क्या आपने कभी देखा है कि हिंदुत्ववादी संगठन गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहे हों, कुछ लोग एक बलात्कारी की रिहाई के लिए प्रदर्शन कर रहे हों, महिला संगठन आरक्षण और अपनी जगह वापस पाने की मांग कर रहे हों, और मजदूर संगठन सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हों. और ये सभी लोग एक-दूसरे से कुछ ही मीटर की दूरी पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हों? यह जंतर-मंतर का एक आम नजारा था. मेरे जैसी लड़की के लिए, जो दिल्ली में पली-बढ़ी, लेकिन एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार से आती थी और छात्र राजनीति में नई थी, इतने अलग-अलग तरह के प्रदर्शनों को इतनी पास होते देखना मेरे लिए एक “कल्चर्ल शॉक” (सांस्कृतिक झटका) था.
2012 में, जब मैं एक छात्रा थी, तब जंतर-मंतर मुझे देश का आईना लगता था. वहां देश की हकीकत का एक हिस्सा दिखाई देता था, जिसमें वे बातें भी शामिल थीं जो हमें बिल्कुल पसंद नहीं हैं. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते हुए मैंने भारत को खुलेआम खुद से बहस करते देखा.
जंतर-मंतर एक ऐसी जगह थी, जहां वामपंथी, दक्षिणपंथी और चरमपंथी विचार रखने वाले लोग अपनी बात रखने के लिए एक साथ आते थे.
अब उस आईने को हटा दिया गया है. 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से हटा दिया. पुलिस ने तीन दूसरी जगहों के नाम बताए: पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में सीबीडी ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड.
लेकिन जंतर-मंतर सिर्फ समाज का आईना नहीं था. यह शहर के बीचों-बीच था और शहर की धड़कन को दिखाता था. नए नोटिफिकेशन का असली मतलब यह है कि हमें अपना दिल कहीं और ले जाने के लिए कहा जा रहा है.
‘लोगों के सामने आने की जगह’
मेरे लिए जंतर-मंतर दूसरे घर जैसा था. एक छात्रा के तौर पर मैं वहां अनगिनत प्रदर्शनों में शामिल हुई. कॉलेज की फीस बढ़ने के खिलाफ, शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ, महिलाओं के अधिकारों के लिए, अल्पसंख्यकों पर हमलों के खिलाफ और न जाने कितने मुद्दों पर. मुद्दा चाहे जो भी हो, मुझे पता था कि अपने कॉमरेड्स के साथ मुझे कहां जाना है.
लेकिन मेरे जैसी लड़कियों के लिए जंतर-मंतर का क्या मतलब है, खासकर उन लड़कियों के लिए जो रूढ़िवादी, कट्टर या हाशिए पर रहने वाले परिवारों से आती हैं?
मैं एक ऐसे रूढ़िवादी परिवार से आती हूं, जहां लड़की के आने-जाने पर नजर रखी जाती है और अक्सर उस पर पाबंदियां भी लगाई जाती हैं.
कॉलेज में मुझे सख्त कर्फ्यू (समय-सीमा) का पालन करना पड़ता था और किसी भी हाल में शाम 6 बजे तक घर लौटना होता था. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में ग्रेजुएशन के दिनों में ही मैंने और मेरे दोस्तों ने राजनीति को समझना शुरू किया. एक दिन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के मेरे एक कॉमरेड ने मुझे एक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कहा. मैं डर गई. और मन में कई सवाल खड़े हो गए जैसे, अगर मैं कर्फ्यू टाइम से पहले घर नहीं लौट पाई तो क्या होगा? लेकिन मुझे भरोसा दिलाया गया और कहा गया, “चिंता मत करो, जंतर-मंतर पास ही है. तुम समय पर घर पहुंच जाओगी.”
मैंने हिम्मत जुटाई और वहां चली गई. जैसा मुझसे कहा गया था, मैं समय पर घर पहुंच गई.
मुझे समझ आया कि जंतर-मंतर पहुंचना आसान था और वह ज्यादा दूर भी नहीं था. इसके बाद जंतर-मंतर मेरा अड्डा बन गया. इसका मतलब था कि मैं वहां जा सकती थी, अपनी आवाज उठा सकती थी और समय पर घर लौट सकती थी, बिना किसी के यह पूछे कि मैं कहां गई थी? दूरी का वह छोटा-सा फासला ही मेरी आजादी था. मैं अकेली नहीं थी. मेरे जैसे परिवेश से आने वाली कई लड़कियां इसी तरह हिसाब लगाकर चलती थीं. जगह इतनी पास हो कि वे वहां जा सकें, खुद को सुरक्षित महसूस करें और समय पर लौट सकें. साथ ही, उन्हें लगे कि वे भी इस दुनिया का हिस्सा हैं.
जब सरकार तय करती है कि विरोध और प्रदर्शन अब कहीं और होने चाहिए, तो मुझे यह सिर्फ एक सरकारी आदेश नहीं लगता. मुझे लगता है कि मेरे जैसी लड़कियों के लिए एक दरवाजा बंद किया जा रहा है.
रामलीला मैदान, सीबीडी ग्राउंड (शाहदरा) और रामलीला मैदान सेंट्रल दिल्ली से दूर हैं. गरीब लोगों के लिए हर किलोमीटर का सफर एक बोझ है. एक छात्र के लिए कई घंटे सफर करना और जेब खर्च से पैसे लगाना एक अतिरिक्त बोझ है. इस फैसले का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ेगा, क्योंकि इससे वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी. घरों में काम करने वाली एक मजदूर महिला या किसी हाशिए पर जिंदगी बिताने वाली मां अपने बच्चे को लेकर शहर के बाहरी इलाके में किसी खाली मैदान में प्रदर्शन करने नहीं जाएगी. इस फैसले ने प्रदर्शन करने के अधिकार को एक ऐसी चीज बना दिया है, जिसका फायदा सिर्फ कुछ लोग उठा सकते हैं. बाकी लोगों को बिना साफ-साफ कुछ कहे ही लोकतंत्र से बाहर कर दिया गया.
