Saturday, 28 May, 2022
होममत-विमतताइवान पर चीन का आक्रमण एशिया के लिए आपदा साबित होगा, भारत को एक रेड लाइन खींचनी होगी

ताइवान पर चीन का आक्रमण एशिया के लिए आपदा साबित होगा, भारत को एक रेड लाइन खींचनी होगी

चीन ताकत का इस्तेमाल करने का फैसला कर ही लेता है तो ताइवान के लिए इसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं. इससे एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करने की कोशिश को भी बड़ा झटका लगेगा.

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ताइवान पर चीन के हमले की संभावना को लेकर चर्चा ज़ोर पकड़ रही है. इस द्वीप देश के खिलाफ चीनी धमकियां और लफ्फाजियों के साथ सैन्य उकसावा निरंतर बढ़ता जा रहा है. चीनी लड़ाकू विमानों ने ताइवान नियंत्रित हवाई क्षेत्र में घुसपैठ का अप्रैल में बनाया गया अपना रिकॉर्ड पिछले दिनों तोड़ दिया.

क्या यह सब ताइवान पर चीनी हमले का पूर्वसंकेत है? वैसे, संकेत तो अस्पष्ट हैं और कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि यह सब घरेलू राजनीतिक जमात की खातिर किया जा रहा नाटक है, क्योंकि वास्तव में हमला करना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए राजनीतिक आत्मघात होगा. कुछ लोगों का कहना है कि हमला तुरंत नहीं होगा. लेकिन यह संभावना बढ़ गई है कि चीन ताइवान पर जबरन कब्जा कर सकता है. आला अमेरिकी सैन्य कमांडरों की राय बंटी हुई है, कुछ का मानना है कि चीन अगले छह वर्षों में ताकत का इस्तेमाल कर सकता है, तो दूसरों ने कहा है कि चीन इस लायक क्षमता बनाना चाहता है और वह वास्तव में हमला करने की नहीं सोच रहा होगा.

अगर चीन ताकत का इस्तेमाल करने का फैसला कर ही लेता है तो ताइवान के लिए इसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं. इसका अर्थ यह होगा कि एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करने की कोशिश को बड़ा झटका लगेगा.

चीनी हमले पर विश्व की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसको लेकर भी महत्वपूर्ण मतभेद हैं. कुछ अमेरिकी विश्लेषक ‘बड़े सौदे’ की बात कर रहे हैं और अमेरिका को पूर्वी एशिया में अपने दांव कम करने ताइवान से किनारा करने की बात भी कह रहे हैं ताकि चीन से सैन्य टकराव को टाला जा सके. दूसरे विद्वान बीच का रास्ता लेने की बात कर रहे हैं- यानी अमेरिका ताइवान की सुरक्षा करने का वादा न करे बल्कि ताइवान को खुद अपनी सुरक्षा करने में मदद करे.

समस्या यह है कि ताइवान स्ट्रेट के पार सैन्य शक्ति में असंतुलन इस संभावना को जन्म देता है कि चीन ऐसा हमला कर बैठे. इस बात में भी काफी संदेह है कि ताइवान खुद अपनी सुरक्षा करने के बारे में गंभीर है या नहीं या वह यही उम्मीद लगाए बैठा है कि अमेरिका उसकी सुरक्षा के लिए आगे आएगा. फिर भी, ताइवान पर जल-थल के जरिए हमला काफी कठिन होगा, भले ही दोनों पक्षों की ताकत में अंतर हो. इसके अलावा, चीन को हमला करने से पहले लंबी तैयारी करनी पड़ेगी और सेना का बड़ा जमावड़ा करना पड़ेगा, जिसे छिपाना मुश्किल होगा.

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चीनी कार्रवाई का क्या नतीजा होगा

हालांकि निश्चित रूप से कुछ कहना मुश्किल है लेकिन चीनी हमले के दो नतीजे निकल सकते हैं और ये दोनों ही सुखद नहीं होंगे.

एक संभावना यह है कि चीनी ताकत और संकल्प का प्रदर्शन एशिया में चीनी दबदबे को खत्म करने की उम्मीदें टूट जाएंगी. अमेरिका इस क्षेत्र में अपने साथियों की बुज़दिली से निराश होकर अपने कदम वापस खींच लेगा या अमेरिका के साथी यह फैसला कर सकते हैं कि वह चीन को टक्कर देने में अक्षम है और चीन के साथ संतुलन बनाने का विकल्प खत्म हो जाएगा तो अमेरिका के ये साथी यह फैसला कर सकते हैं कि चीन से सुलह करन ही बेहतर है. दोनों ही स्थितियों में चीन इस क्षेत्र में वैसा ही दबदबा बना लेगा जैसा अमेरिका ने धरती के पश्चिमी गोलार्द्ध में बना रखा है. भारत और जापान की वैसी ही हालत हो जाएगी जैसी अर्जेन्टीना और ब्राज़ील की है, जो बड़े देश हैं मगर कुछ दबे-घुटे-से रहते हैं, और बाहरी ताकतों को चीनी ‘मुनरो सिद्धांत’ के तहत परे रखा जाएगा.


