आईआईटी बॉम्बे के एनर्जी साइंस और इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक के दूसरे साल के छात्र साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर को आत्महत्या कर ली. हालांकि, कुछ ही दिनों में उनकी मौत सोशल मीडिया की एक और लड़ाई का मुद्दा बन गई.
उनकी मौत से कुछ घंटे पहले, साहिल पर परीक्षा के दौरान अपने फोन में चैटजीपीटी का इस्तेमाल करते हुए पकड़े जाने का आरोप है. इसके बाद यह घटना उनकी मौत से जुड़ी एक बड़ी बहस का हिस्सा बन गई. उनके माता-पिता ने आरोप लगाया है कि मौत से पहले उन्होंने जाति को लेकर की गई टिप्पणियों और परेशान किए जाने की शिकायत की थी. वहीं, आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराधों से जुड़ा एक मामला दर्ज किया गया है. उनकी मौत से जुड़ी परिस्थितियों की अब जांच की जा रही है.
लगभग तुरंत ही यह बहस पहले से बने हुए अलग-अलग खेमों में बंट गई. कुछ लोगों के लिए यह पूरी तरह जाति का मामला बन गया. दूसरों के लिए यह नकल की घटना, माता-पिता या इस सवाल का मामला बन गया कि प्रोफेसर पर गलत तरीके से आरोप तो नहीं लगाया जा रहा है.
हो सकता है कि जांच से आखिरकार हमें यह पता चले कि वास्तव में क्या हुआ था. मुझे नहीं पता और मुझे नहीं लगता कि सोशल मीडिया पर बैठे लोगों को भी पता है.
लेकिन कोई सबसे जरूरी सवाल नहीं पूछ रहा है: ऐसा क्या है जिसकी वजह से एक युवा व्यक्ति को लगने लगता है कि एक घटना, एक असफलता, एक बेइज्जती या एक गलती इतनी मुश्किल हो सकती है कि मौत आसान रास्ता लगने लगे?
असफलता की शर्म
जब मैं अपने आसपास देखती हूं, तो मुझे सफल होने को लेकर बनाया गया बहुत ज्यादा दबाव दिखाई देता है. तुलना, उम्मीदों और परिवार की इज्ज़त की एक ऐसी संस्कृति, जिसमें कभी-कभी व्यक्ति के लिए कुछ भी व्यक्तिगत नहीं रह जाता. यह सिर्फ परीक्षा में फेल होने की बात नहीं है. यह माता-पिता को निराश करने की बात बन जाती है. यह सिर्फ गलती करने की बात नहीं है. इसके बाद यह सोच शुरू हो जाती है कि लोग क्या कहेंगे? आप सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर सफल नहीं होते. पूरा परिवार आपकी सफलता में अपना हिस्सा मानता है.
इससे असफलता की कीमत बहुत भारी हो जाती है—शर्म, बेइज्ज़ती, माता-पिता का डर, समाज का डर और यह डर कि जिस चीज़ के लिए आपने इतनी मेहनत की, वह अब खत्म हो गई है. ये सभी बातें शर्म की संस्कृति का हिस्सा हैं.
यह बेईमानी की शर्म नहीं है. न ही वह शर्म जो हमें कुछ गलत करने या समाज के भरोसे को तोड़ने से रोकती है. यह असफलता की शर्म है और समस्या यहीं है.
हमारे परिवार और समुदाय अक्सर कम प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को शर्मिंदा करते हैं और उससे दूरी बना लेते हैं, बजाय इसके कि गलत या अनैतिक काम करने वाले व्यक्ति को शर्मिंदा किया जाए.
शहरी और ग्रामीण भारत में बड़े होते हुए मैंने कई लोगों में यह सोच देखी है, एक ऐसी अनकही सच्चाई: अगर आप सफल हैं, तो आप बहुत खास हैं, चाहे सफलता सही तरीके से मिली हो या गलत तरीके से, बस पकड़े नहीं गए हों. मैंने कई बार देखा है कि जब सफलता साथ हो, तो समाज अनैतिकता को भी ज्यादा आसानी से स्वीकार कर लेता है.
जब सफलता अनैतिकता को माफ कर देती है
क्या हम इसे पैसे की सफलता के मामले में नहीं देखते? हमारे समाज में रिश्वत और भ्रष्टाचार कोई अनजानी चीज नहीं है. फिर भी कितने लोग सिर्फ इसलिए परिवार के किसी सदस्य से रिश्ता खत्म कर देते हैं कि वह भ्रष्ट है या उसकी दौलत गलत तरीकों से आई है? कितनी बार उस व्यक्ति की इज्जत सिर्फ इसलिए परिवार में कम हो जाती है क्योंकि सब जानते हैं कि पैसा ईमानदारी से नहीं कमाया गया था? बहुत कम.
लेकिन क्या हमने इसका उल्टा नहीं देखा है? एक ऐसा रिश्तेदार जो सफल नहीं है या गरीब है और उसे सिर्फ इसलिए कम इज्जत मिलती है क्योंकि उसने जिंदगी में ज्यादा हासिल नहीं किया है.
