लखनऊ: अयोध्या राम मंदिर चंदा मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. इस हफ्ते की शुरुआत में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने जो चार्जशीट दाखिल की है, उस पर सवाल उठ रहे हैं. सवाल यह भी है कि SIT ने बैंक कर्मचारियों या श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारियों को आरोपी क्यों नहीं बनाया.
चार्जशीट में गिरफ्तार किए गए आठ आरोपियों के नाम हैं. इनके नाम अविनाश शुक्ला, अनकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे, रामाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव हैं. इन सभी के नाम ट्रस्ट की FIR में भी थे.
हालांकि, बैंक के उन कर्मचारियों को आरोपी नहीं बनाया गया है, जिनकी भूमिका की शुरुआती SIT जांच के दौरान जांच की गई थी.
अयोध्या पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, बैंक कर्मचारियों की कुछ तय जिम्मेदारियां थीं. इनमें मंदिर में आने वाले चंदे की गिनती करना और पैसे को बैंक में जमा कराना शामिल था. शुरुआती SIT जांच में गिनती की प्रक्रिया और बैंक अधिकारियों को दी गई जिम्मेदारियों में कुछ कमियां भी सामने आई थीं. बाद में कम से कम दो बैंक कर्मचारियों की भूमिका की जांच की गई, लेकिन इनमें से किसी को भी चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया.
अयोध्या पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती जांच में यह भी सामने आया था कि चंदे की गिनती करने वाले कर्मचारियों के साथ बैंक अधिकारियों की ड्यूटी भी बारी-बारी से लगाई जानी थी. बैंक अधिकारियों की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी थी कि गिनती करने वाले कर्मचारी तय यूनिफॉर्म पहनें. लेकिन बताया गया है कि यह व्यवस्था लागू नहीं की गई.
चार्जशीट में ट्रस्ट के पदाधिकारियों चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव का नाम भी नहीं है. जांच के दौरान इनकी भूमिकाओं की भी जांच की गई थी. चंपत राय और अनिल मिश्रा ने बाद में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में क्रमशः महासचिव और ट्रस्टी के पद से इस्तीफा दे दिया.
बैंक अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि चंदे की गिनती और उसे बैंक में जमा करने की प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों की जिम्मेदारी आखिर किस पर तय की गई. यह सवाल भी उठ रहे हैं कि ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों की जिम्मेदारियों की जांच किस हद तक की गई.
रिटायर्ड IPS अधिकारी और विपक्षी नेताओं ने चार्जशीट पर सवाल उठाए
रिटायर्ड IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के DGP को पत्र लिखा है. उन्होंने कहा है कि जांच में सैकड़ों मामलों में नकदी गायब होने और निगरानी में कमियां सामने आने के बावजूद अंतिम चार्जशीट में केवल आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है. उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(9) के तहत नए सिरे से जांच कराने की मांग की है.
ठाकुर के पत्र के मुताबिक, मीडिया रिपोर्टों और दूसरी जानकारियों से पता चला कि शुरुआती SIT जांच में 70 अलग-अलग घटनाएं और निगरानी में गंभीर कमियां सामने आई थीं. उन्होंने दावा किया कि बाद की विस्तृत जांच में यह संख्या बढ़कर 105 हो गई. इनमें ऐसे मामले भी शामिल थे, जिनमें कथित तौर पर बिना अनुमति नकदी निकाल ली गई या छिपा दी गई.
ठाकुर ने यह भी कहा कि जांच में सामने आया था कि चंदे की गिनती में बाहर के लोगों और कुछ दूसरे लोगों ने भी मदद की थी. उन्होंने कहा कि SIT ने CCTV फुटेज, गवाहों के बयान, बैंकिंग और वित्तीय रिकॉर्ड और एक बड़ी फॉरेंसिक ऑडिट की भी जांच की थी.
