करीब छह दशक बाद, जब पाकिस्तान के एक सैन्य अधिकारी ने अरब देशों के आपसी विवाद में एक पक्ष लेने का फैसला किया था, अब उसी पद पर उनके उत्तराधिकारी ने भी पश्चिम एशिया के सबसे ज्यादा आर्थिक महत्व वाले संघर्ष में दखल दिया है. खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने सऊदी-यमन सीमा के पार हूती विद्रोहियों की बढ़त पर हमला किया.
पाकिस्तानी सैनिक हाल ही में हुए तीन देशों के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत सऊदी अरब में तैनात हैं और माना जाता है कि वहां जेएफ-17 लड़ाकू विमानों की एक स्क्वाड्रन भी काम कर रही है.
मक्का समझौते में शामिल तीसरे देश तुर्की के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उसके सैनिक या सैन्य उपकरण सऊदी अरब में मौजूद हैं.
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली से मंजूरी लेने की ज़रूरत के बिना ही फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने एक ब्रिगेड से ज्यादा संख्या में सैनिकों के साथ-साथ हवाई ताकत भी तैनात कर दी है. पाकिस्तान के राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सैद्धांतिक तौर पर सर्वोच्च कमांडर हो सकते हैं, लेकिन नवंबर 2025 में किए गए संवैधानिक संशोधन के बाद खुद को फील्ड मार्शल बनाए गए मुनीर का तीनों सेनाओं पर पूरा नियंत्रण है. 27वें संवैधानिक संशोधन के तहत चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का पद बनाया गया था और इस तरह ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ का नाममात्र का पद खत्म कर दिया गया. इसलिए हवाई ताकत भी मुनीर के नियंत्रण में है.
सबसे अच्छे से सीखना
यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले करके मुनीर अब पूर्व चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल जिया-उल-हक के साथ खड़े हो गए हैं, जिन्होंने लड़ रहे अरब पक्षों के बीच दखल दिया था. जब मरहूम तानाशाह जिया-उल-हक उस समय ब्रिगेडियर थे, तब उन्होंने जॉर्डन की राजशाही के खिलाफ फिलिस्तीनी विद्रोह को दबाने में अहम भूमिका निभाई थी. वहीं, मौजूदा फील्ड मार्शल ने इससे एक कदम आगे बढ़कर यमन में रियाद के अड़ियल पड़ोसियों के खिलाफ लड़ाकू भूमिका में पाकिस्तानी सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया है. यह पूरी तरह संयोग है कि दखल देने वाली भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान सेना के दोनों अधिकारी जालंधर से जुड़े हुए हैं. हालांकि, दोनों के बीच समानताएं यहीं खत्म हो जाती हैं.
तब ब्रिगेडियर जिया-उल-हक को जॉर्डन में सैन्य सलाहकार के तौर पर तैनात किया गया था, जब सितंबर 1970 में कुख्यात ब्लैक सितंबर नरसंहार हुआ था. यह उनके तीन साल के कार्यकाल के आखिरी दौर में हुआ था और वह जॉर्डन से सम्मान के एक पदक ‘विसाम अल-इस्तिकलाल’ के साथ लौटे थे, जिसका अजीब तरह से मतलब ‘स्वतंत्रता का आदेश’ है. यह पदक उन्हें ऐसी जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभाने के लिए दिया गया था, जो उनकी सलाहकार की भूमिका से कहीं आगे थीं. यहां तक कि उन्हें ‘फिलिस्तीनियों का कसाई’ तक कहा जाने लगा था.
ऐसा लगता है कि इससे उन्हें 1976 में बाद में चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ चुने जाने के समय अपने से कई वरिष्ठ अधिकारियों को पीछे छोड़ने में मदद मिली.
