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Sunday, 27 September, 2026
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शहबाज का UNGA भाषण: भुट्टो से इमरान तक, पाकिस्तान ने कश्मीर के लिए कैसे इस्तेमाल किया UN मंच

दशकों से पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कश्मीर पर अपनी बात रखने के लिए UN के ग्लोबल मंच का इस्तेमाल किया है. यह लगभग उसी पैटर्न को फॉलो करता है.

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नई दिल्ली: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र में अपनी बात रखी. इसी बीच, पिछले साल 80वें UNGA में दिए उनके भाषण का एक साल पुराना हिस्सा फिर से चर्चा में आ गया है. इसमें उन्होंने आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान के बलिदानों का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था, “अगर इन आतंकवादियों का हमने सामना नहीं किया होता, तो वे न्यूयॉर्क और लंदन की सड़कों पर घूम रहे होते और पता नहीं सुदूर पूर्व में कहां होते.”

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के तौर पर तीसरी बार UNGA को संबोधित करते हुए शरीफ ने मई 2025 में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए चार दिन के युद्ध का भी जिक्र किया था. उन्होंने कहा था, “हमने युद्ध जीत लिया है और अब हम दुनिया के अपने हिस्से में शांति जीतना चाहते हैं.” इसके बाद, कश्मीर का साफ नाम लिए बिना, उन्होंने भारत के साथ “सभी लंबित मुद्दों पर बातचीत करने के लिए एक व्यापक, पूरी और नतीजे देने वाली बातचीत” का प्रस्ताव रखा था.

यह एक लंबे समय से चले आ रहे पैटर्न का हिस्सा था. दशकों से पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक मंच का इस्तेमाल भारत के मुकाबले कश्मीर को लेकर अपनी बात रखने के लिए करता रहा है. आम तौर पर उसका तरीका यह रहा है: संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और ऐतिहासिक घटनाओं का हवाला देते हुए कश्मीर के आत्मनिर्णय की बात उठाना, भारत पर कश्मीरियों के साथ “बुरा व्यवहार” करने का आरोप लगाना, और फिर बातचीत या शांति का प्रस्ताव देना.

यह सिलसिला पाकिस्तानी नेताओं के UNGA भाषणों में दिखाई देता है. इसमें 1965 में जुल्फिकार अली भुट्टो के भाषण से लेकर 2019 में इमरान खान के विवादित भाषण और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पिछले साल शहबाज शरीफ के भाषण तक यह बात दिखाई देती है.

चार दिन के युद्ध का जिक्र करते हुए शरीफ ने कहा था कि पाकिस्तान ने भारत को “बेइज्जती के साथ वापस भेज दिया और उसे करारा झटका दिया.” उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान मजबूत स्थिति में होने के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप की मदद से हुए युद्धविराम के लिए राजी हुआ. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को “शांति का आदमी” बताते हुए उनकी तारीफ की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा, “अगर उन्होंने (ट्रंप ने) समय पर और निर्णायक तरीके से दखल नहीं दिया होता, तो पूरी तरह से युद्ध के नतीजे विनाशकारी होते. कौन जिंदा बचता और बताता कि क्या हुआ. इसलिए, हमारे क्षेत्र में शांति बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप के शानदार और बेहतरीन योगदान को देखते हुए पाकिस्तान ने उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया.”

शरीफ ने चीन, कतर, तुर्की, ईरान, सऊदी अरब, अजरबैजान, यूएई और संयुक्त राष्ट्र महासचिव को भी धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि एक महत्वपूर्ण समय पर इन सभी ने पाकिस्तान को कूटनीतिक समर्थन दिया.

जुल्फिकार अली भुट्टो के 1965 के UNGA भाषण से लेकर नवाज शरीफ के 2015 और 2016 के भाषणों तक, ThePrint ने उन सभी मौकों को देखा है जब पाकिस्तान ने वैश्विक मंच पर कश्मीर का मुद्दा उठाने के लिए UNGA का इस्तेमाल किया और भारत ने उसका जवाब कैसे दिया.

2019 में UNGA में इमरान खान

तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान का सितंबर 2019 का भाषण हाल के समय में किसी पाकिस्तानी नेता के ज्यादा महत्वपूर्ण UNGA भाषणों में से एक रहा. उस साल पुलवामा में आतंकी हमला हुआ था, उसके बाद बालाकोट में हमले हुए थे. UNGA सत्र से सिर्फ एक महीने से कुछ ज्यादा पहले भारत ने अनुच्छेद 370 भी हटाया था.

