गोसाईं समेत कई वकीलों की दायर की गई रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार (GNCTD) का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों की बकाया फीस जारी करने में लगातार हो रही प्रशासनिक देरी और प्रक्रियागत अड़चनों पर कड़ी आपत्ति जताई है. खासकर राजस्व विभाग के मामलों में यह समस्या सामने आई है.
दिप्रिंट से बात करने वाले याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उनके बिल कई सालों से लंबित हैं. कुछ बिल तो संबंधित विभाग तक प्रक्रिया के लिए पहुंचने से पहले ही अटक गए. उन्होंने यह भी बताया कि बार-बार सवाल पूछे जाने और आखिर में कितनी रकम मिलेगी, इसे लेकर अनिश्चितता ने प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया है और उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा है.
सरकार के पैनल में शामिल वकील अपनी फीस के बिल GNCTD के तय ऑनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए डिजिटल रूप से जमा करते हैं. इस पोर्टल को भुगतान की प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए शुरू किया गया था. लेकिन हाई कोर्ट में पेश होने वाले वकीलों ने बताया कि राजस्व विभाग ने इस प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक चलने वाली देरी में बदल दिया है.
9 सितंबर को जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने प्रशासनिक प्रक्रिया को आसान बनाने और फीस भुगतान की प्रक्रिया में पारदर्शिता वापस लाने के लिए सात बाध्यकारी निर्देश जारी किए. इसके जवाब में GNCTD की ओर से पेश वकील तुषार सन्नू ने दो स्टेटस रिपोर्ट पेश कीं और बताया कि सचिव-सह-मंडलायुक्त (राजस्व) की अध्यक्षता में उच्च स्तर की बैठकें चल रही हैं.
डिप्टी कमिश्नर (मुख्यालय) अजय कुमार ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश होकर भरोसा दिलाया कि बिलों में कमियों को दूर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं. कुमार को राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ समन्वय करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी दी गई है, ताकि ऑर्डर शीट के आधार पर BTF जारी किए जा सकें.
सिंगल विंडो पोर्टल 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद शुरू किया गया था. उस आदेश में कहा गया था, “किसी भी हालत में सरकार या विभाग द्वारा नियुक्त वकील को अपने ही क्लाइंट, खासकर सरकार या उसकी किसी एजेंसी के खिलाफ मुकदमा करने और अपनी पेशेवर फीस के भुगतान के लिए कानूनी रास्ता अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.”
‘ऑनलाइन सिस्टम काम नहीं करता’
याचिकाकर्ताओं में से एक एडवोकेट ऋषिकेश कुमार ने अब हाई कोर्ट को बताया है कि उन्होंने जो 500 बिल जमा किए, उनमें से करीब 250 पर सवाल उठाए गए. उन्होंने बताया कि जैसे ही एक सवाल का जवाब दिया जाता है, विभाग के अधिकारी एक और सवाल उठा देते हैं. इससे बिल का भुगतान वास्तव में हो ही नहीं पाता.
इसके अलावा, एडवोकेट उदित मलिक, जिन्होंने अब पैनल से इस्तीफा दे दिया है, ने अदालत के सामने ब्रीफ ट्रांसमिशन फॉर्म (BTFs) से जुड़ी एक बड़ी खामी बताई. पोर्टल की व्यवस्था के तहत ऑनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम BTF लगाए बिना बिल जमा करने की कोशिश को अपने आप खारिज कर देता है. विभाग अक्सर BTF जारी नहीं करता, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां वकीलों ने अदालत में GNCTD का सक्रिय रूप से प्रतिनिधित्व किया है. इसकी वजह से वकील अपना काम पूरा करने के बाद भी बिल जमा नहीं कर पाते.
समस्या को और बढ़ाने वाली बात यह है कि पोर्टल बिल की स्थिति में हुए बदलाव को तुरंत नहीं दिखाता. एडवोकेट दिव्यम नंदराजोग ने हाई कोर्ट को बताया कि कभी-कभी कुछ बिल पास हो जाते हैं, लेकिन ज्यादातर बिल अटके रहते हैं.