पूर्व अयोध्या विधायक और समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडे ने भी आरोप लगाया कि कथित चोरी के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाया गया है. पांडे ने आरोप लगाया, “सीधी बात यह है कि छोटी मछलियां पकड़ी गई हैं, जबकि बड़ी मछलियों को छोड़ दिया गया है. FIR में नाम वाले आठ लोगों में से ज्यादातर या तो अनिल मिश्रा या चंपत राय के करीबी थे. ट्रस्ट में दोनों के पास ताकतवर पद थे. इतनी बड़े स्तर की चोरी बिना मिलीभगत के नहीं हो सकती थी.”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई बैंक कर्मचारियों को बचा लिया गया और सवाल उठाया कि उन्हें आरोपी क्यों नहीं बनाया गया.
कांग्रेस नेता शरद शुक्ला ने भी इस मामले की शुरुआत से ही सवाल उठाए हैं. उन्होंने दिप्रिंट के साथ एक इंटरव्यू में चार्जशीट पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, “पूरे मामले को लेकर जनता के सामने साफ तस्वीर होनी चाहिए. कई कड़ियों की जांच के लिए SIT बनाई गई थी और उन कड़ियों पर अभी भी सवाल हैं. चंदे की गिनती किसने की? निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? रकम की जांच किसने की? बैंक तक पहुंचने तक नकदी की जिम्मेदारी किसकी थी? बैंक में जमा रकम की जांच किसने की? और अगर बैंक अधिकारियों की इस प्रक्रिया में तय जिम्मेदारी थी, तो उस जिम्मेदारी के लिए जवाबदेही किसकी तय की गई? क्या CCTV फुटेज से उनकी गतिविधियों और आने-जाने की जांच की गई? अगर जांच में गड़बड़ियां मिलीं, तो इस पर क्या निष्कर्ष निकाला गया? चार्जशीट में उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है.”
उन्होंने आगे कहा, “अयोध्या में यह चर्चा है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा को इस मामले में सरकारी गवाह बनाया जा सकता है.”
अयोध्या के SSP और नई SIT के सदस्य गौरव ग्रोवर ने इस दावे को खारिज कर दिया.
ग्रोवर ने कहा कि इस मामले में 173 लोगों को गवाह बनाया गया है. इनमें राय और मिश्रा भी शामिल हैं. लेकिन उन्होंने साफ किया कि दोनों में से किसी को भी सरकारी गवाह या अप्रूवर नहीं बनाया गया है.
ग्रोवर ने दिप्रिंट से कहा, “सोशल मीडिया के जरिए आधी-अधूरी जानकारी दी जा रही है. यह सच नहीं है.”
अयोध्या पुलिस के दूसरे अधिकारियों ने भी कहा कि 173 लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं. इनमें मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी भी शामिल हैं. अधिकारियों ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जिन कर्मचारियों पर आरोप लगे हैं, वे ट्रस्ट के पदाधिकारियों की निगरानी में काम करते थे.
अधिकारियों के मुताबिक, अभी तक ट्रस्ट के किसी भी पदाधिकारी के खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हुआ है. इसलिए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई.
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने चार्जशीट पर अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया है.
दूसरी SIT जांच में कैसे आई
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुप्रीम कोर्ट की जुलाई में की गई टिप्पणियों के बाद दूसरी SIT बनाने का आदेश दिया था. इस टीम में लखनऊ रेंज की IG किरण एस, अयोध्या रेंज के DIG सोमन वर्मा और अयोध्या के SSP गौरव ग्रोवर शामिल हैं.
इससे पहले 13 जून को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने आदित्यनाथ से चंदे की कथित चोरी की SIT जांच कराने की मांग की थी.
इसके बाद लखनऊ के कमिश्नर विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय SIT बनाई गई थी.
मामले में पहली FIR 25 जून को राम जन्मभूमि थाने में दर्ज हुई थी. यह FIR ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की लिखित शिकायत पर दर्ज की गई थी. इसमें उन आठ आरोपियों के नाम थे, जिन्हें बाद में गिरफ्तार किया गया. इसके अलावा कुछ अज्ञात लोगों का भी नाम था.
बाद में SIT की शुरुआती रिपोर्ट में चंपत राय को क्लीन चिट दे दी गई थी. हालांकि, अनिल मिश्रा और कुछ बैंक कर्मचारी जांच के दायरे में बने रहे. इसके बावजूद चार्जशीट में उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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