इसे वही कहिए जो असल में यह है. दूरी के जरिए लोगों को बाहर करना. हाशिए पर रहने वाले लोगों पर सीधे प्रतिबंध लगा दिया गया है, सफर इतना महंगा और मुश्किल बना दिया जा रहा है कि वे खुद ही नहीं आ सकें. इस व्यवस्था से उन लोगों को फायदा होता है जिन्हें लोगों का विरोध करना असुविधाजनक लगता है. और लोकतंत्र में यह स्थिति आजादी को डरावना बना देती है.
मुझे महाराष्ट्र की एक महिला याद है, जिनसे मैंने किसान आंदोलन में पूछा था कि वह जंतर-मंतर क्यों आई हैं?
उन्होंने कहा था, “यह सरकार के कान हैं.” उनका मतलब था कि जंतर-मंतर सरकारी दफ्तरों के पास है.
जर्मन-अमेरिकी इतिहासकार और दार्शनिक हाना आरेंट ने इसे “स्पेस ऑफ अपीयरेंस” (लोगों के सामने आने की जगह) कहा था. ऐसी जगह जहां लोग एक-दूसरे के सामने राजनीतिक नागरिकों के रूप में आते हैं. अगर आप इस जगह को हटा देंगे, तो इसके साथ वहां आने वाले लोग भी गायब हो जाएंगे.
जर्मन दार्शनिक युर्गेन हैबरमास ने पब्लिक स्पेस (सार्वजनिक क्षेत्र) को ऐसी जगह बताया, जहां आम लोग एक साथ इकट्ठा होकर सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा करते हैं. जंतर-मंतर बिल्कुल ऐसी ही जगह थी: उलझी हुई, पर हकीकत.
जंतर-मंतर: एक प्रक्रिया
जंतर-मंतर पर मैंने कई तरह के दौर और भावनाएं देखीं. गुस्सा, नाराजगी, जश्न, शोक और दुख. मैंने वहां हर तरह की भावना महसूस की. एक प्रदर्शन में जब कॉमरेड विद्रोही जी के निधन की खबर आई. तब सभी कॉमरेड शोक में डूब गए. वे उस कवि को याद करके रो रहे थे, जो हमेशा छात्रों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के साथ खड़े रहे. मुझे महिला दिवस भी याद है, जब मैंने उन महिलाओं के साथ वहां डांस किया था जो अपनी जगह और अपने अधिकारों के लिए खड़ीं थीं. एक प्रोटेस्ट में बारिश के दौरान हमने “आजादी” के इतने नारे लगाए कि मेरी आवाज बैठ गई. ये पल सिर्फ राजनीति से जुड़े नहीं थे. मेरे जैसी कई लड़कियों के लिए ये बड़े होने और अपनी पहचान समझने के अनुभव थे. इन अनुभवों ने हमें सिखाया कि हमारी आवाज में ताकत है और बदलाव, चाहे कितना भी मुश्किल हो और उसे हासिल करने के लिए कितनी भी मेहनत करनी पड़े, मुमकिन है. इन अनुभवों ने मुझे सिखाया कि मैं अपने डर से कहीं बड़ी चीज का हिस्सा हूं और मुझे हर जगह अपना हक वापस हासिल करना होगा.
वह एक ऐसी जगह थी, जहां मैंने सीखा भी और अपनी पुरानी सोच को बदलना भी सीखा. वहां मेरी सोचने-समझने की क्षमता बढ़ी. मैंने एक मजदूर संगठन के नेता को कॉन्ट्रैक्ट वर्क और इनफॉर्मल सेक्टर के बारे में इतनी आसानी से समझाते सुना कि कोई क्लास का लेक्चर भी उतनी अच्छी तरह नहीं समझा सकता था. मैंने दलित कार्यकर्ताओं को जाति के बारे में इस तरह समझाते सुना, जैसा मुझे किसी किताब में नहीं मिला था. मैंने बुजुर्ग महिलाओं को अपने संघर्षों के बारे में बात करते सुना, जिनके सामने मेरे संघर्ष बहुत छोटे लगने लगे. वहां कुछ संगठनों की बातों से मैं पूरी तरह असहमत थी, लेकिन मैंने उनसे दूरी नहीं बनाई. जंतर-मंतर ने मुझे यह सिखाया कि तुम्हारी राय कई रायों में से सिर्फ एक है और तुम्हें अपनी बात सबके सामने रखकर उसका बचाव करना आना चाहिए.
दूसरों की बात सुनना भी राजनीति का हिस्सा है. यह बात मुझे किसी क्लासरूम में नहीं सिखाई गई. यह मैंने एक भीड़भाड़ वाली सड़क पर सीखी.
मैं जंतर-मंतर पर एक घबराई हुई छात्रा के रूप में गई थी और वहां से एक जागरूक नागरिक बनकर निकली. मैं चाहती हूं कि बाकी लड़कियां, जो रूढ़िवादी या परंपरावादी परिवार से आती हैं, उन्हें भी यही मौका मिले. आप प्रदर्शन की जगह बदल सकते हैं, लेकिन उन वजहों को नहीं बदल सकते जिनके कारण लोग प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होते हैं.
विचार निजी हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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