भविष्य के लिए, राजनीतिक दलों को इस केंद्रीय प्रश्न को संबोधित करने की आवश्यकता है कि किसानों के साथ एकजुटता का दावा करते वक्त वे किसका प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं, और वे इन किसानों के लिए क्या कुछ करने को तैयार हैं?
मोदी चाहें तो आर्थिक सुधारों से अपने कदम उसी तरह वापस खींच सकते है जिस तरह मनमोहन सिंह ने अन्ना आंदोलन के दबाव में खींचे थे, या फिर कृषि सुधारों को मारग्रेट थैचर जैसे साहस के साथ आगे बढ़ा सकते हैं; उनके फैसले पर ही देश की राजनीति की आगे की दिशा तय होगी.
किसानों का आंदोलन पंजाब भर तक सीमित नहीं, इसे सिर्फ एमएसपी से जोड़कर देखना या बिचौलियों का आंदोलन कहकर खारिज करना ठीक नहीं. किसानों की तकलीफ ज्यादा बड़ी और गहरी है
दिल्ली के एक अस्पताल में कोविड पॉजिटिव एक सहयोगी के साथ बैठकर लंच करने वाले तीन डॉक्टरों को संक्रमण नहीं हुआ. ऐसा क्यों हुआ, इसके जवाब में ही ये जानकारी छुपी है कि किनको टीके लगाए जाने चाहिए.
मोदी सरकार के विमर्शवादी लोकतंत्र के तौर-तरीके भूलने का परिणाम ये हुआ है कि कृषि कानूनों पर नीतिगत दलीलों को अर्थशास्त्र की बजाय भावनाओं के आधार पर पेश किया जा रहा है.
अहमद पटेल और तरुण गोगोई की मृत्यु ने कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए ऐसे काबिल नेताओं को तलाशने की दुष्कर चुनौती पेश कर दी है, इसे सुलझाने के लिए पार्टी में बहुत ही कम उम्मीदवार हैं.
यह घटना एक असहज लेकिन संवैधानिक रूप से सामान्य बात को सामने लाती है: जम्मू-कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यक हैं. उनकी सुरक्षा क्षेत्रीय है, न कि "सभ्यतागत."