Friday, 27 May, 2022
होममत-विमतचीन मानता है कि उसका समय आ गया है, लेकिन अभी उसे कुछ सच्चाइयों को पचाना ही पड़ेगा

चीन मानता है कि उसका समय आ गया है, लेकिन अभी उसे कुछ सच्चाइयों को पचाना ही पड़ेगा

कोर कमांडर स्तर की बातचीत में भारत अपनी ‘इस बात पर कायम’ रहा कि चीन ने ही यथास्थिति को भंग करनी की शुरुआत पिछले साल की, लेकिन चीन ने दांव और ऊंचे कर दिए.

Text Size:

भारत और चीन के कोर कमांडरों की वार्ता का 13वां दौर रविवार को जब गतिरोध के साथ समाप्त हो गया, तो साफ हो गया कि दोनों देशों ने हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गश्ती प्वाइंट 15 से सेनाओं की वापसी के सवाल पर असहमत होने पर सहमत होने का फैसला कर लिया है.

ऊपर से देखने पर तो यह बहुत परेशान करने वाली बात नहीं है. ले.जनरल पी.जी.के. मेनन के नेतृत्व में भारतीय पक्ष ‘अपनी बात पर कायम’ रहा कि चीन ने ही यथास्थिति को भंग करने की शुरुआत पिछले साल की और भारत के साथ उसने सीमा विवादों के मामले में जो कई समझौते किए थे और आपसी सहमति बनाई थी उन्हें तोड़ा.

भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि द्विपक्षीय रिश्ते में सुधार इस पर निर्भर है कि चीन एलएसी से पीछे अपनी सीमा में अंदर चला जाए और यथास्थित को बहाल करे. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि चीन ने अपनी ‘राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा’ करने का संकल्प जाहिर करके दांव और ऊंचे कर दिए.

चीन यह निश्चित संकेत दे रहा है कि वह लद्दाख में जमे रहने के लिए आया है. अभी एक पखवारा पहले उत्तराखंड के मिडल सेक्टर में घुसपैठ की घटनाएं हुईं, जबकि अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में भारतीय और चीनी सेनाएं आमने-सामने डटी हुई हैं.

इसलिए, एलएसी के पूरे 3,488 किलोमीटर क्षेत्र चीन यही संदेश दे रहा है कि ज्यादा फौजी ताकत रखने के कारण वह एक ऐसे देश के रोके नहीं रुकेगा, जिससे वह आर्थिक आकार में पांच गुना ज्यादा बड़ा है और जो अपने खेल के लिए समर्थन हासिल करने के वास्ते अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसी शक्तियों और ‘क्वाड’ जैसे संगठन से जुड़ा है.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

चीनियों को शायद लगता है कि उनका समय आ गया है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पर साल के अंत में शिखर वार्ता के लिए लगभग जबरन राजी कर लिया है, भले ही यह वर्चुअल वार्ता होगी. बाइडन ने मान लिया है कि दूसरा कोई उपाय नहीं है, हालांकि व्लादिमीर पुतिन से वे पिछले साल प्रत्यक्ष मिले थे.

फिलहाल तो बाइडन डटे हुए हैं. अभी ट्रंप के जमाने का यह संकल्प कायम है कि घरेलू अर्थव्यवस्था के संरक्षण के लिए चीनी सामान पर ऊंचा शुल्क लगाया जाएगा. चीनी सेना पीएलए से जुड़े चीनी शोधकर्ताओं पर वीसा घोटाला करने के आरोप लगाए गए हैं, जबकि कथित फौजी जुड़ा के आरोप के कारण कई छात्रों की वीसा की अर्जी खारिज कर दी गई. जुलाई में अमेरिका ने यूरोपीय संघ और ‘नाटो’ के अपने सहयोगियों को चीनी सरकार पर यह आरोप लगाने के लिए एकजुट किया कि वह ‘माइक्रोसॉफ्ट’ में हैकिंग कर रही है.

अमेरिका और चीन के बीच कुछ-कुछ हो रहा है मगर वह नहीं जिसकी उम्मीद बराक ओबामा ने की थी.
भारत को ‘जी-2’ वाली स्थिति के दोहराए जाने का डर नहीं होना चाहिए. यह एक द्विपक्षीय प्रस्ताव था जिसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के इस मशहूर बयान के दो साल बाद 2011 में पेश किया गया था कि ‘अमेरिका और चीन के बीच संबंध 21वीं सदी में आकार लेगा.’

इसके 12 साल बाद वह भविष्यवाणी सच साबित हो सकती है, लेकिन उस रूप में नहीं जिसमें ओबामा ने उम्मीद की थी. चीन आज कहीं ज्यादा ताकतवर है, वह साउथ चाइना सी और फिर लद्दाख में अपनी चला रहा है, ताइवान के रक्षा क्षेत्र में लड़ाकू विमान भेज रहा है या जर्मनी को चेतावनी दे रहा है कि वह मानवाधिकार की वार्ताओं में शरीक न हो वरना चीन के साथ उसका व्यापार संबंध खराब हो सकता है जिसमें चीन जर्मन कारों का बड़ा खरीदार है.

