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Friday, 25 September, 2026
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केरल-पंजाब ने प्रवासी पैसे को अपनी अर्थव्यवस्था से जोड़ा, कश्मीर क्यों नहीं बना पाया ऐसा मॉडल?

कश्मीरी डायस्पोरा द्वारा घर भेजे गए पैसे का डेटा अभी भी ठीक से ट्रैक नहीं किया जाता है. कश्मीर अपने लोगों को बिना किसी फ़ायदे के खो देता है, जबकि भारत के दूसरे राज्य, जहां से लोग काम के लिए बाहर जाते हैं, उन्हें कम से कम अपने लोगों से पैसे तो मिलते हैं.

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कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था से अलग एक ऐसी जमीनी हकीकत भी है, जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं चलेगा. कश्मीर के युवाओं का पलायन सिर्फ आतंकवाद से बचने के लिए नहीं है. यह धीरे-धीरे होने वाला पलायन है, जो दो चरणों में होता है. छात्र पहले डिग्री लेने के लिए बाहर जाते हैं, फिर नौकरी के लिए वहीं रुक जाते हैं और वापस नहीं लौटते. इसकी वजह यह है कि जो लोग किसी खास क्षेत्र में पढ़ाई या काम के लिए बाहर जाते हैं, वे अक्सर वहीं बस जाते हैं, जबकि उनके पीछे स्थानीय विश्वविद्यालयों की सीटें खाली रह जाती हैं.

शिक्षा में खाली सीटें इसका एक हिस्सा हैं. दूसरा हिस्सा बड़ी कंपनियों और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों की कमी है. जो लोग कश्मीर से बाहर निकल भी जाते हैं, उनमें से कई वास्तव में किसी समस्या से बच नहीं पाते. घाटी से बाहर जाकर कई लोग अपनी योग्यता के मुताबिक काम नहीं कर पाते. कोई वकील कानून से जुड़े काम के बजाय कुछ और काम करता है, तो कोई इंजीनियर सेल्स में काम करता है. यानी वे स्थानीय स्तर पर नौकरी न मिलने की समस्या को बाहर के शहर में अस्थिरता के साथ बदल लेते हैं, जहां उनके पास परिवार का सहारा भी नहीं होता.

हालांकि भारत के दूसरे हिस्सों में भी ऐसा पलायन होता है, लेकिन कश्मीर ने बाहर गए लोगों से पैसे वापस आने का कोई व्यवस्थित रास्ता नहीं बनाया है. यह एक ऐसा पैटर्न है जिसे आंकड़ों से मापा जा सकता है और जो लगातार बढ़ रहा है. इसे सिर्फ भावनात्मक मुद्दे के तौर पर नहीं, बल्कि आर्थिक मुद्दे के तौर पर भी देखा जाना चाहिए.

2026 की शुरुआत तक जम्मू-कश्मीर में बेरोजगारी दर 6.7 प्रतिशत थी, जो देश की 3.5 प्रतिशत की औसत बेरोजगारी दर से करीब दोगुनी है. ये आंकड़े खुद जम्मू-कश्मीर सरकार ने विधानसभा के सामने रखे हैं.

15 से 29 साल की उम्र के युवाओं की बात करें तो तस्वीर और भी गंभीर है. 2023-24 में इस उम्र वर्ग में बेरोजगारी दर 17.4 प्रतिशत थी, जबकि देश में यह आंकड़ा 10.2 प्रतिशत था. उसी साल एक तिमाही में कश्मीर के शहरी इलाकों में करीब एक-तिहाई युवा बेरोजगार थे. यह देश में दर्ज ऐसा सबसे ऊंचा आंकड़ा था.

3.49 लाख से ज्यादा युवा इस समय केंद्र शासित प्रदेश के जिला रोजगार और परामर्श केंद्रों में बेरोजगार के तौर पर पंजीकृत हैं.

इनमें एक लाख से ज्यादा युवाओं के पास पोस्टग्रेजुएट या ग्रेजुएशन की डिग्री है. कश्मीर के अपने आर्थिक सर्वे के मुताबिक, पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी दर करीब 46 प्रतिशत है. यह आंकड़ा शायद कम है, क्योंकि सरकारी रोजगार केंद्र में पंजीकरण कराने के लिए धैर्य और काफी कागजी प्रक्रिया की जरूरत होती है. कई युवा, खासकर वे जो पहले से विदेश जाने की तैयारी कर रहे हैं, इस प्रक्रिया से गुजरना नहीं चाहते.

घाटी छोड़ने के बाद भी इन युवा कश्मीरियों को स्थिर जिंदगी मिलने की गारंटी नहीं होती. कई लोगों को गुजारा करने में मुश्किल होती है या उन्हें ऐसी नौकरियां करनी पड़ती हैं, जो उनकी योग्यता और डिग्री से मेल नहीं खातीं. यह स्थिति कुछ वैसी ही दिखती है, जैसी 2000 के दशक में कई बड़े शहरों के युवाओं के बीच अमेरिका जाकर बेहतर जिंदगी बनाने के सपने के रूप में दिखती थी.

