Friday, 21 January, 2022
होममत-विमत3-4 सियासी मुद्दों और वादों की बौछारों के बीच घूमता नजर आ रहा UP विधानसभा का चुनाव

3-4 सियासी मुद्दों और वादों की बौछारों के बीच घूमता नजर आ रहा UP विधानसभा का चुनाव

भारत में शायद ही कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी होगी, जिसे अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने से परहेज होगा. लेकिन उन्हें दूसरों पर उंगली उठाने से पहले, कभी-कभी अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए, क्योंकि किसी दूजे पर गर्द झाड़ देना बहुत आसान होता है.

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अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली का राजनीतिक गलियारा उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और यूपी का जनादेश देश की सियासत की दिशा और दशा तय करती है. अगर ये बात विधानसभा चुनाव के सन्दर्भ में हो तो राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें यूपी की प्रमुख सियासी मसलों पर टिकना स्वाभाविक है.

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के कार्यकाल को ‘27 साल यूपी बेहाल’ कहने वाली कांग्रेस वर्ष 2017 में ‘उम्मीद की साइकिल’ (अखिलेश यादव) के साथ ‘काम बोलता है’ के रास्ते पर चल पड़ी. हालांकि, तीन दशक से यूपी में अपना अस्तित्व तलाशती कांग्रेस सिर्फ सात सीटों पर ही सिमट कर रह गई. मोदी लहर में यूपी के मतदाताओं को सपा-कांग्रेस का वह अवसरवादी राजनीतिक गठबंधन बहुत ज्यादा आकर्षित नहीं कर सका तथा ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ वाला राजनीतिक स्लोगन अप्रभावी रहा. अंततः योगी आदित्यनाथ को प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

आगामी विधानसभा चुनाव कार्यक्रमों की तारीखों (10 फरवरी से 7 मार्च 2022 के बीच) की घोषणा होते ही उत्तर प्रदेश में सियासी मुद्दों और वादों की बौछारों का आगाज हो चुका है. युवाओं को लैपटॉप देने से लेकर किसानों के लिए मुफ्त बिजली जैसी घोषणाएं की जा रही हैं और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी जारी है.

जहां एक तरफ़, आज अखिलेश यादव क्षेत्रीय जाति विशेष के राजनीतिक दलों के साथ आगामी चुनाव को फतह करने के लिए ‘सब आएं, सबको स्थान और सबको सम्मान’ तथा ‘पिछड़ों-दलितों का इंकलाब होगा, बाइस में बदलाव होगा’ जैसे चुनावी नारों के सहारे प्रभावी तरीके से मैदान में कदम रख चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ़, भाजपा ‘योगी हैं यूपी के लिए उपयोगी’ तथा ‘सोच ईमानदार, काम दमदार, फिर एक बार भाजपा सरकार’ जैसे नारों के साथ मतदाताओं के मूड को अपनी तरफ़ आकर्षित करती नजर आ रही है. मगर इस चुनाव में ‘मोदी हैं तो मुमकिन है’ या ‘गुजरात मॉडल’ की चर्चा नदारद दिख रही है. कई लोग यह कटाक्ष करते हुए नजर आते हैं कि ‘क्या उत्तर प्रदेश अब ‘गुजरात मॉडल’ के नक्शेकदम से दो कदम आगे बढ़कर ‘रामराज्य’ की ओर अग्रसर हो रहा है’.

प्रमुख मुद्दे और आरोप-प्रत्यारोप

विभिन्न पार्टियों के अलाकमानों के संबोधनों का अगर गहराई से विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि सिर्फ तीन-चार प्रमुख चुनावी वादे और आरोप-प्रत्यारोप ही हैं, जो अक्सर विभिन्न राजनीतिक मंचों से दोहराए जा रहे हैं. जिनकी यहां समीक्षा करना समीचीन होगा.

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गुंडाराज और सुशासन के अफ़साने

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमों मायावती सुशासन के मुद्दे पर प्रखरता के साथ बोलती रही हैं और गत वर्ष अपना जन्मदिवस (15 जनवरी) भी ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाया था. मायावती का मानना है कि दलित-वंचित वर्ग के ऊपर सबसे कम अत्याचार उनके शासनकाल में हुए थे. वहीं मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सिर्फ 2017-22 के कार्यकाल में ही ‘रामराज्य’ नजर आता है. भाजपा के कई बरिष्ठ नेता भी योगी का समर्थन करते हुए कहते हैं कि ‘अब युपी में कोई बाहुबली दिखाई नहीं पड़ता, केवल बजरंगबली दिखाई पड़ते हैं’. हालांकि, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी 2012-17 के शासनकाल तथा अपने ड्रीम प्रोजेक्ट यूपी पुलिस की डॉयल 100 और महिला हेल्पलाइन 1090 सेवा को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं.

