Saturday, 2 July, 2022
होममत-विमतMSP का हिसाब लगाना किसी चुनौती से कम नहीं, कानूनी गारंटी देने पर हो रही देरी वाजिब

MSP का हिसाब लगाना किसी चुनौती से कम नहीं, कानूनी गारंटी देने पर हो रही देरी वाजिब

मोदी सरकार ने पिछले साल एमएसपी पर फैसले के लिए कमेटी बनाने का ऐलान किया, मगर उसमें देरी बता रही है कि ये फैसला कितना पेचीदा है.

Text Size:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर 2021 को तीन कृषि कानूनों को रद्द करने के फैसले के साथ यह ऐलान भी किया था कि सरकार एमएसपी सहित महत्वपूर्ण मुद्दों पर कारगर और पारदर्शी फैसले के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी का गठन करेगी.

कमेटी में कृषि वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और किसानों के प्रतिनिधियों को शामिल करना था. अब कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो चुका है, तो कमेटी का गठन शायद नतीजों के ऐलान के बाद ही हो.

कानूनी न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी की दिशा में पहला कदम उठाने में भी देरी बताती है कि नीति-निर्माताओं के आगे कैसी दुविधा और चुनौतियां हैं. कृषि की हालत राज्यों और राज्य के भीतर विभिन्न इलाकों में भी काफी अलग है. इसलिए कमेटी का काम आसान तो कतई नहीं रहने वाला है.

एमएसपी की कानूनी गारंटी के दो पहलू हैं, जिनकी जरूर चर्चा की जानी चाहिए. एक, क्या यह किसानों के साथ कुल मिलाकर देश हित में जरूरी है? और दूसरे, क्या यह आर्थिक तौर पर मुनासिब है? जाहिर है, यह तय करने में दूसरा सवाल कई अन्य मसलों के साथ जरूरी होगा कि क्या एमएसपी की कानूनी गारंटी वाजिब है.

इस लेख में हमारा फोकस इसी मसले तक सीमित है कि एमएसपी को कानूनी गारंटी दी जाती है तो सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें


यह भी पढ़ें: जापान-ऑस्ट्रेलिया के बीच समझौता दिखाता है कि क्वॉड में भारत के बिना भी दूसरे देश आगे बढ़ सकते हैं


एमएसपी पर कितना खर्च आएगा?

विशेषज्ञ यह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि एमएसपी की कानूनी गारंटी का आर्थिक असर क्या होगा. हालांकि उनके आंकलन कई अनुमानों पर आधारित हैं, जो पूरी तरह साफ नहीं हैं. इक्रीयर में मेरे साथियों डॉ. अशोक गुलाटी और श्वेता सैनी के मुताबिक, गेहूं, धान और गन्ने के अलावा अगर 10 फीसदी फसल पैदावार की खरीद भी की गई, तो सरकार को 5.4 लाख करोड़ रुपए का खर्च उठाना पड़ेगा.

यह इस अनुमान पर आधारित है कि आर्थिक कीमत एमएसपी से करीब 30 फीसदी ऊपर बैठेगी. उनकी दलील यह भी है कि गेहूं और धान की खरीद के पहले के अनुभव यही बताते हैं कि बड़े पैमाने पर खरीद के बावजूद बाजार में कीमतें अक्सर एमएसपी से नीचे ही रहती हैं.

हालांकि पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव नंद कुमार का आंकलन है कि कानूनी गारंटी से सिर्फ 50,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च बैठेगा. उनका अनुमान है कि अगर एमएसपी वाली दूसरी फसलों के पैदावार की कानूनी गारंटी दी जाती है तो गेहूं और धान की खरीद के मौजूदा स्तर को जारी रखना होगा. अगर उनके अनुमान के मुताबिक, 2,40,000 करोड़ रुपए के मौजूदा खाद्य सब्सिडी को जोड़ लिया जाए तो कानूनी गारंटी से इस मद में खर्च करीब 3,00,000 करोड़ रुपए बैठेगा.

संयुक्त किसान मोर्चा के योगेंद्र यादव और किसान एक्टिविस्ट किरण विस्सा ने लिखा है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में मोटे अनाज, दलहन और तिलहन को भी शामिल कर लेना चाहिए. उनका अनुमान है कि फसल पैदावार के सिर्फ 10-20 फीसदी की खरीद की गारंटी भी कर दी जाएगी तो देश भर में बाजार की कीमतें एमएसपी के स्तर पर ऊपर उठ जाएंगी. उनका सुझाव यह भी है कि किसानों को कृषि पैदावार बाजार समिति (मंडी) में बिक्री की कीमत और एमएसपी के बीच फर्क का भुगतान किया जाना चाहिए.


यह भी पढ़ें: ‘लिंचिंग’ की घटनाओं पर पाना है काबू तो इन्हें सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने से बचने की जरूरत


हिसाब लगाना मुश्किल 

एमएसपी की कानूनी गारंटी के आर्थिक असर का आंकलन बेहद पेचीदा होगा. इसके लिए सभी फसलों के पैदावार के केंद्रों, पैदावार आने के रुझान, साल के दौरान बाजार मूल्य, खासकर आगमन के पीक सीजन और गांव के स्तर पर बनियों से किसानों को मिलने वाले खरीद मूल्य की जानकारी जरूरी होगी. अगर सरकारी एजेंसियों को इतने किस्म की पैदावार एमएसपी पर खरीदनी होगी तो उन्हें भंडारण की अतिरिक्त क्षमता, बड़ी कार्यशील पूंजी और सबसे बढ़कर खरीद एजेंसियों में जानकार लोगों की दरकार होगी.

