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Saturday, 18 April, 2026
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एक विद्रोही से स्टार प्रचारक तक: शशि थरूर ने कांग्रेस में फिर से अपनी जगह कैसे बनाई

महीनों तक मिले-जुले संकेत देने, सार्वजनिक तौर पर अलग राय रखने और विरोधियों की तारीफ़ करने के बाद, थरूर ने कांग्रेस नेतृत्व के साथ फिर से तालमेल बिठा लिया है—वे संसद में केंद्र पर हमला बोल रहे हैं और केरल में UDF के लिए प्रचार कर रहे हैं.

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तिरुवनंतपुरम: हाल तक तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर को पार्टी से दूर माना जाता था. नेता अक्सर विपक्ष की तारीफ करने और कांग्रेस के कार्यक्रमों से दूरी बनाने के कारण खबरों में रहते थे, कभी-कभी तो ऐसा भी लगता था कि उनका रिश्ता पार्टी से टूट सकता है. लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह सब अतीत की बात हो गई है. अब नेता पार्टी के करीब आते दिख रहे हैं, उसके पक्ष को मजबूत कर रहे हैं और केरल विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मांग वाले स्टार प्रचारकों में से एक रहे.

यह बदलाव शुक्रवार को संसद में भी दिखा. करीब 14 मिनट के भाषण में कांग्रेस सांसद ने महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन से जुड़े बिलों पर बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की आलोचना की और कहा कि अगर महिलाओं का आरक्षण परिसीमन से जोड़ा गया तो यह “राजनीतिक नोटबंदी” बन सकता है.

“परिसीमन सिर्फ नक्शे का प्रशासनिक बदलाव नहीं है. यह राजनीतिक ताकत का गहरा और जानबूझकर किया गया बदलाव है. इसे महिलाओं के आरक्षण से जोड़ना, भारतीय महिलाओं की उम्मीदों को हमारे इतिहास के सबसे विवादित राजनीतिक मुद्दों में से एक के हवाले करना है. ऐसा कदम हमारे संघीय ढांचे को भी कमजोर कर सकता है,” थरूर ने कहा.

यह घटनाक्रम उस समय आया है जब तिरुवनंतपुरम के सांसद ने जनवरी के आखिर में दिल्ली में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की थी. यह मुलाकात केरल में चुनाव से पहले पार्टी की एक अहम बैठक में शामिल न होने के कुछ दिनों बाद हुई थी.

इसके बाद थरूर, जो पिछले साल नरेंद्र मोदी सरकार की कई मुद्दों पर तारीफ करने के कारण चर्चा में थे, पार्टी लाइन के साथ चलते दिखे. उन्होंने फरवरी में पेश किए गए केंद्रीय बजट को “निराशाजनक और मौका गंवाने वाला” बताया और कहा कि यह “शासन से ज्यादा सुर्खियां बनाने” पर केंद्रित था. उन्होंने बेरोजगारी और कृषि जैसे मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगाया. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र ने रेलवे विस्तार और एम्स जैसे मामलों में केरल की अनदेखी की है.

थरूर केरल विधानसभा चुनाव में यूडीएफ के सबसे ज्यादा मांग वाले स्टार प्रचारक थे. उन्होंने 12 जिलों की करीब 59 सीटों पर प्रचार किया, कई बार एक दिन में पांच-पांच जगह गए.

कांग्रेस के एक सूत्र ने बताया कि थरूर को पार्टी में खुद को “अलग-थलग” महसूस हो रहा था, जो राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात के बाद सुलझ गया.

उन्होंने कहा कि अगर यूडीएफ सरकार बनाती है तो थरूर को उनके अनुभव और ज्ञान का उपयोग करते हुए सरकार में कोई अहम भूमिका या सलाहकार पद दिया जा सकता है. केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल को मतदान हुआ. कांग्रेस “एंटी-इंकंबेंसी” के आधार पर सत्ता में वापसी को लेकर भरोसा जता रही है.

सूत्र ने कहा, “अब वह कह रहे हैं कि वी. डी. सतीशन भी उनकी राय का सम्मान कर रहे हैं और उन्होंने भरोसा दिया है कि अगर यूडीएफ की सरकार बनती है तो उन्हें कोई अहम भूमिका मिलेगी. वह अब खुश हैं. वह पूरी तरह सक्रिय हैं और हर जगह पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.”

दिप्रिंट ने थरूर से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन जवाब नहीं मिला. जवाब मिलने पर खबर को अपडेट कर दिया जाएगा.

कांग्रेस से पहले संयुक्त राष्ट्र

लंदन में मलयाली माता-पिता के घर जन्मे थरूर ने भारत और अमेरिका में पढ़ाई की और 1978 से 2007 तक संयुक्त राष्ट्र में काम किया. 2009 में उन्होंने कांग्रेस जॉइन की और उसी साल लोकसभा चुनाव लड़ा, जिसमें उन्होंने तिरुवनंतपुरम सीट लगभग 1 लाख वोटों से जीती. बाद के चुनावों में भी उन्होंने यह सीट बरकरार रखी, हालांकि 2024 के चुनाव में उनकी जीत का अंतर घटकर 16,077 रह गया, जहां उन्हें बीजेपी के राजीव चंद्रशेखर से चुनौती मिली.

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्हें विदेश राज्य मंत्री (2009–2010) और बाद में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री (2012–14) बनाया गया.

2020 में थरूर उन 23 नेताओं में शामिल थे जिन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर “पूरी तरह सक्रिय नेतृत्व” और पार्टी में सुधार की मांग की थी. 2022 में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़ा, जिसमें मल्लिकार्जुन खड़गे को 84.1 प्रतिशत वोट मिले.