यदि हम एनसीआरबी के (वर्ष 2016 और 2018) आकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो अखिलेश यादव के अंतिम वर्ष (2016-17) की मुख्यमंत्रीकाल की तुलना में योगी सरकार (वर्ष 2018) के अपराधिक आंकड़ों में लगभग 11  प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी. जहां 2016 में पुलिस ने अपराध के 4,94,025 मामले दर्ज की, वहीं योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के एक वर्ष बाद 2018 में 5,85,157 मामले दर्ज किए. एनसीआरबी के 2020 के आंकड़ों के मुताबिक अनुसूचित जाति के खिलाफ हुए अपराधों के सबसे अधिक 12,714 (25.2 प्रतिशत) मामले उत्तर प्रदेश से थे.

अगर यूपी में रामराज्य है, तो आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि बुलंदशहर, प्रयागराज, गोरखपुर, उन्नाव, हापुड़ तथा कासगंज आदि स्थानों पर हुई घिनौनी घटनाओं का जिम्मेदार कौन है? इस संदर्भ में सुल्तानपुर जिले के नीमसराय गांव के पूर्व प्रधान सुरेन्द्र यादव सवाल करते हैं कि ‘अगर गुंडाराज खत्म हो गया है तो मॉब-लिंचिंग को अंजाम देने वाले गुंडे कौन हैं? क्या उन्हें सत्ता की शह नही प्राप्त है? क्या रामराज्य में भी सात खून माफ़ था?’ इस गांव के कई अन्य लोगों का भी मानना है कि योगी सरकार के आने से सवर्ण जातिओं का मनोबल बढ़ गया है, जिसकी बानगी हाल ही में हुए स्थानीय चुनावों में दिखी. उदाहरण स्वरूप, 45 सीटों वाले जिला पंचायत सदस्यों में से सिर्फ 03 सीटों पर ही भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई, लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष (सुल्तानपुर) की कुर्सी पर भाजपा की ऊषा सिंह विराजमान हुईं. सुरेन्द्र यादव कहते हैं, ‘पहले भी दलित-पिछड़े वर्ग के साथ ज्यादती करना यहां आम बात थी और अब भाजपा के तथाकथित ‘रामराज्य’ में भी कमोबेश यही स्थिति है.’

जाति है कि जाती नहीं

जाति और राजनीति का गठजोड़ भारत में हमेशा से रहा है. अखिलेश यादव पर ‘यादववाद’ फ़ैलाने का आरोप लगाने वाली भाजपा, आज स्वयं उसी दलदल में फंसती नजर आ रही है. एक चर्चित रिपोर्ट के मुताबिक, ‘यूपी में 26% डीएम ठाकुर हैं यानी योगी आदित्यनाथ की जाति से हैं. यूपी में कुल 75 जिले हैं, इनमें से 61 ज़िलों में एसपी और डीएम में से एक पद पर ठाकुर या ब्राह्मण हैं. कई जगहों पर दोनों पदों पर इन्हीं जातियों के अफ़सर हैं.’

अब यहां प्रश्न यह उठता है कि अखिलेश यादव के शासनकाल के दौरान विभिन्न जिलों में तैनात पिछड़े समाज से आने वाले डीएम कहां चले गए. आज उत्तर प्रदेश में सिर्फ चार दलित और एक यादव डीएम तैनात है तथा इतने बड़े प्रदेश में क्या योगी सरकार को एक भी योग्य मुस्लिम डीएम नहीं मिला. दलित समाज को मिलने वाली जीरो एडमिशन की नीति में हेरफेर क्यों किया गया, भविष्य में जिसके नकारात्मक परिणाम आ सकते हैं.

जहां एक तरफ़, योगी सरकार में गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक पद पर सिर्फ किसी जाति विशेष के लोगों का चयन करने का मामला सामने आया. वहीं प्रयागराज में ओबीसी अभ्यर्थियों को एनएफएस (अयोग्य) घोषित कर दिया गया. फिर भी आंख बंद कर आप कह सकते हैं, ‘जाति ना पूछो साधु (योगी) की’.

रोजी-रोटी का ज्वलंत मुद्दा

स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी के अलावा रोजी-रोटी का सवाल भी इस चुनाव का प्रमुख मुद्दा है, जिसे अखिलेश यादव विभिन्न मंचों पर प्रमुखता के साथ उठा रहे हैं. पिछले लकडाउन के समय लाखों लोगों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ीं, जिसके कारण उन पर गरीबी की दोहरी मार पड़ी. विपक्ष हमेशा यह आरोप लगाता है कि भाजपा चुनाव (2017) के समय 70 लाख नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन योगी सरकार अपनी कमियां छुपाने के लिए टैबलेट और लैपटॉप देकर युवाओं के घाव पर मरहम लगा रही है. आपको यह बताते चलें कि 2017 में जब योगी आदित्यनाथ प्रदेश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे, उस समय बेरोजगारी की दर 2.4 प्रतिशत थी, लेकिन आज लगभग 4.8 प्रतिशत हो चुकी है. ऊपर से वर्ष 2019 में 69,000 शिक्षक पदों पर आरक्षण की भारी अनियमिताएं की गईं तथा पिछड़े वर्ग की लगभग 15 हजार सीटें सामान्य वर्ग को आवंटित कर दी गईं. हालांकि, मामला अब कोर्ट में लंबित है. जिसे प्रियंका गांधी ने यूपी का व्यापम घोटाला करार दिया.

