए किया गया था, PhD करने वालों के लिए करियर के ज्यादा अवसर पैदा करने में मदद कर सकती है.

कुमार ने कहा, “विश्वविद्यालय इंडस्ट्री के सहयोग से PhD, इंडस्ट्री में पोस्टडॉक्टरल फेलोशिप और संयुक्त रिसर्च लैब शुरू करने पर विचार कर सकते हैं. इंडस्ट्री के विशेषज्ञ रिसर्च के सवाल तय करने में भी मदद कर सकते हैं और एप्लाइड रिसर्च प्रोजेक्ट्स में मिलकर मार्गदर्शन कर सकते हैं. हालांकि, इन पहलों के लिए योग्य फैकल्टी, रिसर्च की सुविधाएं और भरोसेमंद फंडिंग जरूरी होगी.”

कुछ संस्थान पहले से ही इस बदलाव को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

IIT मद्रास की इंस्टीट्यूट पोस्ट-डॉक्टरल फेलोशिप PhD करने वालों को फैकल्टी की निगरानी में रिसर्च जारी रखने का मौका देती है. इसके साथ वे अपने रिसर्च और पढ़ाने के अनुभव को भी मजबूत कर सकते हैं. इससे PhD पूरी करने और लंबे समय की अकादमिक नौकरी के लिए मुकाबला करने के बीच एक मध्यवर्ती रास्ता बनता है. संस्थान उन महिलाओं के लिए भी पोस्टडॉक्टरल अवसर देता है, जो करियर ब्रेक के बाद दोबारा रिसर्च में लौटना चाहती हैं.

लेकिन बढ़ती संख्या में डॉक्टरेट की पढ़ाई करने वाले छात्रों की तुलना में ऐसी पहल अभी भी सीमित हैं. पहले जिस दिल्ली विश्वविद्यालय की स्कॉलर का जिक्र किया गया था, उसके लिए भी PhD पूरी करने और स्थायी नौकरी मिलने के बीच का अंतर एक बड़ी चिंता बना हुआ है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की स्कॉलर ने कहा, “मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानती हूं जो बस अच्छी नौकरी के मौके का इंतजार कर रहे हैं, या कम वेतन पर गेस्ट फैकल्टी के रूप में काम कर रहे हैं. भारत को उन रिसर्च स्कॉलर्स के लिए बेहतर नौकरी की स्थिति बनाने की जरूरत है, जो पढ़ाई में इतने साल लगा देते हैं.”

क्या प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस इसका जवाब है?

जहां पारंपरिक अकादमिक नौकरियां कुछ PhD करने वालों के लिए कम आकर्षक हो सकती हैं, वहीं Professor of Practice (PoP) का रास्ता अनुभवी प्रोफेशनल्स के लिए विश्वविद्यालयों में आने का एक अलग और ज्यादा लचीला रास्ता बना रहा है. इनमें ऐसे प्रोफेशनल्स भी शामिल हैं, जिन्होंने कभी PhD नहीं की हो. अकादमिक क्षेत्र में प्रतिभाशाली लोगों को लाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 2022 में PoP योजना शुरू की. इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रतिष्ठित प्रोफेशनल्स और इंडस्ट्री के विशेषज्ञों के लिए पदों की एक नई श्रेणी बनाई गई. यह कदम NEP 2020 के अनुरूप था.

PoP योजना को भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में काफी दिलचस्पी मिली है. UGC के PoP पोर्टल पर 20,608 से ज्यादा प्रोफेशनल्स और 565 उच्च शिक्षा संस्थान रजिस्टर हैं.

नियमित फैकल्टी के विपरीत, प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के लिए UGC का कोई तय वेतनमान नहीं है. UGC संस्थानों और प्रोफेशनल्स को आपसी सहमति से एक तय वेतन तय करने की अनुमति देता है. इससे अनुभवी प्रोफेशनल्स के लिए यह रास्ता ज्यादा लचीला बन जाता है.

प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में अकादमिक क्षेत्र में शामिल होने वाले जाने-माने प्रोफेशनल्स की सूची लगातार बढ़ रही है. पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका रिटायर्ड होकर मुंबई के SVKM प्रवीण गांधी कॉलेज ऑफ लॉ में ऑनरेरी प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस बने. इसके बाद दिसंबर में ऑनरेरी प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के पूर्व डायरेक्टर-जनरल दिनकर गुप्ता IIT-Ropar में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस बने.

जोसेफ़  की PoP के रूप में अकादमिक क्षेत्र में वापसी दिखाती है कि बेहतर वेतन और प्रवेश के एक वैकल्पिक रास्ते से प्रोफेशनल्स को दोबारा पढ़ाने के क्षेत्र में लाया जा सकता है.

इसलिए भारत में PhD की बढ़ती संख्या एक सवाल खड़ा करती है, जो सिर्फ यह नहीं है कि देश कितनी PhD करवा रहा है. सवाल यह भी है कि PhD करने वालों के लिए कौन-कौन से करियर उपलब्ध होंगे? PhD करने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के लिए सिर्फ PhD की संख्या बढ़ाना तभी मायने रखेगा, जब भारत PhD के बाद मिलने वाले अवसरों को भी बढ़ाएगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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