ये वही लोग हैं जिनकी राय परिवार की बैठकों में मायने नहीं रखती, जिनकी सलाह को कम महत्व दिया जाता है और जो धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जिन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता, क्योंकि उनके पास पैसा, सफल करियर या सामाजिक रुतबा नहीं है.
लेकिन क्या हमने इसका उल्टा नहीं देखा है? एक ऐसा रिश्तेदार जो सफल नहीं है या गरीब है और उसे सिर्फ इसलिए कम इज्जत मिलती है क्योंकि उसने जिंदगी में ज्यादा हासिल नहीं किया है? ऐसा व्यक्ति जिसकी राय परिवार की बैठकों में कम मायने रखती है, जिसकी सलाह को कम महत्व दिया जाता है और जो धीरे-धीरे ऐसा व्यक्ति बन जाता है जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता, क्योंकि उसके पास पैसा, सफल करियर या सामाजिक रुतबा नहीं है.
यहीं से बच्चों पर पड़ने वाला दबाव ज्यादा समझ में आने लगता है. बच्चों पर बहुत ज्यादा दबाव डालने के लिए अक्सर माता-पिता की आलोचना की जाती है और इसमें सच्चाई भी है, लेकिन माता-पिता खुद भी इसी संस्कृति में बड़े हुए हैं और वे भी इन्हीं नियमों को समझते हैं.
वे जानते हैं कि सफलता सम्मान दिलाती है और असफलता शर्म. और वे अक्सर यह सीख अपने बच्चों को भी दे देते हैं, कई बार बिना यह समझे कि वे ऐसा कर रहे हैं. वे उसी भाषा में बात करते हैं, क्योंकि उन्होंने भी समाज का यही तरीका सीखा है.
साहिल के मामले में जातिगत भेदभाव की कोई भूमिका थी या नहीं, इसकी अभी जांच की जानी बाकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे बड़े और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव को आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता है.
और यहां भी मुझे लगता है कि शर्म की संस्कृति की भूमिका है. इसका एक सबसे ताकतवर हथियार ‘मेरिट’ यानी योग्यता पर ज़रूरत से ज्यादा जोर देना है, जबकि यह स्वीकार नहीं किया जाता कि ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं की वजह से ही आरक्षण की ज़रूरत पड़ी थी.
एक छात्र सिर्फ छात्र नहीं रह जाता. उसके नंबर, रैंक, जाति, आरक्षण और यह सवाल कि वह वहां होने का “हकदार” है या नहीं, ये सभी बातें इस बात का हिस्सा बन जाती हैं कि दूसरे लोग उसकी कीमत कैसे तय करते हैं.
हम लोगों को किस बात के लिए शर्मिंदा करते हैं?
इसी शर्म की संस्कृति को इससे कहीं ज्यादा गंभीर चीज में भी देखा जा सकता है: तथाकथित “ऑनर किलिंग” यानी सम्मान के नाम पर हत्या. समाज की शर्म और बेइज्जती का सामना करने के बजाय बेटियों को मार देना बेहतर समझा जाता है.
भले ही परीक्षा में फेल होना और ऑनर किलिंग एक-दूसरे से बहुत अलग लगें, लेकिन दोनों ऐसी संस्कृति से निकलते हैं जिसमें व्यक्ति की जिंदगी पर समाज की शर्म को बहुत ज्यादा ताकत दे दी जाती है.
अब इसकी तुलना राजेश रंजन से कीजिए, जिन्हें पप्पू यादव के नाम से जाना जाता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और बिहार की पूर्णिया सीट से जीत हासिल की. अपने चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपने खिलाफ 41 आपराधिक मामले घोषित किए थे. इनमें हत्या की कोशिश, अपहरण और जबरन वसूली जैसे मामले शामिल थे.
यह ऐसे व्यक्ति हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामलों का इतना बड़ा सार्वजनिक रिकॉर्ड है, फिर भी मतदाताओं ने उन्हें संसद में अपना प्रतिनिधि बनने के योग्य माना.
पप्पू यादव और साहिल ने कथित तौर पर कुछ गलत किया हो सकता है, लेकिन उनके कामों पर जनता की प्रतिक्रिया की तुलना नहीं की जा सकती. किसे ज्यादा शर्म का सामना करना पड़ा और क्यों? किसे ज्यादा कड़ी नजर से देखा गया और क्यों?
उनमें से एक व्यक्ति को शर्म असहनीय लगी, दूसरे को नहीं. समाज ने यादव को सिर्फ सजा नहीं दी, बल्कि उन्हें इनाम भी दिया.
आखिर हमारे समाज में शर्म किस चीज से पैदा होती है? क्या यह जरूरी तौर पर कुछ नैतिक रूप से गलत करना है, या फिर असफल दिखाई देना या किसी कमजोर समुदाय से आना है?
हम ऐसी दुखद घटनाओं पर जितनी चाहें बहस कर सकते हैं, लेकिन जब तक हम जमीनी स्तर की समस्याओं पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा. कोई और युवा होगा, एक और दुखद घटना होगी और फिर हमारे पास बहस करने के लिए एक और मुद्दा होगा.
आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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