फील्ड मार्शल मुनीर को, ज़ाहिर तौर पर, आगे किसी बड़े पद पर जाने के लिए ऐसे किसी रिकॉर्ड की ज़रूरत नहीं है क्योंकि फिलहाल पाकिस्तान के सैन्य ढांचे में ऐसा कोई पद ही उपलब्ध नहीं है, लेकिन इस बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में उन्होंने पाकिस्तान की सेना को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां से बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. अरबों के आपसी संघर्ष में एक पक्ष लेने की तस्वीर और वह भी सांप्रदायिक संघर्ष में, इस्लामाबाद, रावलपिंडी या उस जगह के लिए अच्छी नहीं है, जहां से नया चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज काम करना चुनता है. पाकिस्तान दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी वाला देश है और बड़ी संख्या में शिया लोग सशस्त्र बलों में भी सेवा देते हैं.
अनजाना रास्ता
पाकिस्तानी सैन्य इकाइयों के अंदर इस तरह के सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया है और आम तौर पर सेना में पेशेवर रवैया ही हावी रहा है. हालांकि, सऊदी अरब में लंबे समय से सैनिकों की तैनाती के दौरान रावलपिंडी को काफी सावधानी से संतुलन बनाकर चलना पड़ा है. 1980 के दशक में, जनरल जिया-उल-हक के कार्यकाल के दौरान जब सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती सबसे ज्यादा थी, तब रियाद ने साफ तौर पर पाकिस्तान से कहा था कि सऊदी जमीन पर ड्यूटी से शिया अधिकारियों और सैनिकों को हटा दिया जाए. पाकिस्तान की एक मजबूत बख्तरबंद ब्रिगेड भी सऊदी अरब में तैनात थी. हालांकि जनरल जिया ने इस मांग को तुरंत खारिज नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान सेना के कोर कमांडरों के सामने रखा गया उनका प्रस्ताव विरोध का सामना करना पड़ा.
कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे पाकिस्तानी सशस्त्र बलों की एकजुटता को काफी नुकसान पहुंच सकता है. इसकी वजह यह थी कि इस नीति को चुपचाप लागू नहीं किया जा सकता था. उनका तर्क था कि पूरी तरह एकजुट बटालियनों वाली पूरी सैन्य टुकड़ी को तैनात किया जाना था और सैनिकों के एक खास समूह को उनके संप्रदाय के आधार पर हटाने से सैन्य इकाइयों की एकजुटता पर नकारात्मक असर पड़ेगा.
जबकि उस बख्तरबंद ब्रिगेड की तैनाती लड़ाई वाले इलाके से काफी दूर, तबुक में थी और किसी भी अभियान से कई मील दूर थी, मौजूदा तैनाती पश्चिम एशिया के संघर्ष क्षेत्र के सबसे गर्म इलाके में है. और जिन पक्षों के बीच सेना खड़ी की गई है, वे साफ तौर पर सांप्रदायिक आधार पर बंटे हुए हैं.
यह एक ऐसी सेना के लिए आसान काम नहीं है, जिसमें बड़ी संख्या में अलग-अलग समुदायों के लोग हैं और जिसका नेतृत्व पेशेवर तरीके से किया जाता है. हालांकि, उसके अपने राजनीतिक और कारोबारी हित भी हैं. इस मामले में पाकिस्तान की सेना ने अपनी एक अलग तरह की विदेश नीति विकसित की है, जिसका मुख्य ध्यान भारत, चीन, परमाणु हथियारों और आतंकवाद पर रहा है. इन मोर्चों पर सांप्रदायिक तनाव को लेकर चिंता की बहुत कम वजह थी, हालांकि सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पैदा हुए असर ने पाकिस्तान के शिया लोगों को भी प्रभावित किया है, लेकिन हूतियों पर हमला करना, भले ही इसे गलत तरीके से सिर्फ शिया मुद्दे के रूप में बताया जाता हो, पाकिस्तानी सशस्त्र बलों के लिए स्थिति को और मुश्किल बनाता है. मदरसे से पढ़े फील्ड मार्शल ने सेना को एक ऐसे अनजाने रास्ते पर ला खड़ा किया है, जहां से निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है.
मानवेंद्र सिंह BJP नेता, डिफेंस एंड सिक्योरिटी अलर्ट के एडिटर-इन-चीफ और राजस्थान में सोल्जर वेलफेयर एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन हैं. उनका एक्स हैंडल @ManvendraJasol है. यह लेखक के निजी विचार हैं.
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