जब एक इराकी जेट से दागी गई मिसाइल ने एपीजे अंबिका के ढांचे को चीर दिया, उसके बहुत समय बाद खोर-ए मूसा चैनल के हरे-नीले पानी से उसका फनल ऊपर उठता दिखाई दे रहा था. फारस की खाड़ी के बंदरगाहों के किनारों पर बने अनजान कप्तानों की सफेद गुंबददार कब्रों की तरह, यह फनल ईरान-इराक युद्ध में मारे गए सैकड़ों नागरिक नाविकों की याद में एक स्मारक जैसा था. जैसे-जैसे यह मलबा कीचड़ में और गहराई में धंसता गया, वैसे-वैसे यादें भी धुंधली होती गईं. अंबिका के नुकसान का जिक्र संसद में हुआ, लेकिन ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग की जग परी पर हवाई हमला, स्पिक एमरल्ड पर हमला और जगदीश भगवान की हत्या—जिन्हें एक अमेरिकी मिसाइल फ्रिगेट के घबराए हुए क्रू ने गोली मार दी थी—ज्यादा ध्यान में नहीं आए.
भूल जाना वास्तविकता को मिटा नहीं देता. अंबिका के 1984 में डूबने के 20 साल बाद, खोर-ए मूसा से गुजर रही एक व्यापारी जहाज उसकी मलबे से टकराकर डूब गई. संभव है कि लंबे समय से भूला हुआ मलबा बह गया हो और समुद्री नक्शे उसकी सही स्थिति नहीं दिखा रहे थे.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दिमाग से उठने वाले अजीब जीवों ने फारस की खाड़ी और दुनिया को फिर उस युद्ध की भयावहता में धकेल दिया है, जो 20वीं सदी का सबसे लंबा युद्ध था, जिसमें जहरीली गैस और मिसाइलों से अनुमानित 10 लाख लोगों की मौत हुई. यह कुछ हद तक राहत की बात है कि संवाद टूटने के बावजूद युद्धविराम कायम है, लेकिन हकीकत यह भी है कि हर युद्धविराम के बाद फिर युद्ध हुआ है.
साथी, दोस्त नहीं
1981 से ईरान और इराक ने फारस की खाड़ी में जहाजों के खिलाफ एक कड़वा युद्ध लड़ा, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की. इसे टैंकर वार कहा गया, जिसमें व्यापारिक जहाजों, तेल ढांचे और कच्चे तेल ले जाने वाले बड़े जहाजों पर हमले हुए. इराक जल्द ही अंतरराष्ट्रीय झंडे वाले जहाजों पर भी हमला करने लगा. अमेरिका ने तानाशाह सद्दाम हुसैन द्वारा ईरान के खिलाफ रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के सबूतों को दबा दिया और उसकी सरकार को हथियार और खुफिया जानकारी दी. अमेरिका खुद इस जहाज युद्ध में फंस गया और तब और नरसंहार हुआ जब उसने एक ईरान एयर के विमान को मार गिराया, जिसमें 290 यात्री और क्रू मारे गए.
इस कहानी का अजीब हिस्सा यह है कि 1959 तक—और उसके बाद भी—ये दोनों दुश्मन सहयोगी थे और जुड़े हुए थे. ईरान और इराक दोनों सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक सदस्य थे, जो नाटो का पूर्वी संस्करण था. ब्रिगेडियर अब्दुल-करीम कासिम के नेतृत्व में हुए तख्तापलट के बाद इराक ने संगठन छोड़ दिया. हालांकि बाद में ब्रिगेडियर ने अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर की चिंता कम करने के लिए कम्युनिस्टों पर कार्रवाई की.
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के छह महीने से भी कम समय बाद एक नया वैश्विक संघर्ष शुरू हो गया था. शीत युद्ध का पहला संकट बर्लिन या पूर्वी यूरोप में नहीं, बल्कि उत्तरी ईरान के पहाड़ों में हुआ. अगस्त 1941 में—नाजी सेना के मॉस्को पर हमले के आठ हफ्ते बाद—ब्रिटेन और सोवियत संघ ने मिलकर ईरान पर हमला किया और रजा शाह पहलवी को सिंहासन से हटा दिया, जिसे लंदन ने ही स्थापित किया था. ईरान युद्ध से जूझ रहे सोवियत संघ के लिए आपूर्ति पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण रास्ता बन गया.
