Saturday, 13 August, 2022
होममत-विमतजिहादी गिरोह पैर फैलाने की फिराक में हैं, भारत को कश्मीर में अपनी स्थिति और मजबूत करने की जरूरत  

जिहादी गिरोह पैर फैलाने की फिराक में हैं, भारत को कश्मीर में अपनी स्थिति और मजबूत करने की जरूरत  

ऐसे संकेत हैं कि तालिबान के मजबूत उभार के सामने पाकिस्तानी फौज भी तालिबान के लिए काम करने वाले जिहादी गिरोहों से या तो मुक़ाबला करने में नाकाम रहेगी या पीछे हट जाएगी

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नई दिल्ली: नया साल शुरू होने से दस दिन पहले दक्षिण कश्मीर के पुलवामा शहर के पास अरिगम में रहने वाला इमाद मुजफ्फर वानी रात के अंधेरे में अपने घर से गायब हो गया. अपने साथ वह केवल एक ऑटोमैटिक पिस्तौल ले गया, जिसे उसने अपने कमरे में छिपाकर रखा था. अधिकारियों का कहना है कि वहां से वह पास के बंदजू गांव गया और वहां पुलिस के एक सिपाही मुश्ताक़ अहमद वागे की गोली मार कर हत्या कर दी. इस सप्ताह के शुरू में कुलगाम के पास हसनपुरा में दोनों तरफ से 12 घंटे चली गोलीबारी में वानी पुलिस की गोली से मारा गया, उसका खून वहां हुई बर्फबारी से जमी बर्फ पर लकीर बनाता हुआ बह गया.

एक खुफिया दस्तावेज़ बताता है कि 21 वर्षीय वानी अपनी किशोरावस्था से ही कश्मीर की सड़कों पर होने वाले इस्लामी विरोध प्रदर्शनों में भाग ले रहा था और आगे चलकर वह हिज़्बुल मुजाहिदीन के भगोड़े आतंकवादियों की मदद भी करने लगा था. कोई नहीं जानता कि उस बर्फीली रात को उसने क्यों फैसला कर लिया कि अब मारने और मरने का वक़्त आ गया है.

2019 में पुलवामा में आतंकवादी बम हमले के बाद भारत और पाकिस्तान जब युद्ध के कगार पर पहुंच  गए थे तब ताकत का इस्तेमाल करने और कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के साथ ही आंतरिक कार्रवाई करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले ने अपना असर दिखा दिया था. उनके सत्ता में आने के बाद हत्याओं का जो सिलसिला बढ़ गया था वह थमने लगा. इसके अलावा, कश्मीर के बाहर कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ.

लेकिन चिंता की एक वजह कायम है. इन उपलब्धियों के बावजूद जिहादी गुटों में मूल कश्मीरी युवाओं की भर्ती जारी है. पिछले साल कितने युवा भर्ती हुए इसका अनुमान लगाना तो मुश्किल है लेकिन कई जानकारों के मुताबिक उनकी संख्या करीब 200 होगी, जो साल 2020 की संख्या के लगभग बराबर है. सटीक आंकड़े से ज्यादा महत्व उससे उभरते इस संदेश का है कि वहां राजनीतिक असंतोष, सैद्धांतिक आक्रोश, और सामाजिक कमजोरी इतनी व्यापक है कि लोगों को आतंकवाद से जोड़ने वालों का काम बन जाता है.


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पाकिस्तानी फौज की दुविधा

2018 के बाद से जो भी शांति रही है उसकी मुख्य वजह यह है कि पाकिस्तानी फौज ने जिहादी गुटों पर लगाम कसी है. जैसा कि पुलवामा कांड से जाहिर है, फौजी जनरलों को मालूम है कि वे अपने दुश्मन की नाक पर भले एक-दो घूंसे जमा दें मगर वैसी ही जवाबी कार्रवाई पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था को उतना ही नुकसान पहुंचाती है.

