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Sunday, 27 September, 2026
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नहीं, G2 जैसी कोई चीज़ नहीं होने वाली: यह सिर्फ एक फैंटम मॉन्स्टर है

शुरुआती बाइपोलर कॉम्पिटिशन शायद बहुत तेज़ होगा, कुछ हद तक इसलिए क्योंकि चीन एक उभरती हुई और नासमझ ताकत है जो अपने खास अधिकारों का दावा करने के लिए बेचैन है.

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अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने इस बात को लेकर चिंता बढ़ा दी है कि कहीं G2 न बन जाए. यानी दो बड़ी ताकतें मिलकर आपस में दुनिया का बंटवारा और सौदेबाजी करने लगें और भारत जैसे दूसरे देशों के हितों को नुकसान पहुंचे. साफ है कि इस बार ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है, लेकिन चिंता अभी भी बनी हुई है. सच्चाई यह है कि यह चिंता पूरी तरह गलत जगह है. न अभी और न ही भविष्य में कोई G2 बनेगा.

यह समझना जरूरी है कि जब हम G2 कहते हैं तो हमारा मतलब क्या होता है. जाहिर है, दोनों बड़ी ताकतें अपने कुछ साझा हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करना चाहेंगी. और जाहिर है, कुछ तालमेल भी होगा, कुछ ऐसे मुद्दे होंगे जिन पर वे सीमित मामलों में सहमत होंगे. अमेरिका और सोवियत संघ ने भी हथियार नियंत्रण और दूसरे मुद्दों पर समझौते किए थे. उम्मीद की जा सकती है कि अमेरिका और चीन भी आखिरकार ऐसे समझौते करेंगे.

लेकिन शुरुआत के दौर में दोनों के बीच द्विध्रुवीय मुकाबला काफी तेज होने की संभावना है. इसका एक कारण यह है कि दोनों पक्षों को पूरी तरह पता नहीं है कि वे एक-दूसरे पर कितना दबाव डाल सकते हैं और दूसरे पक्ष के लिए कौन से हित सबसे महत्वपूर्ण हैं. दूसरा कारण यह है कि चीन एक उभरती हुई और अभी पूरी तरह परिपक्व न हुई ताकत है, जो अपने विशेष अधिकार जताने के लिए उत्सुक है. इन वजहों से चीन के दूसरे देशों, खासकर अमेरिका, पर ज्यादा शक करने और किसी कथित अपमान से जल्दी नाराज होने की भी संभावना है. इसलिए दोनों पक्षों के बीच किसी बड़े राजनीतिक समझौते की संभावना बहुत कम है, खासकर इस शुरुआती दौर में.

अकेले छोड़ दिए जाने की चिंता

दोनों बड़ी ताकतों के बीच आपसी शक द्विध्रुवीय व्यवस्था में और बढ़ जाता है. यही चीज प्रभाव के क्षेत्रों जैसी अनचाही स्थितियों को भी रोकती है. दरअसल, अगर अतीत में कभी ऐसे प्रभाव के क्षेत्र रहे भी हैं, तो वे इसलिए रहे क्योंकि विरोधी पक्ष के पास उन्हें चुनौती देने की ताकत और पहुंच नहीं थी. आम तौर पर वे किसी राजनीतिक समझौते का नतीजा नहीं रहे हैं.

सीधी बात यह है कि द्विध्रुवीय मुकाबला काफी तेज और हर जगह होने वाला होगा. यह मुकाबला किन मुद्दों पर होगा और किन जगहों पर होगा, दोनों ही मामलों में इसका दायरा बड़ा होगा. इसके अलावा, ऐसा मुकाबला एक तरह से जीरो-सम गेम भी होगा. किसी एक ताकत को होने वाला फायदा अपने आप दूसरी ताकत के लिए नुकसान होगा. इसलिए दोनों पक्ष ऐसे नतीजों को रोकने की पूरी कोशिश करेंगे.

