Wednesday, 25 May, 2022
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‘मीडिया लीक’ लोकतंत्र के लिए उतनी बुरी बात भी नहीं है!

संवेदनशील मामलों को छोड़ अगर सरकारी फैसलों की जानकारी पहले हो जाए, तो इससे बहस की परंपरा मज़बूत होगी. इसे प्रोत्साहित करना चाहिए.

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लोकतंत्र में स्वस्थ बहस से हमें बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे प्रोत्साहित ही करना चाहिए. संवेदनशील मामलों को छोड़कर अगर सरकारी फैसलों की जानकारी पहले हो जाए, तो उससे बहस की परंपरा मज़बूत होगी.

मीडिया में सूत्रों के हवाले से पिछले दिनों ये खबर छपी कि सुप्रीम कोर्ट की नवगठित ‘कॉलेजियम’ ने 12 दिसम्बर को हुई ‘कॉलेजियम’ की बैठक के निर्णयों को इसलिए बदल दिया, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश को यह बहुत नागवार गुज़री कि बिना प्रक्रिया पूरी हुए ‘कॉलेजियम’ द्वारा प्रस्तावित नामों को मीडिया में ‘लीक’ कर दिया गया.

इसके अलावा इस खबर में दूसरा कारण ये भी बताया है कि पिछले ‘कॉलेजियम’ द्वारा करीब 24 दिन पहले चुने गए दो नामों के संबंध में ‘प्रतिकूल सामग्री’ भी मिली है. हालांकि पूरी खबर में ज़्यादा महत्व मीडिया लीक को ही दिया गया है. ‘प्रतिकूल सामग्री’ क्या है, ये पूछे जाने पर ‘सूत्र’ ने केवल इतना बताया कि इसे सार्वजनिक करना किसी के भी हित में नहीं होगा.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी को, यदि उस जानकारी के अधिकृत ‘कस्टोडियन’ की मर्ज़ी के बिना सार्वजनिक कर दिया जाए तो न केवल ये तकनीकी रूप से किसी के क्षेत्र में अनाधिकार चेष्टा है, बल्कि व्यावहारिक कारणों से भी ये सही नहीं है जैसा कि हम इस मामले में देख रहे हैं.

लेकिन सिर्फ इसलिए कि किसी निर्णय को जो पांच माननीय न्यायाधीशों ने मिलकर लिया हो और जिस पर उन्होंने (इसी खबर के अनुसार) हस्ताक्षर भी कर दिये हों, क्या सिर्फ इसलिए उल्टा जा सकता है कि वह मीडिया में लीक हो गया? ये बात आसानी से गले नहीं उतर रही.

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यह स्तंभकार सरकार द्वारा मीडिया को दी जाने वाली खबरों के प्रचार-प्रसार के कार्य से कई वर्षों तक जुड़ा रहा है और अपने अनुभव के आधार पर कह सकता है कि ये बहुत ही असाधारण बात है कि कोई निर्णय इस आधार पर पूरी तरह बदल दिया जाए कि उसे किसी ने अनधिकृत रूप से मीडिया में लीक कर दिया है.

अखबारों को सरसरी तौर पर पढ़ने वाले भी ये याद कर सकते हैं कि कैबिनेट द्वारा लिए जाने वाले निर्णय भी एक या दो दिन पहले अखबारों में आते रहते हैं. अखबार और चैनल तो बहुत गर्व के साथ छापते हैं कि उन्होंने जो खबर सरकारी फैसले के बारे में बताई थी, वह सच साबित हुई. खबरों में किसी प्रस्तावित निर्णय के आ जाने से कैबिनेट मंत्रियों के नाराज़ होने की बात तो सुनी है, लेकिन निर्णय को इस आधार पर पलटा जाना तो कभी नहीं सुना.