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अब यह सबको मालूम है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 2018 में भारत के ‘रॉ’ और पाकिस्तान के ‘आइएसआइ’ ने गुप्त वार्ता शुरू की थी, ताकि परमाणु अस्त्र से लैस दो देशों के बीच फिर ऐसा तनाव न पैदा हो. पुलवामा कांड के बाद इसमें व्यवधान पड़ा लेकिन पिछले साल नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम के बाद यह फिर शुरू हुई. इससे भारत को घुसपैठ पर रोक लगाने में काफी मदद मिल रही है.

पाकिस्तानी फौज ने 2019 के बाद जिहादियों पर लगाम लगाने का एक तरीका अपनाया. साल 2001 में भारतीय संसद भवन पर हमले के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने युद्ध की चेतावनी दी थी लेकिन उन्हें न केवल भारतीय सेना के कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण बल्कि भारत की जीत की स्थिति में पाकिस्तान द्वारा परमाणु अस्त्रों के इस्तेमाल की आशंका के कारण अपने कदम खींचने पड़े थे.

इस सफलता के बाद पाकिस्तान ने बाद के वर्षों में भारत के खिलाफ आतंकवादी कार्रवाइयां बढ़ा दीं और गुप्त कूटनीतिक वार्ताएं शुरू कर दीं. इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने कश्मीर की स्थिति पर अंतिम फैसला करने की कोशिश की. जनरल मुशर्रफ के आंतरिक मंत्री ले.जनरल मोइनुद्दीन हैदर ने विद्वान जॉर्ज पर्कोविच से कहा था कि जिहादियों से मुक़ाबला करने पर पाकिस्तान को जो नुकसान होगा वह उनका समर्थन करने से होने वाले नुकसान से छोटा ही होगा. राष्ट्रपति मुशर्रफ को डर था कि जिहादी गुटों से मुक़ाबला करने पर गृहयुद्ध भड़क सकता है. हैदर ने कहा, “उस समय मैं अकेला था.“ उन्होंने मुशराफ़ से कहा था, “प्रेसिडेंट साहब, आपकी आर्थिक योजना नहीं चल पाएगी, अगर आप आतंकवादियों से छुटकारा नहीं पाएंगे तो लोग निवेश नहीं करेंगे.”

जनरल मुशर्रफ के दौर में खुफिया महकमे के प्रमुख ले.जनरल जावेद अशरफ क़ाज़ी ने इससे आगे जाकर कहा, “हमें यह कबूल करने से पीछे नहीं हटना चाहिए कि कश्मीर में हजारों बेकसूर लोगों की मौत, भारतीय संसद पर हमले, पत्रकार डेनियल पर्ल के कत्ल, और राष्ट्रपति मुशर्रफ पर जानलेवा हमले में भी जैश का हाथ था.”

आज ऐसे संकेत मिल रहे हैं `कि तालिबान जिस तरह मजबूत हो रहा है उसके कारण पाकिस्तानी फौज उसके नाम पर कार्रवाई करने वाले जिहादी गुटों से न तो मुक़ाबला करने को तैयार है और न उसमें इतनी ताकत है. ‘दप्रिंट’ को पिछले सप्ताह ऐसे वीडियो मिले हैं जिनसे पता चलता है कि जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा कांड के बाद पहली बार अपनी रैली की, और यह खुली घोषणा की कि कश्मीर में आतंकवाद के पीछे उसका हाथ है.

पिछले अनुभव बताते हैं कि पाकिस्तानी फौजी हुकूमत जिहादियों को क्यों ढील दे सकती है. साल 2007 में, जनरल अश्फ़ाक परवेज़ कयानी ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और अल-क़ायदा जैसे गुटों से टकराव के कारण जनरल मुशर्रफ की शांति योजना को वापस ले लिया था और इसके बाद कश्मीर में हिंसा बढ़ गई थी. उनका आकलन था कि सैद्धांतिक मुक़ाबले के लिए सरकार विरोधी जिहादियों के बरअक्स  फौज को जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तय्यबा जैसे कश्मीर-केंद्रित जिहादी गुटों की मदद की जरूरत पड़ेगी. सेनाध्यक्ष के रूप में जनरल क़मर जावेद बाजवा का कार्यकाल नवंबर में खत्म होने को है. तालिबान से बढ़ती टक्कर के बीच, उनके उत्तराधिकारी को वही करना पड़ सकता है, जो जनरल कयानी ने किया था.