फिर भी, गौर कीजिए कि भारत उसे लद्दाख में छूट नहीं दे रहा, बावजूद इस तथ्य के कि भारतीय सेना के सामने परेशानियां कई हैं. बड़ी तस्वीर के लिहाज से विचार कीजिए. चालू बाज़ार दरों के हिसाब से चीन की जीडीपी आज 14.9 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है जबकि भारत की जीडीपी 2.6 ट्रिलियन डॉलर के बराबर ही है. पीपीपी (क्रय शक्ति की कसौटी) के हिसाब से इसका अर्थ हुआ कि चीन की जीडीपी 24.2 ट्रिलियन डॉलर के बराबर और भारत की 8.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है. भारत चीन की सेना को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है जबकि चीन अपने प्रत्यक्ष प्रतियोगी अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते को ‘थोड़ा चिंताजनक’ मानता है. इसके सिवा चीन भारत को अपनी ‘सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती’ नहीं मानता.

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन कहते हैं कि सत्ता संतुलन 1986 के सुमदोरोंग चू/ वांगडुंग टक्कर के बाद से भारत के लिए प्रतिकूल हो गया है.

चीन में भारत के कभी राजदूत रहे गौतम बंबावले और विख्यात अर्थशास्त्री अजित राणाडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को ‘घरेलू नीतियों की उन खामियों पर ध्यान देना चाहिए जिन्होंने उसे रोक रखा है, और उन खामियों को दूर करने के लिए ऊर्जा और बौद्धिक क्षमता की खोज करनी चाहिए,’ मसलन निजी निवेश को बढ़ावा देकर. टाटा को एअर इंडिया की बिक्री एक शुरुआत हो सकती है. लेखकों का कहना है कि “चीन के बारबार आने में भारत को 20 साल लग सकते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं कि देर से आगे आन वाले देश, जिनकी आबादी काफी युवा है, तकनीक की मदद से ऊंची छलांग लगा सकते हैं.


यह भी पढ़ें: G7 का चीन पर फोकस मोदी के भारत के लिए राहत की सांस है. लेकिन कोविड की दवा को लेकर सवाल बने रहेंगे


चीन को संदेश पहुंचना चाहिए

इस बीच, चीन की सरकारी मीडिया में आए लेखों में भारत की सुरक्षा, और रणनीतिक तेवर के बारे में निम्नलिखित धारणाएं बनाते हैं. पहली यह कि भारत खुद को एक बड़ी ताकत मानता है, और इसने अमेरिका के साथ सहयोग क ओ मजबूत कर रहा है, तो अमेरिकी हथियार केवल अपने अस्त्र-शस्त्र को आधुनिक बनाने और ‘समर्थन खरीदने’ के लिए खरीद रहा है. दूसरी, भारत ने अमेरिका के साथ चार बुनियादी रक्षा समझौते किए हैं, जो संवेदनशील तकनीक देने की गारंटी देते हैं. लेकिन इसके बाद सिवा बातों के, ठोस कुछ नहीं किया गया है. तीसरी, भारत नहीं बल्कि अमेरिका हथियारों के मामले में सहयोग को आगे बढ़ा रहा है ताकि भारत रूस से हथियार न खरीदे. चौथी बात यह कि भारत खुद को जोड़तोड़ में शामिल किए जाने की छूट नहीं देगा, इसलिए वह रूस से हथियार खरीदना जारी रखा है.

चीनी मीडिया विदेशी हथियारों की खरीद पर भारत की निर्भर्ता का उपहास भी उड़ता है. इसे वह कमजोरी की निशानी के रूप में देखता है और गुटनिरपेक्षता का रुख बनाए रखने की उसकी मजबूरी भी मानता है. इसके अलावा, वह मानता है कि हिन्द महासागर पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ कायम करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की इच्छा केवल 500 समुद्री मील तक, ‘मीडियम कंट्रोल’ 1000 मील और ‘माइल्ड कंट्रोल’ उसके आगे तक सीमित है.

लेकिन कुछ ऐसा भी है जिसे चीन अभी तक पचा नहीं पाया है. वह है क्वाड, रूस, के साथ-साथ यूरोपीय संघ जैसी अहम ताकतों से संबंध बनाने की भारत की कोशिश. अपने मित्रों की थोड़ी मदद से भारत अगर चीन के मित्रों और साझीदारों को यह दिखा सका कि दादागीरी करने वालों को इज्ज़त नहीं बख्शी जा सकती, तो कहा जा सकता है कि भारत ने पहला कदम बढ़ा दिया है.

यह तो तय है कि ये मित्र भारत को लद्दाख में चीनी हमलों के मामले में मदद नहीं करने वाले हैं; लेकिन भारत मजबूती से डटे रहकर और यह दिखाकर कि वह कोई ऐरा-गैरा नहीं है, चीन के बारे में दुनिया की धारणा थोड़ी बदल सकता है. वह दुनिया को यह भी दिखा सकता है कि वह चीन के साथ कितनी भी बार वार्ता के लिए अपने तरकश के सारे तीर— चाहे वे कूटनीतिक हों या दूसरे—आजमा सकता है, लेकिन चीन को समझना होगा कि अगर चीनी सेना सीमा पर बलजोरी करेगी तो मामला सामान्य नहीं रह जाएगा.

(लेखिका दिप्रिंट में वरिष्ठ कंसल्टिंग एडिटर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: खामोशी से आखिरी सांसें ले रहा है SAARC, अब इस सच्चाई को मानकर आगे बढ़ना चाहिए


 

share & View comments