सोवियत संघ ने ईरान में रणनीतिक बराबरी की मांग की और ब्रिटेन जैसी तेल रियायतें और बराबर प्रभाव क्षेत्र चाहा. उन्होंने फरवरी 1946 तक हटने के समझौते का पालन न करके दबाव बनाया. कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि सोवियत कदम ईरान की राजनीतिक दिशा बदल देगा. देश के उत्तर में कुर्द और तुर्की भाषी अल्पसंख्यकों ने स्वायत्त गणराज्य बना लिए. ईरान की कम्युनिस्ट पार्टी तोदेह काफी बढ़ गई.
संभवतः सोवियत संघ ने अपने सीमित संसाधनों को पूर्वी यूरोप में अपने मुख्य हितों के लिए बचाने के लिए पीछे हटने का फैसला किया. इतिहासकार ज्योफ्री रॉबर्ट्स के अनुसार, सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन ने ग्रीस में कम्युनिस्ट विद्रोह को रोकने के लिए बहुत कम किया, ईरान से तय समय के दो महीने बाद सेना हटाई और तुर्की से टकराव से भी पीछे हट गए.
सोवियत संघ ने अंततः ईरान से तेल समझौता हासिल किया, लेकिन ईरानी संसद ने उसे मंजूरी नहीं दी और वह रद्द हो गया. हालांकि सोवियत संघ का बाहर निकलना समस्या का अंत नहीं था.
युद्ध की लहरें
1968 से, जब ब्रिटेन ने फारस की खाड़ी पर अपना औपनिवेशिक नियंत्रण छोड़ना शुरू किया, तब इस क्षेत्र के देशों के बीच एक नया संघर्ष उभर रहा था, जो सभी शीत युद्ध में अमेरिकी सहयोगी थे. 1961 में, इराक में कासिम के शासन ने कुवैत पर क्षेत्रीय दावा किया था, यह कहते हुए कि यह अमीरात ओटोमन साम्राज्य के बसरा प्रांत का हिस्सा था. इराक को लगभग 5000 ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती से रोका गया. वहीं ईरान ने 1971 में कई द्वीपों पर कब्जा कर लिया.
1974 में ईरान-इराक संघर्ष और बढ़ गया. तेहरान ने कुर्द अलगाववादियों की मदद की, जबकि बगदाद ने अपनी सेना को सीमा पार हमले करने का आदेश दिया. संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों पर समझौता करने का दबाव डाला, लेकिन वास्तव में कोई समझौता नहीं हुआ.
1979 की ईरान क्रांति के बाद सद्दाम ने इसका फायदा उठाने का अवसर देखा. उनका मानना था कि मौलवी रुहोल्लाह खुमैनी की धार्मिक सरकार कमजोर हो गई है, क्योंकि सेना के वे अधिकारी हटाए गए थे जो निर्वासित शासक के प्रति वफादार थे. ईरान की अर्थव्यवस्था भी अस्त-व्यस्त थी. इराकी तानाशाह ने 1971 में ईरान द्वारा कब्जा किए गए द्वीपों की वापसी की मांग की और खुज़ेस्तान प्रांत में अरब जातीय अल्पसंख्यक के लिए अर्ध-स्वतंत्रता की मांग की. इराक ने शट्ट अल-अरब जलमार्ग पर संप्रभु अधिकार भी मांगा, जो टिगरिस और यूफ्रेट्स नदियों के संगम से बना 200 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है.
हालांकि, इराकी शासन ने यह नहीं सोचा था कि वह अपने लक्ष्य कैसे हासिल करेगा. युद्ध के बाद दिए गए इंटरव्यू में सद्दाम के कमांडरों ने कहा कि उनके पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी, बस यह दावा था कि अरबों पर 1500 साल के फारसी प्रभुत्व को पलटना है. इराकी जनरलों को लंबे युद्ध की तैयारी के निर्देश नहीं दिए गए थे और न ही स्पष्ट युद्ध लक्ष्य बताए गए थे.
शुरुआत में इराक की सेना की सफलताओं को जल्द ही रोक दिया गया. 1982 तक ईरान ने जवाबी हमलों में खोया हुआ क्षेत्र वापस ले लिया. लाखों सैनिक—जिनमें कई बच्चे भी थे—को कम रणनीतिक महत्व वाले अभियानों में खो दिया गया. इराक को भारी नुकसान हुआ, लेकिन उसे पता था कि समय उसके पक्ष में है: ईरान के नए शासन के पास लड़ने के लिए उत्साही समर्थक थे, लेकिन हथियारों और धन की कमी थी.