इस बहाने थोड़ी चर्चा इस पर भी कर ली जाय कि आखिर कुछ निर्णयों को या प्रस्तावित निर्णयों को अगर थोड़ा पहले प्रचारित भी कर दिया जाता है, तो उस पर आपत्ति क्यों की जाती है? इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, खास तौर आर्थिक क्षेत्र में, जिनके पहले लीक होने से कुछ लोग अवांछित लाभ कमा सकते हैं और इसलिए वैसे निर्णयों को कोई भी ज़िम्मेवार पदाधिकारी कभी भी समय से पहले नहीं देना चाहेगा.

लेकिन यदि सरकारी निर्णय उस श्रेणी के न हों, जिनका ज़िक्र हमने अभी ऊपर किया है तो उनका अग्रिम प्रचार-प्रसार चाहे वह अनौपचारिक रूप से क्यों न हो, करना चाहिए. लोकतंत्र में स्वस्थ बहस की परंपरा से हमें बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे प्रोत्साहित ही करना चाहिए.

क्या सार्थक बहसों की संभावना तकनीकी गोपनीयता के नाम पर ख़त्म हो रही है? वैसे तो भारत में सभी सरकारों का ये आम चरित्र होता है कि वो सब निर्णय-प्रक्रिया को गुप्त ही रखना चाहती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि जब से राजग सरकार सत्ता में आई है, तब से कैबिनेट के निर्णयों की प्रक्रिया पूरी होने तक वो लीक न हों, ये भरसक प्रयास किया जाता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि ये बात कानून सम्मत और नियमानुकूल तो है, लेकिन व्यवहार्य रूप में ये एक संभावित सार्थक बहस को बहुत निर्ममता से दबा देती है.

हाल ही में आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का निर्णय जिस ढंग से लिया गया, वह तो बिल्कुल किसी गुप्त सैन्य कार्यवाई की तरह आनन-फानन में लिया गया और उस पर किसी भी तरह से सोच-विचार करना आवश्यक नहीं समझा गया. बिना इस तर्क में जाये कि यह निर्णय ठीक था या नहीं, इतना तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि निर्णय लेने की यह प्रक्रिया तकनीकी तौर पर चाहे सही हो, इसने स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्पराओं को ताक पर रख दिया.

जहां सार्वजनिक बहस और पारदर्शिता का पहले ही ये हाल हो, वहां ‘प्लांटेड’ खबर (हम हिन्दी में अनौपचारिक खबर कह लेते हैं) के माध्यम से उच्चतम न्यायालय का यह संदेश जाना कि किसी निर्णय का अनौपचारिक रूप से सार्वजनिक हो जाना बिल्कुल सहन नहीं किया जाएगा और पूरी तरह अस्वीकार्य होगा, चिंता पैदा करता है. जहां पहले न्यायपालिका से ये उम्मीद होती थी कि वो पारदर्शिता लाने में मदद करेगी, वहीं से ऐसे संदेश मिलना पारदर्शिता के लिए काम करने वाले लोगों को हतोत्साहित ही करेगा.

जिस खबर के ज़िक्र से इस आलेख की शुरुआत की गई है, उसमें यह भी कहा गया है कि जिन दो न्यायाधीशों को प्रमोशन देने के निर्णय को निरस्त किया गया है, उनके बारे में कुछ ‘प्रतिकूल सामग्री’ भी मिली है. खबर में यह नहीं बताया गया कि आखिर वो प्रतिकूल सामग्री क्या हैं. दरअसल, इस खबर की ये बड़ी कमज़ोरी है. क्या किन्हीं दो माननीय न्यायाधीशों के बारे में सार्वजनिक स्पेस में ‘प्रतिकूल सामग्री’ की बात उड़ा देना किसी भी तरह से न्यायसंगत कहा जा सकता है?

तो तय करना होगा कि कौन सा मीडिया-लीक सही है और कौन सा नहीं! इस पर बात चलती रहनी चाहिए.

(लेखक मीडिया विषयों के जानकार हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं.)

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