मिसाल के लिए, पिछली शीत युद्ध की अवधि को याद कीजिए. दोनों पक्षों के बीच इतना तेज मुकाबला होने के बावजूद दोनों के पास इसे किसी तरह चलाने का एक तरीका निकालने की अच्छी वजह थी. फिर भी वे वास्तव में ऐसा नहीं कर पाए. आखिर में, जब मिखाइल गोर्बाचेव जैसे सोवियत नेता हालात की गंभीरता को समझने लगे और उन्हें एहसास हुआ कि मॉस्को के पास इस मुकाबले को जारी रखने के लिए जरूरी साधन नहीं हैं, तब उन्होंने शीत युद्ध को कम करने के तरीके तलाशने शुरू किए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सोवियत नेताओं ने खुद मान लिया था कि वे इस लड़ाई को जारी रखने के लिए बहुत कमजोर हैं. उन्हें यह बात बहुत पहले समझ लेनी चाहिए थी, खासकर यह देखते हुए कि अपने सबसे अच्छे दौर में भी उनकी अर्थव्यवस्था अमेरिका की अर्थव्यवस्था के आधे से ज्यादा कभी नहीं रही. हैरानी की बात यह नहीं है कि 1980 के दशक के आखिर तक उन्होंने इससे निकलने का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया था, बल्कि यह है कि उन्हें इस नतीजे तक पहुंचने में इतना लंबा समय लगा.

अमेरिका और चीन की स्थिति बहुत अलग है. दोनों की अर्थव्यवस्थाओं का आकार लगभग बराबर है. इसका मतलब है कि इस समय किसी भी पक्ष के पास पीछे हटने की ज्यादा वजह नहीं है. और दोनों के जल्द ही पूरी तरह थक जाने की स्थिति में पहुंचने की संभावना भी नहीं है.

फिर भी, भारत जैसे कमजोर देशों के लिए अमेरिका और चीन के बीच इस द्विध्रुवीय मुकाबले से निपटना आसान नहीं है. खासकर इसलिए क्योंकि भारत की सीमा इनमें से एक देश से लगती है और उसके साथ भारत का सक्रिय विवाद भी है. कमजोर देशों के सामने कई खतरों में से एक यह है कि जिस बड़ी ताकत के साथ वे अपनी सुरक्षा के लिए साझेदारी करते हैं, वह ताकत अब उन्हें सुरक्षा देने के लिए तैयार न रहे. भारत में G2 को लेकर चिंता की असली वजह यही है कि कहीं अमेरिका नई दिल्ली के प्रति अपनी सुरक्षा संबंधी प्रतिबद्धताओं से पीछे न हट जाए.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश को अकेला छोड़ देना कोई असामान्य बात नहीं है. ऐसा कुछ कारणों से हो सकता है. जिस बड़ी ताकत पर कोई देश निर्भर है, वह शायद अब सुरक्षा देने की स्थिति में न रहे. या फिर वह ऐसा कर सकती हो, लेकिन घरेलू राजनीतिक हालात अब इस तरह का बोझ उठाने की इजाजत न दें. पहला कारण कम संभावित है, क्योंकि ऐसा तब होता है जब कोई बड़ी ताकत कमजोर हो रही होती है. लेकिन ऐसी गिरावट आम तौर पर रातोंरात नहीं होती. हम किसी देश की ताकत में गिरावट को काफी पहले देख सकते हैं और आमतौर पर हमारे पास दूसरे विकल्पों पर विचार करने का समय होता है.

घरेलू राजनीतिक हालात में बदलाव ज्यादा अचानक हो सकते हैं. यह बदलाव लोकतंत्र और तानाशाही, दोनों तरह की व्यवस्थाओं में हो सकते हैं. ये अचानक हो सकते हैं और इससे सुरक्षा साझेदार मुश्किल स्थिति में फंस सकते हैं. निष्पक्ष रूप से देखें तो ऐसा मजबूत और कमजोर, दोनों तरह के देशों के साथ हो सकता है. यह कभी सुखद नहीं होता, भले ही इसे समझने योग्य माना जाए. 1962 में सोवियत संघ का भारत को अकेला छोड़ना या 1970 के दशक की शुरुआत में मिस्र का मॉस्को से संबंध खत्म करके वॉशिंगटन के साथ जाना, इसके उदाहरण हैं.