गेहूं और धान के मामले में भी कई राज्य स्तरीय खरीद एजेंसियों के जानकार स्टाफ पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. हाल के अनुभवों से पता चलता है कि भंडारण और गुणवत्ता नियंत्रण का काम निजी कंपनियों के हवाले किया जा सकता है, जैसा कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य एजेंसियों ने किया है. निजी उद्यमी गारंटी योजना के तहत, 7 से 10 साल के लिए किराए पर दी गई है. हालांकि इन गोदामों में भी अनाज की गुणवत्ता पर नजदीकी निगरानी रखनी होगी क्योंकि इसकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपए होती है.

आर्थिक असर की गणना में एमएसपी पर खरीदे अनाज की भंडारण अवधि का अनुमान लगाने की जरूरत है. खरीद पैदावार वाले इलाकों में होगी लेकिन उन्हीं जगहों पर माल को बेचना व्यावहारिक नहीं हो सकता है. ऐसी चीजों की कमी वाले इलाकों में ले जाने और बिक्री का खर्च भी अतिरिक्त होगा. इससे बाजार मूल्य भी गिरेगा. ये समस्याएं गेहूं और धान के मामले में भी आती रही है, जिसकी खरीद कई दशकों से चल रही है.

हर साल केंद्र सरकार तय करती है कि गेहूं और धान की बिक्री खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत की जाए. ऐसी बिक्री कभी अच्छी दर पर नहीं होती और सरकार को इस मामले में भी सब्सिडी देनी पड़ती है. ओएमएसएस के तहत कीमत की नीति साल-दर-साल बदलती रही है, जो सरकार के बाजार मूल्य और खाद्य महंगाई पर निर्भर करती है.

पहले सरकार कई योजनाओं के तहत गरी का गोला, पिसाई वाली गरी, सूरजमुखी, मूंगफली, अरहम, सरसों, चना, मूंग, सोयाबीन, कपास, दालें और तिलहन एमएसपी पर खरीद चुकी है. कई जिंसों के मद में नाफेड (भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ) को घाटा उठाना पड़ा और एक मौके पर तो कुल घाटा 1,083 करोड़ रुपए तक हो गया.

दरअसल सरकार 2014-16 में नाफेड को बंद करने पर विचार कर रही थी. ये घाटा आखिरकार सरकार ने उठाया, ताकि नाफेड को बचाए रखा जा सके.

इसी तरह भारतीय कपास निगम कई साल तक घाटा उठाता रहा और सरकार केंद्रीय बजट में उसकी भरपाई करती रही.


यह भी पढ़ें: कर्ज की जंजीर तोड़ने और राजस्व बढ़ाने के लिए मोदी सरकार इस बजट में कर सकती है दो उपाय


सरकारी कमेटी को आगे आने की दरकार

तमाम संभावना यही है कि एमएसपी की कानूनी गारंटी पर बड़ी मात्रा में जिंसों की खरीद सरकार के लिए घाटे का सबब होगा.

गन्ना ही इकलौता है, जिसे लेकर निजी खिलाड़ी भी सरकारी मूल्य पर खरीद करे, इस लेकर कानून है. आवश्यक जिंस कानून के तहत 1966 में जारी गन्ना (नियंत्रण) कानून के मुताबिक गन्ना खरीद के 14 दिन के भीतर भुगतान करना जरूरी है. चीनी की कम वैश्विक कीमत वाले वर्षों में भारत से चीनी का निर्यात बिना सरकारी सब्सिडी के नहीं हो पाता. हालांकि चीनी मिलें गन्ने के बकाया का भुगतान करने की ताकत भी नहीं रखती और उन्हें गन्ने के भुगतान के लिए बिना ब्याज के कर्ज और कई दूसरी रियायतें दी जाती हैं.

कुल मिलाकर, एमएसपी की कानूनी गारंटी वाली सभी पैदावार की सरकारी खरीद बेहद उलझाऊ और खर्चीला प्रस्ताव है.
हम यहां आर्थिक असर का अनुमान देने से बच रहे हैं क्योंकि ऐसा आंकलन पैदावार केंद्रों के व्यापक डेटा, कीमतों के पूर्व रुझान और खरीदे पैदावार की बिक्री के तरीके की जानकारी के बिना बेहद मुश्किल है. इन जानकारियों के अभाव में एमएसपी गारंटी वाली खरीद का अनुमान लगाना महज एक अंदाजा भर ही होगा.

इसलिए हमें स्वतंत्र और जानकार विशेषज्ञों की कमेटी के गठन का इंतजार करना चाहिए, जो कई तरह के विकल्प लेकर आएगी, जिससे किसानों को अपनी पैदावार की एमएसपी भी मिल जाए और कीमतों में उठा-पटक को भी कम किया जा सके.

(पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव हुसैन इंडियन काउंसिल फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (इक्रीयर) में विजिटिंग सीनियर फेलो हैं. महापात्रा उर्वरक और ग्रामीण विकास मंत्रालय में केंद्रीय सचिव रह चुके हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: बनिया वर्चस्व और आरक्षण के कारण नहीं हो रहा है ब्राह्मण प्रतिभाओं का पलायन, दि इकोनॉमिस्ट गलत है


 

share & View comments