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Sunday, 18 October, 2026
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फ्रांस से इटली तक महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन, दुकानें लूटीं, इमारतों में आग

यूरोप में ऐसे समय में प्रदर्शन हो रहे हैं, जब अगले 12 महीनों में स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड में राष्ट्रीय चुनाव होने हैं. यह यूरोप में चुनावों का अब तक का सबसे बड़ा दौर है.

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नई दिल्ली: शनिवार को यूरोपीय संघ के कई देशों की सड़कों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं. फ्रांस, इटली, बेल्जियम और पुर्तगाल में बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ हजारों लोगों ने अलग-अलग और बिना किसी समन्वय के प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. फ्रांस में 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया. यहां प्रदर्शन के दौरान झड़पें हुईं, दुकानों में लूटपाट की गई, आग लगाई गई और सरकारी इमारतों और कारोबारों को नुकसान पहुंचाया गया. फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने “बेहद गंभीर हिंसा” की निंदा की.

यूरोप में ये प्रदर्शन ऐसे समय हो रहे हैं, जब अगले 12 महीनों में राष्ट्रीय चुनावों का एक अभूतपूर्व बड़ा दौर होने वाला है. स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड में चुनाव होने हैं.

दशकों में फ्रांस के सबसे उथल-पुथल वाले प्रदर्शनों में से एक

फ्रांस में दशकों में प्रदर्शनों का सबसे उथल-पुथल वाला दिन देखा गया. उसके गृह मंत्रालय के मुताबिक, 5.5 लाख से ज्यादा लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. देशभर में पुलिस का प्रदर्शनकारियों से सामना हुआ. कुछ जगहों पर प्रदर्शन झड़पों, लूटपाट और आगजनी में बदल गए.

फ्रांस के अखबार ले मोंडे के मुताबिक, प्रधानमंत्री लेकोर्नू ने कहा कि 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 150 पुलिसकर्मी घायल हुए. एएफपी के मुताबिक, पेरिस, मार्सेई, नीस, नांत, बोर्डो, लिमोज, लील, टूलूज और स्ट्रासबर्ग में कई दुकानों में लूटपाट की गई. इनमें लुई वितों और हर्मीज़ जैसे देश के मशहूर फैशन ब्रांडों की दुकानें भी शामिल थीं. पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने कहा कि राजधानी की पूरी-पूरी सड़कें “तबाह कर दी गई हैं”.

लिमोज में नकाब पहने प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी, जिससे 140 साल से ज्यादा पुरानी टाउन हॉल की इमारत को भारी नुकसान पहुंचा और वह लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई. मार्सेई और लील में टाउन हॉल में घुसकर तोड़फोड़ की गई, जबकि लियोन में प्रदर्शनकारियों ने शहर के पर्यटन कार्यालय में आग लगा दी.

पिछले महीने शुरू हुए प्रदर्शनों के व्यापक हिंसा में बदलने के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि सरकारी इमारतों और कारोबारों पर हमला करने और लूटपाट करने वालों के खिलाफ “मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें सजा दी जाएगी”.

उन्होंने एक्स पर लिखा, “हमारे गणराज्य में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है. जिन्होंने सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ कारोबारों पर हमला किया, उन्हें नुकसान पहुंचाया और यहां तक कि हमारे टाउन हॉल में लूटपाट की, उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें सज़ा दी जाएगी…हम सभी उन अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होंगे, जो सिर्फ हमारी संस्थाओं को गिराना चाहते हैं और शांतिपूर्वक अपनी मांगें रखने वालों को ऐसा करने से रोकना चाहते हैं.”

मेलोनी ने विपक्ष से हिंसा की निंदा करने को कहा

इटली में शनिवार को मध्य मिलान में दंगाइयों की पुलिस से झड़प हुई, दुकानों में लूटपाट की गई और संपत्तियों में आग लगा दी गई. युद्धों और बढ़ती जीवन-यापन की लागत के विरोध में आयोजित मार्च की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से हुई थी. हालांकि, स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक बाद में नकाब पहने प्रदर्शनकारियों ने दंगा पुलिस पर पत्थर, सड़क से उखाड़े गए पत्थर के टुकड़े और दूसरी चीजें फेंकीं. उन्होंने बार की मेजों से बनाई गई बैरिकेड्स में आग लगा दी.

भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने पानी की बौछार और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. इटली की समाचार एजेंसी लाप्रेस के मुताबिक, कम से कम दो पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. इनमें कई नाबालिग थे.

प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक्स पर लिखा, “प्रदर्शन करना अधिकार है. हमारे शहरों में आग लगाना नहीं.” उन्होंने लोकतंत्र में प्रदर्शनों की भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन “उन गुंडों” को जिम्मेदार ठहराया जो प्रदर्शनों का इस्तेमाल अराजकता फैलाने, सुरक्षा सुनिश्चित करने वालों पर हमला करने और पूरे शहरों को बंधक बनाने के लिए करते हैं.

मेलोनी ने विपक्षी दलों से भी हिंसा की स्पष्ट रूप से निंदा करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की अपील करने को कहा.

मिलान के केंद्र-वामपंथी मेयर ज्यूसेपे साला ने प्रदर्शनों के पीछे की शिकायतों को सही माना, लेकिन हिंसा की निंदा की. उन्होंने कहा, “प्रदर्शन के पीछे की वजहें समझ में आती हैं. कानून-व्यवस्था बनाए रखने वालों के खिलाफ हिंसा और शहर को गंभीर नुकसान पहुंचाना सही नहीं ठहराया जा सकता.”

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे. पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछार की. प्रदर्शनकारियों पर पुलिसकर्मियों पर चीजें फेंकने और आग लगाने का आरोप है. ये प्रदर्शन विश्वविद्यालयों की ऊंची पंजीकरण फीस के खिलाफ कई हफ्तों से चल रहे छात्र प्रदर्शनों के बाद हुए. इससे शिक्षा से जुड़ी शिकायतें भी जीवन-यापन की बढ़ती लागत को लेकर पहले से मौजूद नाराजगी में जुड़ गईं.

पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में शनिवार को हजारों लोगों ने बढ़ती जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और बड़े शहरों में घर हासिल करना मुश्किल होने के खिलाफ मार्च निकाला. इससे पहले कई दिनों से इसके लिए माहौल बनाया जा रहा था.

पुर्तगाल के संसदीय मामलों के मंत्री कार्लोस अब्रेउ अमोरीम ने कहा कि सरकार प्रदर्शनों के आगे नहीं झुकेगी. शुक्रवार को उनके हवाले से कहा गया, “सरकार सड़कों से उठने वाली आवाजों के आगे नहीं झुकेगी.”

फ्रांस प्रदर्शनों का केंद्र कैसे बना

फ्रांस में प्रदर्शन पिछले महीने पेरिस के आसपास के इलाकों के हाई स्कूलों से शुरू हुए थे. वहां शिक्षकों की कमी और पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने के खिलाफ प्रदर्शन किए गए. इसके बाद ये पेरिस के दूसरे हिस्सों में फैल गए और फिर पूरे देश में पहुंच गए. धीरे-धीरे ये बढ़ती जीवन-यापन की लागत के खिलाफ व्यापक आंदोलन में बदल गए.

इन प्रदर्शनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है. इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में अशांति के लिए इस्लाम और प्रवासन को जिम्मेदार ठहराया. ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “फ्रांस में जो हो रहा है, वह बेकाबू बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवासन से कम कुछ नहीं है.” उन्होंने आगे कहा, “यह स्कूलों के बारे में नहीं है, यह इस्लाम के बारे में है जो कभी महान रहे देश पर कब्जा करना चाहता है!”

शनिवार के प्रदर्शन 2018 के “येलो वेस्ट” आंदोलन की भी याद दिलाते हैं. यह आंदोलन मैक्रों सरकार के खिलाफ बढ़ती ईंधन कीमतों और जीवन-यापन की लागत को लेकर हुआ था. एपी ने बताया कि पूरे फ्रांस में प्रदर्शनकारियों ने सोशल मीडिया पर आंदोलन को फिर से शुरू करने की अपील का जवाब दिया. कई लोगों ने चमकीले पीले रंग की जैकेट पहनी थीं, जो 2018 के प्रदर्शनों की पहचान बन गई थीं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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