इंदिरा गांधी के समय तक कांग्रेस ने सहजता से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर नियंत्रण कर रखा था. लेकिन 1990 के दशक के मध्य से पांच उपायों के सहारे भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हावी होते गई.
आज के वक्त की तुलना इमरजेंसी के दौर से करने में लगे हैं तो एक बात हमारी नजरों से ओझल हुई जा रही है कि संविधान के लागू होने के साथ इस देश में गणतंत्रात्रिक मुल्क होने का जो पहला अध्याय खुला था, वो कब का बंद हो चुका है.
चीन के विस्तारवाद के खिलाफ भारत का बेहद सख्त रुख चाहते थे सरदार पटेल. उन्होंने कहा था कि भारत को एक साथ दो मोर्चों- चीन और पाकिस्तान पर भिड़ना है. खासकर तिब्बत संबंधी चीन की नीति को लेकर वे सशंकित थे.
भारतीय लोकतंत्र की अराजक प्रकृति ने 19 जून की सर्वदलीय बैठक में दिए गए भ्रामक संदेशों के बवंडर से प्रधानमंत्री मोदी को बचा लिया, लेकिन गलवान संघर्ष के दो संदेश दुनिया तक पहुंच चुके हैं.
अधिकांश भारतीय मिलेनियल्स की राजनीतिक स्मृति अटल बिहारी वाजपेयी से शुरू होती है, जवाहरलाल नेहरू से नहीं. इसलिए, प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी को पिछले 30 वर्षों के संदर्भ में आंका जाएगा, और निश्चित रूप से 70 वर्षों से फर्क नहीं पड़ने वाला.
स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच होते तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार, पार्टी और समर्थकों के इस रवैये को लेकर क्या सोचते? इस पर भी सोचिये जरा.
अपने ड्राइंग रूम में बैठकर मोदी सरकार और सशस्त्र सेनाओं पर दबाव डालना, ये जाने बिना कि 15,000 फीट की ऊंचाई वाली एलएसी पर क्या चल रहा है, गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार है.
अमेरिका के लक्ष्य अधूरे रह गए, अब उसके पास न तो इतनी ताकत है और न इतना जोश है कि वह युद्ध फिर शुरू कर सके; और ईरान? घुटने टेकने की जगह वह पूरे संकल्प के साथ लड़ा. उसकी बागडोर अब ज्यादा कट्टरपंथी लोगों के हाथ में है