G2 की तलाश क्यों हो रही है

यह भी साफ होना चाहिए कि भारत में कुछ लोग लगातार G2 बनने के संकेत क्यों तलाशते रहते हैं. इसका एक कारण यह है कि वे अमेरिका के साथ किसी भी सुरक्षा साझेदारी को कमजोर करने का रास्ता तलाश रहे हैं. उनका तर्क यह है कि अगर सच में G2 बन गया, तो अमेरिका एक भरोसेमंद साझेदार नहीं रहेगा.

अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी को कमजोर करने की ऐसी कोशिशों के सफल होने की संभावना कम है. इसके दो कारण हैं. पहला, पिछले एक दशक या उससे ज्यादा समय में ऐसी कोशिशें सफल नहीं हुई हैं, जबकि इन्हें सफल बनाने के लिए काफी बड़ी कोशिश की गई है. दरअसल, इन कोशिशों का लगातार और संगठित तरीके से किया जाना यह शक पैदा करता है कि क्या इस तरह की राय रखने वालों में से कम से कम कुछ लोगों को दूसरी ताकतों का समर्थन तो नहीं मिल रहा, जो नहीं चाहतीं कि चीन के खिलाफ भारत की सुरक्षा मजबूत करने की कोई बड़ी कोशिश हो. उम्मीद है कि ऐसी राय रखने वाले कम से कम कुछ लोग सच में चिंतित हैं, हालांकि उनकी कोशिशें भारत की सुरक्षा मजबूत करने के उनके ही असली उद्देश्य को कमजोर करती हैं.

दूसरा कारण यह है कि ऐसी कोशिशें सफल क्यों नहीं होतीं, यह भी जरूरी है. सच्चाई यह है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग बहुत व्यावहारिक नहीं हैं. वे भारत की मौजूदा क्षमता को देखते हुए उसके वास्तविक विकल्पों पर विचार करने से बचते हैं. वे सुरक्षा साझेदारी को दूसरे देशों पर निर्भरता बताते रहते हैं, लेकिन उनके पास इस सवाल का बहुत कम जवाब है कि भारत अपनी मौजूदा ताकत को देखते हुए अकेले चीन का मुकाबला कैसे कर सकता है.

आदर्श स्थिति में भारत को अपनी सुरक्षा के लिए किसी साझेदार की जरूरत नहीं होनी चाहिए. लेकिन देश के सामने जो स्थिति है, वह आदर्श नहीं है. यह कहना गलत नहीं है कि भारत को इतना मजबूत होना चाहिए कि उसे साझेदारों की जरूरत न पड़े. लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होता. अगर सिर्फ इच्छा करने से चीजें हो जातीं, तो भारत की अर्थव्यवस्था अभी के आकार से पांच गुना बड़ी होती और चीन की तरह भारत भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान लगातार बना रहा होता. लेकिन दुर्भाग्य से वास्तविक दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था चीनी अर्थव्यवस्था की एक चौथाई या उससे भी कम है. और अगले पांच साल में भारत का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान आने की संभावना शून्य है. इन वास्तविकताओं को मानने से इनकार करना बचकाना है.

भारत को जिस चीज की चिंता करनी चाहिए, वह उसकी सीमा पर मौजूद बहुत बड़ी ताकत और खतरा है, जो उसकी आजादी और अपने फैसले खुद लेने की क्षमता को गंभीर रूप से कम कर सकता है. G2 जैसे काल्पनिक खतरों से लड़ने में ध्यान लगाते रहना भारत का ध्यान उसके दरवाजे पर मौजूद इस असली खतरे से हटा देगा.

राजेश राजगोपालन नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. वे @RRajagopalanJNU पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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