आस्था का संकट

आपको चाहे बुरा लगे मगर कश्मीर में पैर फैलाने के लिए जिहादियों को इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा. कुछ अहम वजहों से, कश्मीर को पूर्ण राज्य के दरजे या संवैधानिक गारंटी की मांग पर जो बहस चल रही है वह भारत में अपने भविष्य को लेकर इस क्षेत्र के मुसलमानों की व्यापक असुरक्षा भावना का प्रतीक है. भारत का हमेशा से सांप्रदायिक रहा माहौल चूंकि आज और बदतर हुआ है इसलिए यह असुरक्षा भावना और गहरी हुई है.

कश्मीर के कभी राजनीतिक अभिभावक रहे शेख अब्दुल्ला ने बंटवारे के गंभीर नतीजों के बारे में कभी कहा था कि “कपूरथला, अलवर या भरतपुर जैसी रियासतें कभी मुस्लिम बहुल आबादी वाली थीं मगर आज वहां एक भी मुसलमान नहीं मिलेगा.” उन्हें डर था कि कश्मीरियों का भी “यही भविष्य होने वाला है.”

2008 में, श्री अमरनाथ मंदिर बोर्ड को जब भूमि संबंधी अधिकार दिए गए तो इस्लामपंथियों ने यह कहकर तनाव पैदा करने की कोशिश की कि ‘हिंदू हिंदुस्तान’ कश्मीर की जमीन पर कब्जा करने और उनके मजहब को खत्म करने की तैयारी कर रहा है. इस्लामी नेता सैयद अली शाह गीलानी यह चेतावनी देने लगे थे कि भारत इस “राज्य की आबादी के स्वरूप को बदलने का एजेंडा लागू कर रहा है.”

कश्मीरी युवाओं की एक पीढ़ी ऐसी बातों में आ गई, 2010 और फिर 2016 में उनकी भीड़ और पुलिस के बीच टक्कर होती रही, वे खुद को संकटग्रस्त लोगों और मजहब के रक्षकों के रूप में देखने लगे.

परिस्थितियों का तकाजा है कि भारत कश्मीर में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करे और अपने भविष्य को लेकर आशंकित लोगों से संवाद करे. भारत की सेना चीन का मुक़ाबला करने में लगी है, देश की अर्थव्यवस्था महामारी की मार झेल रही है. ऐसे में पाकिस्तान से टक्कर लेने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता. 2001 में वाजपेयी ने और 2019 में मोदी ने डराने का जो तरीका अपनाया उसे न तो विवेकसम्मत कहा जा सकता है और न फिलहाल विश्वसनीय कहा जा सकता है.

भारत के सामने कश्मीर विधानसभा का चुनाव कराने जैसे जाहिर उपाय के अलावा और भी कई विकल्प उपलब्ध हैं. मसलन, मोदी सरकार घाटी के अपेक्षाकृत शांत तहसीलों और उन शहरी इलाकों से ‘आफ़स्पा’ कानून को हटाने का कदम उठा सकती है, जहां सेना की कोई गतिविधि नहीं है. सरकार राज्य के संवैधानिक भविष्य के सवाल पर क्षेत्रीय दलों और उनके राष्ट्रीय विरोधियों के बीच वार्ता को बढ़ावा दे सकती है. यह इस डर को दूर कर सकता है कि भारत ने कश्मीर की जनसंख्या के स्वरूप को बदलने का इरादा कर लिया है.

नई दिल्ली ने कश्मीर में जो बढ़त हासिल की है उसे अगर वह नहीं गंवाना चाहती तो कदम उठाने का वक़्त आ गया है.

(इस खबर अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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