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Sunday, 27 September, 2026
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पाकिस्तान में हर PM और सेना प्रमुख की जोड़ी नंबर 1 होती है—जब तक रिश्ते बिगड़ नहीं जाते

पाकिस्तान में, नेता राजनीतिक खेल को जारी रखने के लिए खुशी-खुशी मोहरे बन जाते हैं. उनका बहाना यह होता है कि बंदूक के दम पर सत्ता हासिल करने के लिए शैतान से समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं है.

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दुनिया के मंच पर शहबाज शरीफ, डॉनल्ड ट्रंप के प्यारे “शानदार आदमी” हैं. अपने UNGA भाषण में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भी तारीफ का जवाब देते हुए भारत-पाकिस्तान के 2025 के संघर्ष को खत्म करने का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति को दिया. उन्होंने कहा कि यह ट्रंप की “दृढ़ और दूरदर्शी नेतृत्व” की वजह से हुआ.

पाकिस्तान के कई प्रधानमंत्रियों की तरह शरीफ ने भी कश्मीर का मुद्दा उठाया और इसके न्यायपूर्ण और उचित समाधान की मांग की. अफगानिस्तान, ईरान, यमन और दुनिया के दूसरे हिस्सों की कई जरूरी चिंताओं के अलावा कश्मीर भी प्रधानमंत्री की नजर में हैं. समुद्र पार, अपने चर्चित बेज रंग के सूट में शरीफ ने एक राजनेता की भूमिका को थोड़ा ज्यादा ही गंभीरता से निभाया, कम से कम तब तक, जब तक वह घर नहीं पहुंच गए.

सब कुछ ठीक चल रहा था. फिर ठीक नहीं रहा. घर और विदेश में, युद्ध हो या शांति, पाकिस्तान हर तरफ फायदे की स्थिति में था. प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख की जोड़ी अजेय थी. हमें बताया गया कि दूर-दूर तक कोई गेंदबाज ऐसा नहीं है जो उनकी साझेदारी तोड़ सके. फिर तीसरे अंपायर ने, जो काफी शरारती निकला, कुछ मजा करने का फैसला किया.

नए प्रांतों का प्रोजेक्ट

यह सब पाकिस्तान के अंदर और ज्यादा प्रांत बनाने की इच्छा से शुरू हुआ. कहा गया कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था “पूरी तरह नाकाम हो चुकी है” और अब बदलाव की जरूरत है. नागरिक सरकार के लिए यह एक बड़ा झटका था. उसे लगता था कि सैन्य प्रतिष्ठान के साथ उसकी प्रेम कहानी हमेशा चलती रहेगी. अब खतरे की पहली घंटी बज चुकी थी. और पाकिस्तान की ज्यादातर राजनीतिक परियों की कहानियों की तरह, जो तीन साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाती हैं, यहां भी कोई “हमेशा खुशी से रहे” वाला अंत नहीं है.

प्रधानमंत्री के अपने कैबिनेट मंत्री ने ही मीडिया ब्रीफिंग में अचानक कह दिया कि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था अब काम नहीं कर रही है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अब प्रांत चाहिए. मोहसिन नकवी, जो गृह मंत्री और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन हैं, विडंबना यह है कि पाकिस्तान क्रिकेट के धीरे-धीरे हो रहे पतन की अध्यक्षता भी कर रहे हैं. फिर भी वह उस व्यवस्था के मंत्री होने का फायदा उठाना जारी रखे हुए हैं, जिसे वह खुद नाकाम बता रहे हैं. उन्हें डर है कि “कॉकरोच” इस व्यवस्था को पलट देंगे, जबकि दीमक दशकों से लोकतंत्र को खा रहे हैं. पाकिस्तान में एक काम करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था खुद में ही विरोधाभास जैसी लगती है. और अचानक ज्यादा प्रांतों का सपना किसने देखा है, यह कोई राज्य का रहस्य नहीं है. बाद में सैन्य प्रवक्ता ने भी इस मांग को समर्थन दे दिया. उनका कहना था कि प्रांतों के फैसले में लोगों की इच्छा दिखाई देनी चाहिए. बिल्कुल. बढ़ती महंगाई और बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच दबा हुआ आम पाकिस्तानी बस नए प्रांत ही चाहता है.

जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग को लगा कि यह मांग देश को तोड़ने जैसी है, तो हर तरफ हंगामा मच गया. PPP के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने मंत्री को पाकिस्तान का “गोर्बाचेव” कहा, जो देश को 30 टुकड़ों में बांटना चाहते हैं. जोशीले भाषणों के बीच सिंध विधानसभा ने प्रांत को बांटने के किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने वाला प्रस्ताव पास कर दिया. PPP नेता निसार खोरो ने कहा कि जब वे मुहम्मद जिया-उल-हक या परवेज मुशर्रफ से डरकर भागे नहीं, तो यह “फील्ड मार्शल” भी उनके सामने टिक नहीं सकता. “नए प्रांतों” वाला तूफान अभी शांत नहीं हुआ है. और अगर नकवी के इरादे को देखें, तो पाकिस्तान के पास भी अपना जोहरान ममदानी और सादिक खान होगा.

सब कुछ ठीक था

मई 2025 में भारत के साथ संघर्ष के बाद से शहबाज शरीफ की सरकार लगातार ऊंची उड़ान भर रही थी. वे सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की तारीफ करते नहीं थक रहे थे कि उन्होंने उन्हें इतनी बड़ी राजनीतिक ऊंचाई दी. उसके बाद इस सपनों के दौर के लिए आसमान ही सीमा था.

पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच “तीसरे विश्व युद्ध” को रोक दिया, लेकिन कैसे, यह मत पूछिए. आखिर जब भारत-पाकिस्तान संघर्ष खत्म कराने का श्रेय डॉनल्ड ट्रंप को दिया जा चुका था, तो उनके अपने युद्ध को खत्म कराने में मदद करना भी सही ही था. राष्ट्रपति ट्रंप इस तारीफ के तुरंत प्रशंसक बन गए. पाकिस्तान की तरफ से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए एक नामांकन मिला और अब ट्रंप फील्ड मार्शल को जिस तरह देखते हैं, वैसा उन्होंने कई सालों से अपनी पत्नी मेलानिया को भी नहीं देखा है. यह तथ्य है कि ट्रंप ने 90 से ज्यादा बार मुनीर का नाम अपनी जुबान पर लिया है. राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी चाहते थे कि हम सब इस बात का जश्न मनाएं.

पूरी दुनिया पाकिस्तान की तरफ देख रही थी कि वह उनकी सारी समस्याएं हल कर दे, क्योंकि मुश्किलों को हराने में हमसे बेहतर कोई नहीं है. लेकिन फिर हमारे पास अपनी 99 समस्याएं थीं और सिर्फ एक समाधान. वह एक आदमी है जो पाकिस्तान की विदेश नीति चला रहा है. शहबाज सरकार को यह भी उम्मीद है कि फील्ड मार्शल पाकिस्तान की जनता को संभाल लेंगे. हर जगह रक्षा समझौतों पर उनके हस्ताक्षरों ने असल में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को बेरोजगार कर दिया है. वह इतने खाली हैं कि जेमिमा गोल्डस्मिथ की दूसरी शादी पर टिप्पणी करने में व्यस्त हैं.

जब एक ही जगह से हर काम हो रहा हो, तो उसके पास हमेशा कोई न कोई प्रोजेक्ट होता है. प्रांतों की मांग अचानक सामने नहीं आई है. इसके पीछे एक सोच है. राजनीतिक पार्टियां जानती हैं कि अगर उन्होंने साथ नहीं दिया, तो पूरे संसदीय सिस्टम की जगह कई संघीय इकाइयों वाली राष्ट्रपति प्रणाली लाई जा सकती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की अच्छी छवि ऐसी है कि कोई भी इस कदम का विरोध नहीं करेगा. हालांकि अब सीधे शासन करना सेना को पसंद नहीं है. लेकिन कभी भी “कभी नहीं” नहीं कहना चाहिए.

राजनीतिक déjà vu

सभी सेना प्रमुख और सभी प्रधानमंत्री “एक-दूसरे से अलग नहीं”, “एक ही पेज पर” और “जोड़़ी नंबर 1” होते हैं, जब तक कि वे नहीं होते. हाल ही में इमरान खान और जनरल रिटायर्ड कमर जावेद बाजवा की जोड़ी भी सुपरहिट थी. फिर पता चला कि खान अब भरोसेमंद मोहरे नहीं रहे थे. पाकिस्तान के लोग लगातार राजनीतिक déjà vu की स्थिति में रहते हैं. लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि कोई कभी इससे सीखता नहीं है.

राजनेता इस राजनीतिक नाटक को चलाए रखने के लिए खुद खुशी-खुशी मोहरे बन जाते हैं. उनका बहाना होता है कि बंदूक की नली के दम पर सत्ता हासिल करने के लिए शैतान से समझौता करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. जब उन्हें सत्ता में लाने वाले लोग कुछ साल बाद ही उनकी जगह किसी और को लाने का फैसला करते हैं, तो मतदाता अचानक उनके समर्थन में आ जाते हैं और कहते हैं, “जम्हूरियत खतरे में पड़ गई है.”

पहले सेना राष्ट्रपति की मदद से नागरिक सरकारों को लाइफ सपोर्ट से हटा देती थी. संविधान के आर्टिकल 58(2)(b) के तहत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबलियों को भंग करने की ताकत थी. 1990 के दशक में नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो, दोनों की सरकारों को भ्रष्टाचार के आरोपों पर रातोंरात हटा दिया गया.

2003 से जनरल परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व वाले सैन्य प्रतिष्ठान ने यह तरीका खोज लिया कि पूरी असेंबली को हटाने की जरूरत नहीं है. सदन के अंदर ही बदलाव करना काफी होगा. प्रधानमंत्री को हटाना और असेंबली को बनाए रखना नया नियम बन गया. यूसुफ रजा गिलानी से लेकर नवाज शरीफ, शाहिद खाकान अब्बासी और इमरान खान तक, वही स्क्रिप्ट दोहराई गई.

अगर प्रांतों को लेकर चल रहा विवाद खत्म नहीं हुआ, तो शहबाज शरीफ अगले हो सकते हैं. हालांकि छोटे शरीफ की सेना के प्रति वफादारी और उसकी तारीफ का कोई मुकाबला नहीं है. लेकिन इतिहास हमारा गवाह है, हवाएं बदलेंगी. और जब वे बदलेंगी, तो चिराग सबके बुझेंगे, फौज किसी की नहीं होगी. अहमद फराज भी इससे सहमत होते.

नायला इनायत पाकिस्तान की पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @nailainayat है. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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