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Sunday, 19 April, 2026
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आपातकाल के बाद की पीढ़ी उस दौर में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और मीडिया सेंसरशिप को किस रूप में देखे

जब आपातकाल के 45 बरस बाद 2020 में हम पीछे मुड़कर उन परिस्थितियों को देखते हैं तो उस दौर में खींची गईं सारी लकीरें स्पष्ट नज़र आती हैं.

भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कैसे कब्ज़ा जमाया और क्यों चीन इस स्थिति को नहीं बदल सकता

इंदिरा गांधी के समय तक कांग्रेस ने सहजता से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर नियंत्रण कर रखा था. लेकिन 1990 के दशक के मध्य से पांच उपायों के सहारे भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हावी होते गई.

यह कोई आपातकाल नहीं है, मोदी-शाह की जोड़ी लोकतंत्र का इस्तेमाल करके ही लोकतंत्र को खत्म कर रही है

आज के वक्त की तुलना इमरजेंसी के दौर से करने में लगे हैं तो एक बात हमारी नजरों से ओझल हुई जा रही है कि संविधान के लागू होने के साथ इस देश में गणतंत्रात्रिक मुल्क होने का जो पहला अध्याय खुला था, वो कब का बंद हो चुका है.

नेहरू से लेकर मोदी तक किसी ने सरदार पटेल की चीन नीति को नहीं समझा

चीन के विस्तारवाद के खिलाफ भारत का बेहद सख्त रुख चाहते थे सरदार पटेल. उन्होंने कहा था कि भारत को एक साथ दो मोर्चों- चीन और पाकिस्तान पर भिड़ना है. खासकर तिब्बत संबंधी चीन की नीति को लेकर वे सशंकित थे.

गलवान संघर्ष एक निर्णायक मोड़ है जब भारतीय सैनिकों ने चीनियों के छक्के छुड़ा दिए

भारतीय लोकतंत्र की अराजक प्रकृति ने 19 जून की सर्वदलीय बैठक में दिए गए भ्रामक संदेशों के बवंडर से प्रधानमंत्री मोदी को बचा लिया, लेकिन गलवान संघर्ष के दो संदेश दुनिया तक पहुंच चुके हैं.

भारत में लॉकडाउन के समय का अनुशासन ढीला पड़ रहा है, कोविड से लड़ाई में लापरवाही भी बढ़ रही है

जीत से पहले जश्न मनाना और ‘कामयाबी’ की कहानियों पर ज्यादा कान देना खतरनाक हो सकता है. कोरोनावायरस जब तक पूरी तरह खत्म नहीं होता उसे खत्म हुआ मत मानिए.

मिलेनियल्स ने इंडिया शाइनिंग देखा है, वो 70 साल के नहीं बल्कि 30 साल के भारत पर मोदी को जज करेंगे

अधिकांश भारतीय मिलेनियल्स की राजनीतिक स्मृति अटल बिहारी वाजपेयी से शुरू होती है, जवाहरलाल नेहरू से नहीं. इसलिए, प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी को पिछले 30 वर्षों के संदर्भ में आंका जाएगा, और निश्चित रूप से 70 वर्षों से फर्क नहीं पड़ने वाला.

मोदी पर वर्तमान मेहरबान है लेकिन भविष्य उन्हें इस रूप में नहीं देखेगा

वर्तमान, प्रधानमंत्री मोदी पर मेहरबान है. लेकिन भविष्य में उन्हें किस चीज़ के लिए याद किया जाएगा और वो अपने पीछे क्या विरासत छोड़कर जाएंगे?

1962 की चीन से लड़ाई में अटल ने नेहरू को घेरा था तो लद्दाख मामले में विपक्ष क्यों ना करे मोदी से सवाल

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच होते तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार, पार्टी और समर्थकों के इस रवैये को लेकर क्या सोचते? इस पर भी सोचिये जरा.

1962 का रोना रोने या मोदी सरकार और सेना की आलोचना करने से चीन का ही हित सधता है

अपने ड्राइंग रूम में बैठकर मोदी सरकार और सशस्त्र सेनाओं पर दबाव डालना, ये जाने बिना कि 15,000 फीट की ऊंचाई वाली एलएसी पर क्या चल रहा है, गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार है.

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ईरान पर ट्रंप-नेतन्याहू का दांव: क्या फिर लौट रही है ‘रिजीम चेंज’ की नीति?

अमेरिका के लक्ष्य अधूरे रह गए, अब उसके पास न तो इतनी ताकत है और न इतना जोश है कि वह युद्ध फिर शुरू कर सके; और ईरान? घुटने टेकने की जगह वह पूरे संकल्प के साथ लड़ा. उसकी बागडोर अब ज्यादा कट्टरपंथी लोगों के हाथ में है

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राजनीति

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विपक्ष ने प्रधानमंत्री के संबोधन की आलोचना की

नयी दिल्ली, 18 अप्रैल (भाषा) विपक्षी नेताओं ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देश के लिए संबोधन की आलोचना करते हुए इसे राजनीति...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.