सबसे अहम बात यह है कि सिस्टम बिल की स्थिति अपडेट नहीं करता. इससे वकीलों को पता ही नहीं चलता कि कौन से बिल पास हो चुके हैं और कौन से अभी लंबित हैं.
एडवोकेट अंजना गोसाईं ने कहा कि ऑनलाइन सिस्टम से भुगतान में हो रही देरी दूर नहीं हुई है. कुछ मामलों में तो इससे प्रक्रियागत मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
गोसाईं ने कहा, “यह बस आगे नहीं बढ़ रहा है. सब कुछ टुकड़ों में हो रहा है. पहले हम बिल कागज पर जमा करते थे और आखिर में वे पास हो जाते थे, कभी दो या तीन साल लग जाते थे. अब वे कहते हैं कि ऑनलाइन सिस्टम है, लेकिन ऑनलाइन सिस्टम खुद काम नहीं करता. आपसे रजिस्टर करने के लिए कहा जाता है, लेकिन फिर आप बिल अपलोड नहीं कर सकते. अगर इसे ऑनलाइन बनाया गया है, तो सिस्टम को काम भी करना चाहिए.”
गोसाईं ने बताया कि उन्होंने खुद सरकारी फीस का भुगतान न होने को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया था और इस समस्या के कारण वकीलों को सिर्फ अपना बकाया लेने के पीछे काफी समय लगाना पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, “मैं मुकदमा लड़ने वाली हूं, इसलिए मुझे पहले ही दो याचिकाएं दायर करनी पड़ी हैं. मेरी याचिका की वजह से दूसरे वकील भी इसमें शामिल हो रहे हैं और भुगतान जारी करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन होता यह है कि आप वकीलों की संख्या बढ़ाते जाते हैं, जबकि बजट वही रहता है. वे कहते हैं कि आवंटन बढ़ गया है, लेकिन भुगतान कहां है?”
उन्होंने कहा कि देरी उन वकीलों के लिए खास तौर पर मुश्किल हो सकती है जो अपनी पेशेवर कमाई के लिए सरकारी मामलों पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा, “कभी-कभी मैं कहती हूं कि मैं वरिष्ठ नागरिक हूं. कभी मुझे कहना पड़ता है कि मैं इसे अपनी वसीयत में लिख दूंगी. यह बहुत खराब स्थिति है. अगर सिस्टम ऑनलाइन है, तो उसे ठीक किया जाना चाहिए. इसके बजाय मेरे आधे स्टाफ का काम सिर्फ भुगतान के पीछे भागना रह गया है.”
उन्होंने आगे कहा, “वे डबल कॉपी मांगते हैं, आदेश की कॉपी मांगते हैं, यह पूछते हैं कि आप पेश हुए थे या नहीं, और क्या यह शर्तों के अनुसार है. एक तय फॉर्मेट है और यह काफी मुश्किल है. कभी-कभी आपको चीजें लिखनी पड़ती हैं और फिर उनकी दूसरी कॉपी भी बनानी पड़ती है.”
गोसाईं ने कहा कि बिल जमा करने के बाद भी यह सवाल बना रहता है कि बिल वास्तव में मिला भी है या नहीं. उन्होंने कहा, “बिल मिला ही नहीं. अगर आप इसे डाक से भेजते हैं, तो वे कह सकते हैं, ‘हमें बिल मिला ही नहीं.’” उन्होंने बताया कि करीब ढाई साल इंतजार करने के बाद इस साल उन्हें भुगतान का कुछ हिस्सा मिला, जबकि GNCTD से जुड़े एक दूसरे विवाद में काफी ज्यादा देरी के बाद मुकदमा करना पड़ा.
गोसाईं ने सरकारी काम करने वाले वकीलों के सामने आने वाली एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा किया. उन्हें यह तय करना पड़ सकता है कि वे सरकारी मामले लेते रहें या बिना भुगतान की फीस के पीछे भागने में अपना समय लगाएं.
उन्होंने कहा, “कुछ लोग ये नियुक्तियां इसलिए स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अच्छा मौका है या इससे उन्हें अनुभव मिलेगा. लेकिन आखिर में आपको पैसे की जरूरत होती है.” उन्होंने कहा कि भुगतान लेने के पीछे भागने में लगने वाला प्रशासनिक काम खुद भी वकीलों के दफ्तरों पर बोझ बन सकता है.
