आखिर ऐसा क्यों है कि जिस क्षेत्र में कभी संपूर्ण विश्व के विद्वान अध्ययन के लिए दुर्गम मार्गों से सुदूर यात्राएं कर पहुंचने के लिए लालायित रहते थे, वहीं के विद्यार्थी आज परिश्रम एवं पुरुषार्थ के मार्गों से कई अवसरों पर नदारद प्रतीत होते दिखते हैं.
चीन ताकत का इस्तेमाल करने का फैसला कर ही लेता है तो ताइवान के लिए इसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं. इससे एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करने की कोशिश को भी बड़ा झटका लगेगा.
फिलहाल लंच पर होने वाली ऐसी बैठकों की उपयोगिता कतिपय लोगों का अहं संतुष्ट करने, कुछ इवेंट मैनेजरों की झोली भरने और मीडिया के लिए मसाला पैदा करने तक ही सीमित है.
वैश्वीकरण के पारंपरिक तत्व अपना आकर्षण खो रहे हैं, देशों की सीमाओं में सीमित न रहने वाले जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद जैसे मसले देशों को करीब आने के लिए मजबूर कर रहे है.
तालिबान, कश्मीरी नेताओं से वार्ता और पाकिस्तान के प्रति गर्मजोशी मोदी सरकार की रणनीतिक अनिवार्यताएं हैं; एक ओर वह पूरब के मोर्चे पर अमेरिका को ‘क्वाड’ के सहयोगी के रूप में चाहे और दूसरी ओर पश्चिमी मोर्चे पर उनके मकसद के खिलाफ काम करे यह नहीं चल सकता.
डॉलर को बदलने के लिए सिर्फ दूसरी करेंसी नहीं, बल्कि उतना ही मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम, भरोसेमंद संस्थान और बैंक-निवेशक-पेमेंट का पूरा नेटवर्क भी जरूरी है.