जहां आम तौर पर भाषण के लिए 15 मिनट का समय दिया जाता है, वहीं इमरान ने करीब 50 मिनट तक भाषण दिया. उन्होंने शुरुआत जलवायु परिवर्तन से की, लेकिन उनका असली मकसद कुछ और था. खान ने कहा, “कश्मीर ही वह वजह है, जिसकी वजह से मैं खास तौर पर यहां आया हूं.”

उन्होंने आगे कहा कि जब उनकी पार्टी पाकिस्तान में सत्ता में आई, तो उन्होंने मोदी से संपर्क किया था और कहा था, “हमारी समस्याएं एक जैसी हैं, जलवायु परिवर्तन, गरीबी…आइए व्यापार के जरिए अपने रिश्ते बनाएं.”

इमरान के मुताबिक, मोदी ने जवाब दिया था कि “पाकिस्तान से भारत में आतंकवादी हमले होते हैं.” इमरान ने कहा कि उन्होंने इसके जवाब में कहा था कि पाकिस्तान की भी यही शिकायत है. रिटायर्ड भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए उन्होंने भारत पर बलूचिस्तान में आतंकवादी हमले भड़काने का आरोप लगाया.

पुलवामा आतंकी हमले पर खान ने कहा कि एक 20 साल के कश्मीरी युवक ने, “जिसके पिता ने कहा था कि सुरक्षा बलों ने उसे कट्टरपंथी बनाया था”, अर्धसैनिक बलों के एक काफिले के पास खुद को उड़ा लिया. इस हमले में CRPF के 40 जवान मारे गए थे, लेकिन भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया.

इमरान ने कहा, “अगर आप हमें जरा सा भी सबूत देते हैं, तो हम तुरंत कार्रवाई करेंगे…हमें कोई सबूत देने के बजाय उन्होंने अपने विमान भेजे और हम पर बम गिराए. हमने जवाब दिया…दो विमान गिराए गए, एक पायलट पाकिस्तान में बाहर निकलकर उतरा. हमने तुरंत उस पायलट को वापस कर दिया, क्योंकि हम तनाव बढ़ाना नहीं चाहते थे.” इमरान यहां IAF के फाइटर पायलट अभिनंदन वर्धमान को पकड़े जाने और बाद में रिहा किए जाने की बात कर रहे थे.

इमरान ने आगे कहा कि पायलट की रिहाई को शांति की पहल मानने के बजाय, मोदी के लगभग पूरे चुनाव अभियान में यह बताया गया कि उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाया और उनके विमानों ने 350 आतंकवादियों को मार दिया. उन्होंने कहा, “पूरी तरह झूठ. उन्होंने सिर्फ हमारे करीब 10 पेड़ मारे थे, जो काफी दुखद था, क्योंकि हम ये सारे पेड़ उगा रहे हैं.”

अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर इमरान ने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उन प्रस्तावों की अनदेखी की है, जिनमें कश्मीर को विवादित क्षेत्र माना गया था और वहां के लोगों के आत्मनिर्णय का अधिकार माना गया था. उन्होंने कहा कि भारत ने शिमला समझौते में किए गए द्विपक्षीय वादों का उल्लंघन किया और अपने ही संविधान की अनदेखी की.

इमरान ने कश्मीर में कर्फ्यू के बीच रहने वाले लोगों की जिंदगी को लेकर अपनी बात जारी रखी और चेतावनी दी कि भारत जब ये पाबंदियां हटाएगा तो “खून-खराबा” हो सकता है. उन्होंने कहा, “एक और पुलवामा होगा और अंदाजा लगाइए, भारत फिर हमें जिम्मेदार ठहराएगा.”

2015 और 2016 में UNGA में नवाज शरीफ

सितंबर 2016 में UNGA में बोलते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था, “दक्षिण एशिया में टकराव हमारी किस्मत नहीं होना चाहिए. पाकिस्तान भारत के साथ शांति चाहता है. इसे हासिल करने के लिए मैंने अपनी तरफ से हर संभव कोशिश की है.”

