राजनीति हो या आंदोलन, हम अपने सार्वजनिक जीवन में ऐसा कौन-सा रास्ता अपनाएं जिसमें असुविधाजनक सच्चाई, नैतिक जटिलताओं और न्यूनतम मानवीय संवेदना के लिए जगह हो? लखीमपुर खीरी से मैं यही सवाल लेकर लौटा हूं.
कोर कमांडर स्तर की बातचीत में भारत अपनी ‘इस बात पर कायम’ रहा कि चीन ने ही यथास्थिति को भंग करनी की शुरुआत पिछले साल की, लेकिन चीन ने दांव और ऊंचे कर दिए.
किसी नेता का कैरियर उसके द्वारा रचे गए आख्यान पर निर्भर होता है लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री की गद्दी तक सार्वजनिक सेवा के जो 20 वर्ष मोदी के रहे हैं उससे कोई आख्यान नहीं उभरता.
दिल्ली के पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना आम जनता के बीच इस बल की छवि सुधारना चाहते हैं. लेकिन वास्तव में इसका कोई मायने नहीं है—यकीन न हो तो भारत के गृह मंत्रालय को ही देख लीजिए.
जब वो पीएम नहीं थे, तो इमरान खान पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई लड़कियों के अपहरण और उनके जबरन धर्मांतरण का मुद्दा उठाया करते थे. अब वो धार्मिक दक्षिणपंथियों को खुश करने में लगे हैं.
सेक्युलरिज्म और कम्युनलिज्म का खेल सिर्फ बीजेपी नहीं खेल रही है. ये खेल सेक्युलर कहे जाने वाले दल भी खेल रहे हैं क्योंकि इसकी वजह से उन्हें एकमुश्त मुसलमान वोट मिल जाते हैं.
पत्रकारों के एक संघ ने टैक्स से छूट देने वाले ठिकानों में पैसे जमा करने वालों की पैंडोरा लिस्ट का पता लगाया तो जवाबदेही की जरूरत महसूस की जाने लगी जबकि इसके नाम पर दिखावा ही किया जाता रहा है.
मुझे लिखित संदेश मिला कि कानू सान्याल अपना ‘प्रतिनिधिमंडल’ मेरे पास भेजना चाहते हैं. उम्मीद की जा रही थी कि अपने उग्र समर्थकों के साथ आ रहे दुबले-पतले गुस्सैल बूढ़े आदमी के साथ बेहद तीखी मुठभेड़ होगी.