इस बीच, घाटी से बाहर जाने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसकी वजह से स्थानीय संस्थान भी साफ तौर पर खाली होते जा रहे हैं. एक व्यापक रूप से बताए जाने वाले अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब 30,000 छात्र जम्मू-कश्मीर से विदेश में पढ़ाई करने के लिए बाहर जाते हैं. वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और ऐसे दूसरे विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में डिग्री लेने जाते हैं, जो कश्मीर की अपनी यूनिवर्सिटियां ज्यादातर उपलब्ध नहीं कराती हैं. यह सिलसिला कई सालों से चल रहा है. और आज अगर कश्मीर की यूनिवर्सिटियों ने ऐसे कोर्स शुरू भी किए हैं, तो वे कश्मीर के रोजगार बाजार के लिए प्रासंगिक नहीं हैं.

सिर्फ कश्मीर यूनिवर्सिटी में ही हाल के वर्षों में सैकड़ों पोस्टग्रेजुएट सीटें खाली रह गई हैं. 2023 में अकेले हजरतबल के मुख्य कैंपस में करीब 124 पोस्टग्रेजुएट सीटें खाली रह गई थीं. वहीं घाटी के परिवार दिल्ली, बेंगलुरु या विदेश में उन्हीं डिग्रियों की पढ़ाई के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च कर रहे थे.

दो चरणों में पलायन

कश्मीर के पलायन को अलग बनाने वाली बात यह है कि यह दो चरणों में होता है और हर चरण स्थानीय अर्थव्यवस्था से अलग तरीके से पैसा और क्षमता बाहर ले जाता है.

पहला पलायन उच्च शिक्षा के समय शुरू होता है. छात्र जब भारत के बड़े शहरों या ब्रिटेन जाते हैं, तो वे सिर्फ अपनी पढ़ाई की फीस ही बाहर नहीं ले जाते. उनके साथ छात्र समुदाय से जुड़ी पूरी अर्थव्यवस्था भी बाहर चली जाती है. इसमें किराया, स्थानीय खर्च, इंटर्नशिप और कॉलेज के आसपास के छोटे कारोबार शामिल हैं. इसका मतलब यह है कि कश्मीर ऐसे शिक्षा क्षेत्र को पैसा देता है, जिसका वह मालिक नहीं है. इस खर्च से पैदा होने वाला आर्थिक फायदा किसी दूसरे शहर को मिलता है.

ग्रेजुएशन के बाद दूसरा पलायन शुरू होता है, जब ये छात्र वापस लौटने पर अपने इलाके में नौकरी नहीं ढूंढ पाते. कश्मीर में निजी क्षेत्र काफी छोटा है. लंबे समय से पर्यटन, बागवानी और हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार रहे हैं. ये उद्योग उस तरह के कामगारों के लिए बने थे, जिस तरह की श्रम शक्ति आज इलाके में मौजूद है, उससे अलग जरूरतों के लिए. ये कंप्यूटर साइंस या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई करने वाले ग्रेजुएट्स के लिए व्हाइट-कॉलर और टेक्नोलॉजी से जुड़ी नौकरियां पैदा नहीं करते. इसलिए ग्रेजुएट एक बार फिर बाहर निकल जाते हैं. पहले भारत के शहरों की ओर और फिर धीरे-धीरे अमेरिका, ब्रिटेन और सबसे ज्यादा खाड़ी देशों की ओर.

यहीं दूसरे भारतीय राज्यों से तुलना करना उपयोगी हो जाता है और कश्मीर की स्थिति अलग दिखाई देती है.

केरल और पंजाब जैसे राज्यों ने कई दशकों में ऐसे औपचारिक रास्ते बनाए हैं, जिनसे विदेशों में रहने वाले लोगों का पैसा वापस राज्य में आ सके. इसमें रेमिटेंस के रास्ते, NRI निवेश योजनाएं, जमीन और प्रॉपर्टी के ऐसे बाजार शामिल हैं, जो वापस लौटने वाले या बाहर रहकर कमाने वाले लोगों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. यहां तक कि राज्य सरकारों में विदेशों में रहने वाले लोगों से जुड़े मामलों के लिए अलग विभाग भी हैं. खास तौर पर केरल की अर्थव्यवस्था को खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस से काफी सहारा मिलता है. इस पैसे का हिसाब रखा जाता है, इसे ट्रैक किया जाता है और स्थानीय स्तर पर दोबारा निवेश किया जाता है. इसके लिए वहां काफी विकसित वित्तीय व्यवस्था मौजूद है.

कश्मीर में ऐसा कोई रास्ता नहीं है. रहने के खर्च, ट्यूशन फीस, आवेदन शुल्क और विदेश में अपनी जिंदगी बनाने में लगने वाले कई सालों के दौरान पैसा बाहर जाता है, लेकिन इसे वापस लाने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं है. संस्थान इन रास्तों से जुड़े बढ़े हुए सुरक्षा जोखिमों का सावधानी से आकलन कर सकते हैं, ताकि नए प्रयोगों के लिए जगह बनाई जा सके, जिसे अब हम ऑरेंज इकोनॉमी कहते हैं.