उरी आतंकी हमले के दो हफ्ते से भी कम समय बाद UNGA में बोलते हुए शरीफ ने कश्मीर का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कश्मीर में “स्थानीय लोगों के विद्रोह” की बात की. उन्होंने कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्याओं की स्वतंत्र जांच और “भारतीय कब्जे वाली सेना” की भूमिका की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र के तथ्य खोजने वाले मिशन की मांग की.

उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के आम तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले तर्क को दोहराया और उसी समय भारत के साथ बातचीत की इच्छा भी जताई. उन्होंने मंच से भारत को फिर से प्रस्ताव दिया और नई दिल्ली से कहा कि “सभी लंबित विवादों, खासकर जम्मू-कश्मीर के शांतिपूर्ण समाधान के लिए गंभीर और लगातार बातचीत शुरू करें.”

उसी 71वें UNGA में भारत ने अपने भाषण में पाकिस्तान के मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों का जवाब दिया. तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था, “मैं सिर्फ इतना कह सकती हूं कि जो लोग दूसरों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हैं, उन्हें अपने अंदर भी झांकना चाहिए और देखना चाहिए कि वे अपने ही देश में कितने गंभीर अत्याचार कर रहे हैं, जिसमें बलूचिस्तान भी शामिल है.”

स्वराज ने आगे कहा, “पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत ने बातचीत के लिए ऐसी शर्तें रखी हैं, जो उन्हें स्वीकार नहीं हैं. कौन सी शर्तें? क्या हमने अपनी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करने से पहले कोई शर्त रखी थी?…क्या प्रधानमंत्री मोदी के काबुल से लाहौर जाने पर हमने कोई शर्त रखी थी?…हमने मुद्दों को शर्तों के आधार पर नहीं, बल्कि दोस्ती के आधार पर सुलझाने की पहल की थी.”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान ने भारत के अंदर आतंकी हमलों में मदद करके शांति की कोशिशों का जवाब दिया.

एक साल पहले, 2015 के UNGA में नवाज शरीफ ने भी इमरान खान की तरह कहा था कि प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उन्होंने भारत से संपर्क किया था. उन्होंने कहा था, “जब मैंने जून 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री का पद संभाला, तो मेरी पहली प्राथमिकताओं में से एक भारत के साथ रिश्ते सामान्य करना था.”

उन्होंने शांति के लिए चार कदमों वाली नई पहल भी बताई.

“पहला, हम प्रस्ताव रखते हैं कि पाकिस्तान और भारत कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पूरी तरह युद्धविराम के लिए 2003 में बनी सहमति को औपचारिक रूप दें और उसका सम्मान करें…दूसरा, हम प्रस्ताव रखते हैं कि पाकिस्तान और भारत फिर से यह पुष्टि करें कि वे किसी भी परिस्थिति में बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे और न ही बल के इस्तेमाल की धमकी देंगे.

“…तीसरा, कश्मीर को सैन्य बलों से मुक्त करने के लिए कदम उठाए जाएं. चौथा, दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर से दोनों देश बिना किसी शर्त के एक-दूसरे की सेनाएं वापस बुलाने पर सहमत हों.”

यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि एक साल बाद उरी हमला हुआ और शरीफ के अगले UNGA भाषण में इसका असर दिखाई दिया.

हालांकि शरीफ ने कश्मीर का मुद्दा उठाया, लेकिन 2015 में उनका लहजा ज्यादा मेल-मिलाप वाला था. उस भाषण के तीन महीने बाद, दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवाज शरीफ की पोती की शादी में शामिल होने के लिए लाहौर में अचानक और अनौपचारिक रूप से रुकने का फैसला किया. यह 10 साल से ज्यादा समय में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पाकिस्तान की पहली यात्रा थी. शरीफ ने खुद एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया और गर्मजोशी से गले मिले.

UNGA में परमाणु बहस

UNGA में नवाज शरीफ का एक और भाषण सितंबर 1998 का है, जब भारत और पाकिस्तान के परमाणु शक्ति बनने के कुछ महीने ही हुए थे. शरीफ ने शुरुआत में कहा, “इस साल परमाणु बादल ने दक्षिण एशिया पर अपनी काली छाया डाल दी है.”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा पड़ोसी भारत हमेशा परमाणु हथियारों को बड़ी शक्ति का दर्जा पाने और सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करने की कुंजी मानता रहा है. तीस साल पहले हमने दुनिया को चेतावनी दी थी कि भारत परमाणु हथियार विकसित करेगा. हमारी चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया गया.” शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किए और आत्मरक्षा के लिए परमाणु प्रतिरोधक क्षमता स्थापित की.