तुष्टीकरण और पुष्टीकरण की राजनीति

भाजपा की मुखर हिंदुत्व पॉलिटिक्स के कारण भारत में सेकुलरिज्म की भावना को गहरी चोट लगी है. लोकतांत्रिक संस्थाएं नारंगी रंग में रंगी हुई नजर आ रही हैं. कभी अयोध्या में बृहद स्तर पर दीपोत्सव करके उसे गिनीज बुक में नाम दर्ज करने का राजहठ किया जाता है, तो कभी वाराणसी के निवासियों से अपील की जाती है कि विश्वनाथ मंदिर के लोकार्पण के दिन अपने घरों में एक दीया अवश्य जलाएं. इस संदर्भ में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी लिखते हैं कि ‘मौजूदा सरकार जिस तरह धर्म को राजनीति के केंद्र में लाई है वैसा पहले कभी नहीं हुआ, जो हिंदू धार्मिक अनुष्ठान पहले से हो रहे थे उनका आकार-प्रकार अचानक ओलंपिक-एशियाड जैसा होने लगा, ऊपर से ‘नर्मदा यात्रा’ और ‘शंकराचार्य प्रकटोत्सव’ जैसे अनेक नए पर्वों का आविष्कार भी हुआ.’

आज सत्ता पक्ष की धार्मिक-चोला में रंगी राजनीतिक आक्रामकता के आगे विपक्ष के नेता अखिलेश यादव भी अपने चुनावी सभाओं में कौमी एकता पर बड़े सधे लहजे में भाषण देते हैं तथा पाकिस्तान, हनुमान और मुसलमान जैसे शब्दों को बोलने से बचते नजर आते हैं. मगर अपने परंपरागत यादव वोट बैंक को साधने के लिए अखिलेश यादव स्वयं को कृष्ण का वंशज बताने से परहेज भी नहीं करते हैं तथा ब्राह्मण वोट को आकर्षित करने के लिए पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के किनारे परशुराम की 108 फीट की मूर्ति लगवाने की वकालत करते नजर आते हैं. इस संदर्भ में सुल्तानपुर के बंशगोपाल सिंह कहते हैं कि ‘ऐसा लगता है कि भाजपा के आक्रामक हिन्दू पुष्टीकरण का मुद्दा समाजवादी पार्टी की पुरानी मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को ठंडे बस्ते में डालने को मजबूर कर दिया.’

परिणाम

भारत में शायद ही कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी होगी, जिसे अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने से परहेज होगा. लेकिन उन्हें दूसरों पर उंगली उठाने से पहले, कभी-कभी अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए, क्योंकि किसी दूजे पर गर्द झाड़ देना बहुत आसान होता है. रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार के साथ-साथ मंहगाई जैसे मुद्दे आम आदमी को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं. यूरिया, बिजली और गैस सिलेंडर के बढ़े हुए दाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी वर्तमान सरकार को घेरते हुए नजर आती हैं.

जहां एक तरफ़, अखिलेश यादव किसानों को मुफ्त में बिजली (300 यूनिट) और पानी देने की वकालत करते हैं. वहीं दूसरी तरफ़, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के एक कदम आगे प्रियंका गांधी महिलाओं को 10 लाख तक मुफ्त में इलाज की सुविधा व 40 प्रतिशत आरक्षण देने साथ-साथ मुफ्त में स्कूटी, गैस सिलेंडर और स्मार्टफ़ोन इत्यादि देने के वादे कर चुकी हैं. भाजपा के पास भी गिनाने के लिए प्रधानमंत्री स्वस्थ भारत योजना, किसान सम्मान निधि, बुंदेलखंड में डिफ़ेंस कॉरिडोर, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, नौ हज़ार करोड़ का एम्स अस्पताल, फ़र्टिलाइज़र फ़ैक्टरी आदि प्रयाप्त मुद्दे हैं, जिसे योगी आदित्यनाथ भुनाने का प्रयास करेंगे.

उपरोक्त मुद्दों के इतर मायावती प्रायः सामाजिक न्याय, भीमराव अम्बेडकर ग्राम्य विकास योजना और कांशीराम समग्र विकास योजना को आगे बढ़ाने की बात करती हैं. अब तो आने वाले 10 मार्च को ही पता चलेगा कि कौन से प्रमुख सियासी मुद्दे और वादे उत्तर प्रदेश की जनता के लिए ज्यादा मायने रखते हैं और किस दल को जनता सत्ता के चौखट तक पहुंचाएगी.

(लेखक हैदराबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में डॉक्टरेट फेलो हैं. इन्हें भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद द्वारा प्रतिष्ठित ‘प्रोफ़ेसर एम॰एन॰ श्रीनिवास पुरस्कार-2021’ से भी नवाजा गया है. वो @deviprasadPhD पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.


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