जब भारत 2022 में आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है तो यहां एक सवाल सबसे जरूरी हो जाता है कि हमारे लिए आजादी के मायने क्या हैं, क्या इसका मतलब हम लोगों के बीच ठीक तरह से ले जा पाए?
यह याद दिलाती है कि इमरजेंसी में सरकार प्रायोजित जबरन परिवार नियोजन से प्रजनन दर में नहीं के बराबर फर्क. 2022 में तो जबरन कार्यक्रम चलाने की कोई कोशिश मोटे तौर पर बेवजह, क्योंकि दर लगातार घट रही.
भाजपा जिस तरह से क्षेत्रीय दलों को अमर्यादित और अनैतिक तरीक़ों से नेस्तनाबूद करने में लगी थी, ऐसे में राजद यह अपनी ज़िम्मेदारी समझता है कि अपनी पूरी ताक़त से बीजेपी का मुक़ाबला करे और क्षेत्रीय पार्टियों को बचाए.
बुद्धिमानी तो इसी में है कि पैर उतना ही पसारिए जितनी चादर लंबी है लेकिन भारत में लोग रियायतों के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें वे उपाय जमते नहीं जिनसे भविष्य में बेहतर नतीजा हासिल होता हो.
बिहार का कर राजस्व सबसे कम है, पंजाब ने ज्यादा खर्चों के वादे कर रखे हैं,, तो राजस्थान वित्तीय घाटा कम करने का लक्ष्य पूरा करने से चूक गया है. इन सभी राज्यों को वोट बैंक और वित्तीय विवेक के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है.
मक्के में आखिरी हज पर और गदीर में दिए गए भाषण में कही गई बात बिल्कुल एक दूसरे के विपरीत है. एक में पैगंबर मुहम्मद अपने द्वारा किए गए कार्यों का पालन करने का निर्देश देते हैं और दूसरे में अपनी औलाद और रिश्तेदारों का अनुसरण करने को कहते हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव में वामपंथी दल और कांग्रेस खुरचन में हिस्सेदारी के लिए होड़ लगा रहे हैं. पूर्वी-मध्य भारत में माओवाद को कब्र में दफन कर दिया गया है, तो केरल में वे सरकार विरोधी दोहरी भावना से जूझ रहे हैं.