पिछले महीने दो अन्य मंत्रियों ने सीएम को पत्र लिखकर बाड़मेर में भीषण गर्मी के बीच अनियमित बिजली कटौती और चूरू और आसपास के जिलों में पानी की कमी की ओर इशारा किया था.
एससी और जाटों ने मिलकर कांग्रेस को राज्य की 10 लोकसभा सीटों में से 5 सीटें बीजेपी से छीनने में मदद की. सीएम सैनी के नेतृत्व वाली सरकार अब दलितों का दिल जीतने के लिए कल्याणकारी योजनाओं को आगे बढ़ा रही है.
पिछले महीने हरियाणा में सैनी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से तीन निर्दलीय विधायकों ने अपना समर्थन वापस ले लिया था, जिससे 87-सदस्यीय विधानसभा में उसकी संख्या घटकर 43 रह गई.
1990 के दशक में किंगमेकर रहे एन चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर वही भूमिका निभा रहे हैं. उनकी टीडीपी न केवल एनडीए में भाजपा की सबसे बड़ी गठबंधन सहयोगी है, बल्कि नरेंद्र मोदी 3.0 का भाग्य भी उसी पर निर्भर है. उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे आंध्र प्रदेश को दिवालिया होने के कगार से उबारेंगे.
2019 में हार के बाद भाजपा अलग-थलग पड़े आदिवासी नेता को वापस लेकर आई और उन्हें राज्य प्रमुख बनाया. लेकिन आदिवासी सीटों पर लोकसभा के नतीजे निराशाजनक रहे, जिसमें पार्टी का खाता तक नहीं खुला.
फरवरी में पदभार संभालने वाले राज्य कांग्रेस प्रमुख के सेल्वापेरुन्थगई, जिला और बूथ-स्तर के कार्यकर्ताओं से जुड़ने और पार्टी को फिर से जीवंत करने के लिए तमिलनाडु का दौरा कर रहे हैं.
नागपुर में आरएसएस के एक कार्यक्रम में भागवत ने चुनावी बयानबाजी से ऊपर उठकर राष्ट्र के सामने आने वाली समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत पर जोर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि एक सच्चे ‘सेवक’ को “अहंकारी” नहीं होना चाहिए.
चुनावी राज्य से भाजपा के पांच में से तीन सांसद मोदी 3.0 में जगह बनाने में सफल रहे. हरियाणा से एकमात्र जाट सांसद भिवानी-महेंद्रगढ़ से भाजपा सांसद धर्मबीर सिंह को मंत्रिपरिषद में जगह नहीं मिली.
दूसरे सदस्य नवनिर्वाचित सुरेश गोपी हैं, जिनकी त्रिशूर से जीत ने राज्य में बीजेपी का खाता खोलने में मदद की, जहां पार्टी लंबे समय से पैठ बनाने की कोशिश कर रही है.
लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों से पता चलता है कि एनडीए ने गैर-जाटव दलित वोटों का बड़ा हिस्सा इंडिया ब्लॉक में खो दिया है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि सपा को दलितों और यादव दोनों के आधार वाले मतदाता गठबंधन को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.
तीन कारकों—राजनीतिक समर्थन, कलेक्टर के कार्यालय का एक 'लिसनिंग पोस्ट' (सूचना केंद्र) के रूप में कार्य करना, और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में हस्तक्षेप न करना—ने यह सुनिश्चित किया कि दंतेवाड़ा अभियान सफल रहा.