मायावती का राजनीति में आना भी एक बड़ी दिलचस्प घटना है. कांशीराम की पारखी नज़र ने मायावती की नेतृत्व क्षमता और उनमें छिपे भविष्य के नेता को पहचान लिया था.
चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के चुनावों में जमीनी रैलियों पर रोक लगाई तो अब सारा दारोमदार इस पर कि किस नेता में मोदी की तरह ऑनलाइन वायरल होने की ताकत है.
प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक ने आगामी चुनावों के लिए यह नया सियासी मुद्दा उछाल दिया कि यह मजबूत प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की खालिस्तानी साजिश का एक हिस्सा है.
भारत में शायद ही कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी होगी, जिसे अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने से परहेज होगा. लेकिन उन्हें दूसरों पर उंगली उठाने से पहले, कभी-कभी अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए, क्योंकि किसी दूजे पर गर्द झाड़ देना बहुत आसान होता है.
ऐसे संकेत हैं कि तालिबान के मजबूत उभार के सामने पाकिस्तानी फौज भी तालिबान के लिए काम करने वाले जिहादी गिरोहों से या तो मुक़ाबला करने में नाकाम रहेगी या पीछे हट जाएगी
मोदी सरकार जानती है कि वह सार्क सम्मेलन को हमेशा के लिए नहीं टाल सकती. एक समय आएगा जब‘सीमा पार से आतंकवाद रोको वरना कोई बातचीत नहीं’ वाली शर्त की रणनीति लाभकारी नहीं रह जाएगी, उलटे नुकसान भी दे सकती है.
अगर सरकार टैक्सपेयर्स का पैसा देश को बेहतर बनाने में खर्च करना चाहती है, तो ज्यादा अदालतें बनाए, टूटती हुई नौकरशाही को सुधारे, लेकिन, ज़ाहिर है, नेता सिर्फ अपने बारे में सोचेंगे.