नई दिल्ली: पिछले कुछ हफ्तों से दविंदर कौर एक सरकारी दफ्तर से दूसरे सरकारी दफ्तर के चक्कर लगा रही हैं. उन्हें पता चला कि चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान उनकी बेटी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैंने अपनी बेटी के लिए जितने भी सबूत थे, सब दे दिए हैं, लेकिन अब मुझे बताया गया है कि नवंबर में जो लिस्ट जारी होगी, उसमें मेरी बेटी का नाम होगा या नहीं, इसकी कोई पुष्टि नहीं है. आम लोगों को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ रही है? CEC को इसका जवाब देना चाहिए.”
शुक्रवार को जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, वे जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल हुए. वे मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे.
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और आसपास की कई जगहों से सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया. प्रदर्शनकारियों ने SIR में गड़बड़ी का आरोप लगाया और बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए जाने पर चिंता जताई.
‘सबूत दिए, लंबी लाइनों में खड़ी रही’
50 साल की गृहिणी और विश्वास नगर की रहने वाली दविंदर कौर ने कभी नहीं सोचा था कि एक वोट की वजह से उनके परिवार को इतनी परेशानी झेलनी पड़ेगी.
कौर ने कहा, “SIR की लिस्ट में मेरा नाम सही था, लेकिन मेरी बेटी का नाम हटा दिया गया.”
उनकी बेटी 26 साल की है और पहली बार वोट देने वाली नहीं है. वह पहले हुए चुनावों में बिना किसी परेशानी के वोट दे चुकी है.
फिर भी, बिना कोई साफ वजह बताए उसका नाम सरकारी रिकॉर्ड से हटा दिया गया.
बेटी का नाम दोबारा जुड़वाने के लिए कौर ने अधिकारियों के मुताबिक जरूरी सभी दस्तावेज जमा किए. उन्होंने द प्रिंट से कहा, “मैंने उसकी पहचान के कार्ड, मार्कशीट, आधार, PAN कार्ड, वोटर ID और अपने पहचान के दस्तावेज, रहने की जगह का सबूत देने के लिए जमा किए.”
कौर ने कहा, “मैं दोबारा गई और सारे सबूत दिए. मुझे नहीं पता कि नाम पहली बार क्यों काटा गया, क्योंकि मैंने पहले सही फॉर्म भरे थे. लेकिन अब सारे कागज दोबारा देने के बाद भी मुझे नहीं पता कि मेरे फॉर्म स्वीकार होंगे या नहीं.”
‘गलतियों’ को ठीक कराने की प्रक्रिया आम लोगों के लिए बहुत थकाने वाली रही है. कौर की तरह जंतर मंतर पर मौजूद कई लोगों ने कहा कि उन्हें कई दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े और हर जगह से उन्हें दूसरी जगह भेज दिया गया. अधिकारियों ने कौर को अलग-अलग इलाकों में बने खास SIR बूथों पर जाने को कहा. इस वजह से उन्हें कई बार पूरे शहर में इधर-उधर जाना पड़ा.
बूथों तक पहुंचने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं हुई. उन्होंने कहा, “मुझे लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ा, भीड़ में धक्के खाने पड़े और बहुत परेशानी हुई. डेढ़ घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद आखिरकार मेरी बारी आई.”
इतना समय और मेहनत करने के बावजूद अधिकारियों ने उन्हें कोई पक्का भरोसा नहीं दिया. उन्हें बताया गया कि नवंबर तक इंतजार करना होगा. तभी पता चलेगा कि उनकी बेटी का फॉर्म स्वीकार किया गया है या नहीं और उसका नाम अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल होगा या नहीं.
कौर ने 24 अगस्त की आखिरी तारीख से पहले सभी जरूरी कागज जमा कर दिए थे. फिर भी उन्हें कई महीनों तक यह पता नहीं चलेगा कि आगे क्या होगा.
कौर ने कहा, “मैंने इस सरकार के समय में ऐसे मुश्किल दिन देखे हैं. आम लोगों को सिर्फ एक जवाब पाने के लिए भीड़ में धक्के खाने और घंटों लाइन में खड़े होने की जरूरत क्यों पड़ती है? हम सारे नियम मानते हैं, फिर भी हमें अपने वोट देने के बुनियादी अधिकार को लेकर कोई पक्का भरोसा नहीं दिया जाता.”
‘गरीब लोग ऐसे सबूत कहां से लाएंगे?’
दविंदर की तरह, बदली विधानसभा सीट के समयपुर बादली की रहने वाली साजिदा भी एक गृहिणी हैं. वह धूप में भीड़ के बीच खड़ी होकर सवाल पूछ रही थीं.
वह पूछ रही थीं कि चल रहे चुनावी संशोधन के दौरान अधिकारियों ने उनसे कई दशक पुराने दस्तावेज क्यों मांगे. उनकी परेशानी तब और बढ़ गई जब अधिकारियों ने उनके पिता के रिकॉर्ड भी मांगे.
साजिदा ने कहा, “उन्होंने बताया कि लिस्ट में मेरे पिता का नाम गलत था. मेरे पिता ने कई सालों तक वोट दिया था और उनकी जानकारी हमेशा सही थी. 70 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उन्हें कभी ऐसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.”
जब अधिकारियों ने उनसे और सबूत मांगे, तो साजिदा ने कहा, “मैंने कहा कि मेरे पास यही बुनियादी दस्तावेज हैं. अगर आप वोट हटाना चाहते हैं, तो हटा दीजिए.”
साजिदा ने कहा कि 20 से 30 साल पुराने रिकॉर्ड उन गरीब परिवारों के पास नहीं होते, जिनके पास दस्तावेज संभालकर रखने की सही सुविधा, जमीन की मिल्कियत या कई साल पहले अपने अस्तित्व का रिकॉर्ड दिखाने वाले औपचारिक कागज नहीं होते.
SIR में मांगे जा रहे दस्तावेजों के बारे में साजिदा ने कहा, “गरीब लोगों के पास जमीन नहीं होती. उनके पास कई दशक पुराने अपने अस्तित्व के दस्तावेज अक्सर नहीं होते. अब वे 20 या 30 साल पुराने दस्तावेज कहां से लाएं? गरीब लोग ऐसे सबूत कैसे दे सकते हैं?”
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