खास बात यह है कि जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अगले दिन UNGA को संबोधित किया, तो उन्होंने परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए भारत की प्रतिबद्धता की बात की, लेकिन पाकिस्तान या उसके परमाणु परीक्षणों का बिल्कुल जिक्र नहीं किया. दोनों देशों की एक बात पर सहमति थी कि वे सितंबर 1999 तक व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार थे. हालांकि, यह प्रतिबद्धता कभी पूरी नहीं हुई और फिर 1999 में कारगिल युद्ध हुआ.

दो विदेश मंत्री, एक युद्ध और UNGA

सितंबर 1965 में जब 20वां UNGA शुरू हुआ और भारत और पाकिस्तान के नेताओं ने अपने-अपने भाषण दिए, तब 1965 का युद्ध खत्म करने वाले संयुक्त राष्ट्र के निर्देश पर हुए युद्धविराम की स्याही अभी मुश्किल से सूखी थी. जुल्फिकार अली भुट्टो उस समय पाकिस्तान के विदेश मंत्री थे और उन्होंने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. भारत की तरफ से विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह मौजूद थे.

भुट्टो ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा, “भारत के साथ युद्ध हमने नहीं चाहा था. यह आत्मरक्षा का युद्ध है…”

उन्होंने युद्ध के दौरान पाकिस्तान को ईरान, तुर्की और “एशिया और अफ्रीका के बड़े महासागर से लेकर अटलांटिक महासागर तक फैले अरब देशों के बड़े समूह” से मिले नैतिक और आर्थिक समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इन देशों से सिर्फ धर्म और साझा संस्कृति के रिश्ते से नहीं, बल्कि न्याय और शांति के विचार के प्रति साझा प्रतिबद्धता से भी जुड़ा है. उन्होंने चीन को “पूरा नैतिक समर्थन” देने के लिए धन्यवाद दिया और इंडोनेशिया को खास तौर पर धन्यवाद दिया.

अपने भाषण के अंत में भुट्टो ने प्रस्ताव रखा कि दोनों देश जम्मू-कश्मीर से अपनी सेनाएं वापस बुला लें. उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के सैनिकों से मिलकर एक सेना भेजे. ऐसे देशों के सैनिक, जिनका कश्मीर में जनमत संग्रह के नतीजे में कोई हित नहीं है और जो अंतरराष्ट्रीय ताकत की राजनीति की मजबूरियों में शामिल नहीं हैं.”

उन्होंने यह कहते हुए अपना भाषण खत्म किया कि कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए यह संयुक्त राष्ट्र का आखिरी मौका है.

1965 के युद्ध पर भारत का पक्ष रखते हुए स्वर्ण सिंह ने कहा, “रावलपिंडी के शासकों ने हमारे लोगों को अपने अधीन करने और कश्मीर में हमारी जमीन पर कब्जा करने की योजना बनाई.”

उन्होंने आगे कहा, “मैं इस महासभा को पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ किए गए दूसरे हमले की पूरी कहानी बताना चाहता हूं…पूरे देश ने, मेरे सभी देशवासियों ने, हर धर्म के लोगों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े हुए.”

उन्होंने कहा, “यह पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी निराशा और हार थी, जिसने भारत में फूट और अलगाव की ताकतों के उभरने की उम्मीद लगा रखी थी.”

कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र ने कई मौकों पर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम लागू कराने में मदद की है. सबसे महत्वपूर्ण रूप से, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल 1948 को प्रस्ताव 47 पारित किया था.

इस प्रस्ताव में युद्ध रोकने और ऐसे हालात बनाने की एक विस्तृत योजना दी गई थी, जिसमें यह तय करने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जनमत संग्रह कराया जा सके कि जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ जाना चाहिए या पाकिस्तान के साथ.

हालांकि, जुलाई 1972 के शिमला समझौते के बाद प्रस्ताव 47 व्यावहारिक रूप से पीछे हो गया. शिमला समझौते में साफ तौर पर सभी विवादों पर “द्विपक्षीय” बातचीत की बात कही गई है, जिसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं होगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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