आग बेकाबू हो गई
1984 से CIA की कई रिपोर्टों ने टैंकर युद्ध के अंतरराष्ट्रीय प्रभावों की ओर इशारा किया. इराक ने खार्क द्वीप पर हमले बढ़ा दिए, जो ईरान के तेल निर्यात का केंद्र था. इराक का अधिकांश तेल पाइपलाइनों से भेजा जाता था, इसलिए ईरान ने सऊदी तेल सुविधा रास तानूरा जाने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया. हालांकि उसके हवाई संसाधन सीमित थे, फिर भी उसने तेज नावों और छोटे नौसैनिक बेड़े का इस्तेमाल किया. ईरानी युद्धपोत सबलान जहाजों को रोककर उन पर गोलीबारी करने के लिए कुख्यात हो गया. “आपका दिन शुभ हो,” बाद में वाइस एडमिरल अब्दुल्ला मनावी अपने हमलों के बाद वायरलेस पर पीड़ितों से कहते थे.
तेल की उपलब्धता अमेरिका के लिए चिंता का विषय नहीं थी, क्योंकि उसके पास घरेलू और कैरेबियाई स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति थी. लेकिन उसके फारस की खाड़ी के सहयोगियों के लिए उसकी रणनीतिक गारंटी का मुख्य उद्देश्य स्थिर कीमतें बनाए रखना था—जो लंबा जहाज युद्ध खतरे में डाल सकता था.
कुवैत की लगातार अपीलों के बाद—और इस सुझाव के बाद कि यदि मदद नहीं मिली तो वह सोवियत संघ की ओर झुक सकता है—राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कुवैती टैंकरों को अमेरिकी झंडे के साथ सुरक्षा देने का फैसला किया. लेकिन पहला अभियान अच्छा नहीं रहा. सुपरटैंकर ब्रिजर्टन ईरानी बारूदी सुरंग से टकरा गया और क्षतिग्रस्त हालत में बंदरगाह तक पहुंचा, जबकि सुरक्षा जहाज उसे ढाल बनाकर साथ थे.
स्थिति और खराब होती गई. अमेरिकी फ्रिगेट यूएसएस स्टार्क को इराकी जेट से दागी गई दो मिसाइलों ने मारा, जिसमें 37 नाविक मारे गए. इसे पायलट की गलती बताया गया, लेकिन अमेरिका में सवाल उठे कि उनके सैनिकों को खतरे में क्यों डाला जा रहा है. अगले साल फ्रिगेट सैमुअल बी रॉबर्ट्स ईरानी बारूदी सुरंग से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया. हालांकि अमेरिकी नौसेना ने कड़ा जवाब दिया, लेकिन दो महीने बाद ईरान एयर 655 को मार गिराने की घटना ने फारस की खाड़ी में अमेरिका की भूमिका की चमक कम कर दी.

ईरान की सरकार ने आखिरकार 1989 में युद्धविराम स्वीकार कर लिया. इसका मुख्य कारण अमेरिकी सैन्य उपस्थिति नहीं थी: कम तेल कीमतों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया था और क्रांति से पहले खरीदे गए हथियार भी कम हो गए थे. इराक अपने दुश्मन से ज्यादा खर्च कर पा रहा था, भले ही वह ज्यादा लड़ नहीं पा रहा था.
लेकिन यह जीत अंत में भारी साबित हुई. ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के दो साल बाद सद्दाम ने कुवैत पर हमला कर दिया—जिसे वह अरब अमीरात की रक्षा और अपने भारी कर्ज के बदले उचित समझता था. हालांकि अमेरिका ने बाद के युद्ध में इराक को हरा दिया, लेकिन ईरान ने शिया बहुल देश में गहरा प्रभाव हासिल कर लिया—जो वह अपने युद्ध से भी नहीं पा सका था. 2011 तक ईरान ने ऐसे उन्नत तरीके विकसित कर लिए थे जिनसे वह फारस की खाड़ी को बंद कर सकता था, या कम से कम किसी दुश्मन की जीत को जहरीला बना सकता था.
कई शासकों की तरह ट्रंप भी आसान जीत के वादे से बहुत जल्दी आकर्षित हो गए—और अब उन्हें यह खतरा झेलना पड़ रहा है कि जिस फल की उन्होंने चाहत की थी, उसकी कीमत बहुत ज्यादा हो सकती है.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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