कश्मीरी प्रवासियों की ओर से घर भेजे जाने वाले पैसे का आंकड़ा अभी भी ठीक से दर्ज नहीं किया जाता. डेटा की यह कमी भी इस पूरी कहानी का एक हिस्सा है. इसका मतलब है कि कश्मीर अपने लोगों को बिना किसी आर्थिक लाभ के बाहर खो देता है, जबकि भारत के दूसरे ऐसे राज्यों को कम से कम अपने बाहर गए लोगों से पैसा वापस मिलता है. जो कमाई वापस आती भी है, वह आमतौर पर परिवार के लोगों को भेजे गए पैसे के रूप में अनौपचारिक तरीके से आती है, न कि किसी व्यवस्थित निवेश के रूप में. इसलिए यह पैसा केरल या पंजाब की प्रवासी अर्थव्यवस्थाओं की तरह स्थानीय कारोबार शुरू करने में बहुत कम बदल पाता है.

यह तस्वीर स्थिर नहीं है. जम्मू-कश्मीर की स्टार्ट-अप पॉलिसी 2024-27, NIT श्रीनगर, IIT जम्मू, IIM जम्मू और IUST अवंतीपोरा में मौजूद इनक्यूबेटर और श्रीनगर में सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क का केंद्र, स्थानीय स्तर पर युवाओं और प्रतिभाओं को काम देने की क्षमता बढ़ाने की एक वास्तविक और हाल की कोशिश है. कश्मीर में अब 1,000 से ज्यादा रजिस्टर्ड स्टार्टअप हैं. घाटी में मौजूद कुछ स्टार्टअप ने राष्ट्रीय मंचों पर भी सफलतापूर्वक अपनी योजनाएं पेश की हैं. स्थानीय डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप ने वास्तव में स्थानीय स्तर पर नौकरियां पैदा की हैं, जिन्हें देखा जा सकता है.

लेकिन रजिस्ट्रेशन के आंकड़े असली स्थिति को जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाते हैं. इनमें से बहुत कम स्टार्टअप इतने बड़े हुए हैं कि वे हर साल घाटी से बाहर जाने वाली विशेषज्ञता रखने वाली और विदेश में पढ़ी प्रतिभाओं को नौकरी दे सकें. 1,000 रजिस्टर्ड स्टार्टअप का मतलब 1,000 ऐसे नियोक्ता नहीं हैं जो वास्तव में काम कर रहे हों. यहां बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने स्टार्टअप वास्तव में सैलरी देते हैं और अपने दूसरे साल के बाद भी टिके रहते हैं.

और यह सिर्फ AI या टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों की बात नहीं है. यह सोशल साइंस जैसे क्षेत्रों पर भी लागू होता है, खासकर रिसर्च के क्षेत्र में. यहां हम अभी तक स्वतंत्र रिसर्च की विशेषज्ञता या ऐसे संस्थान विकसित नहीं कर पाए हैं, जो वास्तविक जीवन की समस्याओं या नीतियों से जुड़े मुद्दों पर काम करते हों.

इसकी असली कीमत क्या है

कश्मीर के युवाओं के पलायन की असली कीमत सिर्फ कुछ हजार कुशल कामगारों की कमी नहीं है. असली नुकसान उन संस्थानों, पूंजी और मार्गदर्शन के नेटवर्क की कमी है, जिन्हें कुशल लोग किसी दूसरी जगह एक बड़ी संख्या में बसने के बाद वापस लौटकर आमतौर पर बनाते हैं. यही धीरे-धीरे बढ़ने वाला असर है, जिसने बेंगलुरु को टेक हब बनाया या केरल के खाड़ी देशों से जुड़े रास्ते को अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार बनाया.

जब तक कश्मीर ऐसे संगठन नहीं बनाता, जो वहां से निकलने वाले ग्रेजुएट्स को रोजगार दे सकें, और साथ ही ऐसे वित्तीय और संस्थागत रास्ते नहीं बनाता, जिनसे विदेशों में बसे लोगों की पूंजी और विशेषज्ञता को व्यवस्थित तरीके से वापस लाया जा सके और उसका हिसाब रखा जा सके और दोबारा निवेश किया जा सके, तब तक श्रीनगर से जाने वाली हर फ्लाइट सिर्फ एक छात्र की महत्वाकांक्षा को नहीं दिखाएगी. वह घाटी की भविष्य की आर्थिक क्षमता का किसी दूसरे शहर में बार-बार और थोड़ा-थोड़ा हस्तांतरण भी दिखाती रहेगी.

तहमीना रिज़वी, PhD स्कॉलर हैं और साउथ एशिया में महिलाओं, शांति और सुरक्षा से जुड़े विषयों की विशेषज्ञ हैं. उनका फोकस अफ़ग़ान प्रवासन और कश्मीर क्षेत्र पर है. वह @TehmeenaRizvi पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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