‘बिल पहली ही स्टेज पर अटक गया’
एक और याचिकाकर्ता, जिन्होंने 2025 में सत्तारूढ़ पार्टी बदलने के बाद दिल्ली सरकार के पैनल से इस्तीफा दे दिया था, ने दिप्रिंट को नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि उनका भुगतान दो साल से ज्यादा समय से लंबित था. उन्होंने कहा कि उन्होंने बिल जमा किए और आखिरकार उन्हें प्रक्रिया में लेने के लिए एक आवेदन भी दाखिल करना पड़ा.
उन्होंने कहा कि समस्या बस इतनी थी कि बिल सिस्टम में आगे ही नहीं बढ़ रहे थे.
प्रक्रिया समझाते हुए याचिकाकर्ता ने बताया कि बिल सबसे पहले एक सेंट्रल डायरी में जाते हैं, फिर संबंधित विभाग को भेजे जाते हैं और आखिर में उस क्षेत्रीय कार्यालय को भेजे जाते हैं, जिसके लिए वकील ने काम किया था.
उन्होंने कहा, “एक सेंट्रल डायरी होती है. वहां से बिल संबंधित विभाग को भेजा जाता है. यह राजस्व, स्वास्थ्य, सिंचाई या कोई भी दूसरा विभाग हो सकता है. इसके बाद इसे उस क्षेत्रीय कार्यालय को भेजा जाता है, जिसके लिए आपने काम किया था. समस्या यह थी कि बिल पहली ही स्टेज पर, यानी सेंट्रल डायरी में अटक रहा था. इसे विभाग तक भेजा ही नहीं जा रहा था.”
उन्होंने आगे कहा, “पैसा तो पैसा है. अगर आपको नहीं मिलता, तो नहीं मिलता. यह मुश्किल है. कोई भी यह काम दान के लिए नहीं कर रहा है. सरकार की अधिसूचना में खुद फीस का ढांचा और काम के लिए मिलने वाली रकम साफ लिखी है. आपके द्वारा जमा किए गए बिल के बदले आपको यही रकम मिलने की गारंटी होती है.”
याचिकाकर्ता ने कहा कि इस देरी का असर वकील के दफ्तर के बाकी कामकाज पर भी पड़ता है. उन्होंने कहा, “मुझे यह सुनिश्चित करना होता है कि मेरे क्लर्क और जूनियर हर महीने की पहली तारीख को अपनी सैलरी पा जाएं, क्योंकि मुझे पता है कि उनकी भी अपनी भुगतान की जिम्मेदारियां हैं. यह एक पूरा सिस्टम है. जब आपका खुद का भुगतान देर से होता है, तो उस सिस्टम को संभालना मुश्किल हो जाता है.”
हाई कोर्ट ने अब दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि ऑनलाइन पोर्टल को इस तरह अपडेट किया जाए कि हर वकील के नाम के सामने सभी लंबित बिल साफ तौर पर दिखाई दें. जहां कोर्ट की ऑर्डर शीट से यह पुष्टि होती है कि वकील दिल्ली सरकार की ओर से अदालत में पेश हुआ था, वहां जरूरी प्रशासनिक कार्रवाई करके गायब BTFs जारी किए जाएं.
हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ऐसा सिस्टम बनाया जाए, जिसमें BTF जारी नहीं होने पर भी वकील बिल अपलोड कर सकें. कोर्ट ने सरकार से यह विचार करने को भी कहा कि कानून और न्याय विभाग से एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो वकीलों के साथ सीधे बात करके सवालों का समाधान कराने का काम करे.
अब अधिकारियों को BTF की फिजिकल कॉपी मांगने की अनुमति नहीं होगी, अगर बिल में BTF नंबर पहले से दिया गया है. हाई कोर्ट के आदेश में यह भी कहा गया है कि सभी लंबित बिलों का जल्द से जल्द भुगतान किया जाए और दिल्ली सरकार को अगली सुनवाई, जो 4 नवंबर को है, से पहले अनुपालन की स्थिति की रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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