नरेंद्र मोदी द्वारा खुद को पिछड़ा घोषित करने, चुनाव लड़ने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में ओबीसी का महत्व बढ़ रहा है. 52 फीसदी ओबीसी आबादी को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस अपने घोषणापत्र में कई धमाकेदार घोषणाएं करने जा रही है.
मोदी समर्थक अब भी आश्वस्त हैं कि वे ही 2024 तक प्रधानमंत्री बने रहेंगे और आलोचकों को मतदाता कड़ा जवाब देंगे. लेकिन ज्योतिषों में आम सहमति नहीं बन पा रही है.
भले ही नीतीश कुमार कहते हों कि प्रशांत किशोर ने पार्टी के लिए काम किया है, वह उनसे व्यक्तिगत रूप से बहुत स्नेह रखते हैं. हमने जिम्मेदारी दी है कि आप नई पीढ़ी के लोगों को राजनीति की तरफ प्रेरित कीजिये.’
केंद्र से मिलने वाले कोश से यह विषमता थोड़ी ही दूर होती है, मिटती नहीं. केंद्र से मध्य प्रदेश को कर्नाटक की तुलना में दो तिहाई ज्यादा कोश मिलता है, और बिहार को तेलुगुभाषी राज्यों की तुलना में 50 फीसदी ज्यादा.
भारतीय राजनीति में देवेगौड़ा का अवतार बनने को तैयार नेताओं की कमी नहीं है क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री का तमगा पूर्व मुख्यमंत्री के तमगे से लाख गुना बेहतर है.
यूबीआई लागू करना कम आबादी वाले और अमीर देशों के लिए तो आसान है मगर भारत जैसे विशाल आबादी वाले विकासशील और सीमित संसाधनों वाले देशों के लिए टेढ़ी खीर है.
अमेरिका के लक्ष्य अधूरे रह गए, अब उसके पास न तो इतनी ताकत है और न इतना जोश है कि वह युद्ध फिर शुरू कर सके; और ईरान? घुटने टेकने की जगह वह पूरे संकल्प के साथ लड़ा. उसकी बागडोर अब ज्यादा कट्टरपंथी लोगों के हाथ में है