पार्टी लाइन का पालन करते हुए: कांग्रेस सांसद शशि थरूर शुक्रवार को नई दिल्ली में संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में | संसद टीवी/ANI

इसके बाद उनके और पार्टी के बीच दूरी बढ़ने लगी और वह कई बार अलग राय रखते दिखे. अप्रैल 2023 में उन्होंने कहा था कि विपक्ष की एकता जरूरी है लेकिन अगर वह नेतृत्व में होते तो इसका श्रेय खुद नहीं लेते. उन्होंने यह भी कहा था कि भारत के अंदरूनी मामलों पर विदेशी सरकारों की टिप्पणी ठीक नहीं है.

2025 में यह दूरी और बढ़ी जब थरूर ने कई मौकों पर नरेंद्र मोदी सरकार की तारीफ की. उन्होंने केरल की एलडीएफ सरकार की भी स्टार्टअप और बिजनेस के माहौल को लेकर सराहना की, जिससे विवाद हुआ. केरल के विपक्ष के नेता वी. डी. सतीशन ने उनके आंकड़ों पर सवाल उठाए.

जून 2025 में निलांबुर उपचुनाव के दौरान थरूर प्रचार से गायब रहे. उन्होंने कहा कि उन्हें बुलाया नहीं गया और कुछ मतभेद हैं, जिन पर वह पार्टी के अंदर ही बात करना चाहते हैं.

नवंबर में उन्होंने एक लेख लिखा जिसमें कहा कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार का दबदबा यह दिखाता है कि भारत में राजनीति अक्सर “वंशानुगत अधिकार” की तरह चलती है. इससे भी सवाल खड़े हुए.

इसके बाद चर्चा शुरू हुई कि वह बीजेपी में जा सकते हैं. बीजेपी के एक नेता ने कहा था कि अगर ऐसा होता है तो पार्टी उनका स्वागत करेगी.

दिसंबर में भी वह पार्टी के स्थानीय चुनाव प्रचार में नहीं दिखे. हालांकि यूडीएफ की जीत के बाद उन्होंने पार्टी को बधाई दी और बीजेपी की जीत को भी स्वीकार किया.

जनवरी में स्थिति फिर बदली जब थरूर वायनाड में पार्टी की बैठक में शामिल हुए. उनकी हंसी-मजाक वाली तस्वीरें वायरल हुईं और उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी पार्टी लाइन से हटकर काम नहीं किया.

हालांकि इसके बाद वह एक अहम बैठक में शामिल नहीं हुए. बाद में 29 जनवरी को दिल्ली में राहुल गांधी और खड़गे से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि बातचीत “बहुत अच्छी और सकारात्मक” रही और सब ठीक है.

संसद की सीढ़ियों पर शशि थरूर और प्रियंका गांधी वाड्रा की एक फ़ाइल तस्वीर | ANI

स्टार प्रचारक

बदलाव जल्दी ही दिखने लगे.

शशि थरूर, जिनकी अपने क्षेत्र में कम मौजूदगी और दिसंबर में हुए स्थानीय चुनावों के दौरान कम सक्रियता को लेकर आलोचना हुई थी, ने 17 अप्रैल को तिरुवनंतपुरम में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहां उन्होंने आने वाले चुनावों में पार्टी की संभावनाओं का आकलन किया. उन्होंने भरोसा जताया और कहा कि यूडीएफ के पास बढ़त है और एलडीएफ सरकार के खिलाफ मजबूत एंटी-इंकंबेंसी है. इस बैठक में उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने 59 सीटों पर प्रचार किया.

“हमारी शिकायत थी कि चुनाव आयोग ने हमें पर्याप्त समय नहीं दिया. कई उम्मीदवारों ने बुलाया, लेकिन मैं कई जगह नहीं पहुंच सका. फिर भी मुझे राज्य के लोगों का माहौल समझने का मौका मिला. मैंने देखा कि लोग हमारे साथ हैं. हमारे पास बढ़त है. हम आगे बढ़ेंगे. 9 अप्रैल को लोग यूडीएफ सरकार चुनेंगे. इसके लिए हमें 4 मई तक इंतजार करना होगा. लेकिन मुझे विश्वास है कि यूडीएफ सरकार बनेगी,” थरूर ने कहा.

उन्होंने यह भी कहा कि यूडीएफ सकारात्मक बदलाव लाएगा और बीजेपी को वोट देने का सोच रहे लोगों से अपने फैसले पर फिर से विचार करने को कहा.

“एक और चीज जो मैंने देखी वह है यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की एकता. उम्मीदवारों के चयन के दौरान कुछ लोगों को शिकायत थी, लेकिन सबने उसे अलग रखकर ईमानदारी से प्रचार किया. जिन्हें टिकट नहीं मिला, उन्होंने भी दूसरों के लिए प्रचार किया. यूडीएफ में कोई बागी उम्मीदवार नहीं था.”

उन्होंने कहा कि एलडीएफ सरकार की तारीफ वाला उनका लेख समय से पहले था. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था, जिस पर सतीशन ने उन्हें समझाया और उन्होंने एक महीने के अंदर लेख वापस ले लिया. उन्होंने कहा कि जिस रिपोर्ट का उन्होंने इस्तेमाल किया था, वह राज्य सरकार के दिए गए आंकड़ों पर आधारित थी.

“आप जानते हैं, जो भी अच्छा काम करता है, मैं उसकी तारीफ करने के लिए तैयार रहता हूं. मैं हर चीज में राजनीति नहीं देखता. क्योंकि आखिर में राजनीति लोगों के भले के लिए होती है. लेकिन इस मामले में मुझे लगा कि मैंने जो तारीफ की, वह समय से पहले थी. इसलिए मैंने उसे वापस ले लिया,” थरूर ने कहा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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