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दूसरा नतीजा यह हो सकता है कि ताइवान पर चीन का सफल हमला आधुनिक ‘छठे गठबंधन’ के गठन की आखिरी हिचक भी समाप्त हो जाएगी और एशियाई तथा अन्य शक्तियां यह फैसला कर सकती हैं कि वे न तो चीन पर भरोसा कर सकती हैं और न उसकी लूटमार को बर्दाश्त करेंगे. यह सैन्य गठबंधन की संभावना को मजबूत कर सकता है, जिसके कारण तनाव बढ़ सकता है और बड़ी लड़ाई तथा उसके साथ आने वाली तबाही और जोखिमों का कारण बन सकता है. ये सारे नतीजे इस क्षेत्र के लिए उतने ही बुरे होंगे जितने चीनी दबदबे में रहने के नतीजे बुरे हो सकते हैं.

विफल चीनी हमला भी बेहतर नहीं होगा क्योंकि तब इस क्षेत्र को एक ऐसी महाशक्ति को बर्दाश्त करना होगा जो और ज्यादा असंतुष्ट, रक्षात्मक, और हताश होगी.

वैसे, यह भी मुमकिन है कि ताइवान पर सफल चीनी हमले के बाद भी इस क्षेत्र की दशा यथावत बनी रहे. अमेरिका की मदद से चीन के साथ संतुलन साधने की कोशिश की जाए और चीन के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंध बानाए रखे जाएं. ये सब भी संभावनाओं में शुमार हो सकते हैं. चीन भी निश्चित तौर पर यही उम्मीद रखेगा, खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि झिंजियांग और हांगकांग में वह अपनी नीतियों के विरोध पर आसानी से काबू पाने में सफल रहा. लेकिन यह कल्पना कर पाना मुश्किल है कि यह क्षेत्र इन सबसे अप्रभावित रह पाएगा या यह ऐसे नाटकीय बदलावों और उनके परिणामों को आसानी से पचा लेगा. और यह कल्पना कर पाना तो और भी मुश्किल है कि चीन अपनी सफलता को और मजबूत करने तथा अपनी ताकत के ऐसे प्रदर्शन से अपना वर्चस्व और जमाने की कोशिश नहीं करेगा.

क्या उम्मीद करें और करना जरूरी है

अगर नतीजे इतने भयावह हैं, तो क्या चीनी नेताओं को खतरों का अंदाजा नहीं होगा और वे अपने कदम नहीं रोकेंगे? यह उम्मीद तो की ही जा सकती है लेकिन हाल के वर्षों में चीन ने ऐसी कार्रवाइयां की हैं कि उन्हें रणनीतिक दृष्टि से हैरतअंगेज़ ही कहा जा सकता है. इसलिए उस पर पूरी तरह भरोसा करना संदेहास्पद है. इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है. क्या चीन भारत के प्रति इस कदर आक्रामक रुख बनाए रखने आमादा है कि भारत अमेरिका की बांहों में चला जाए, बावजूद इसके कि भारत दशकों से पश्चिम विरोधी राजनीति करता रहा है? एक संभावना यह है कि शी जिनपिंग को अवसर की बहुत छोटी-सी खिड़की दिख रही है, जो ‘हड़बड़ी’ और जोखिम भरे व्यवहार के लिए उकसाती है.

इन विनाशकारी परिणामों से बचना है तो भारत और दूसरे देशों को ताइवान पर जबरन कब्जा करने की चीनी कोशिशों को लाल झंडी दिखानी होगी. आखिर ताइवान केवल एक नैतिक मसला नहीं है कि एक निरंकुश देश को एक सफल लोकतांत्रिक को तबाह करने से रोका जाए, या यह केवल अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का प्रश्न भी नहीं है कि विवादों का शांतिपूर्ण तारीके से निबटारा किया जाए. वास्तव में, लाल रेखा खींचने की जरूरत केवल ताइवान के मामले में नहीं है, बल्कि उसके ऊपर चीनी हमले के कारण भारत तथा शेष एशिया को जो नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं उसके कारण भी है. ताइवान पर चीनी हमले के अगले दिन एशिया बदल जाएगा, चाहे इस हमले के जो भी नतीजे निकलें.

लेकिन लाल रेखा खींचना आसान नहीं है और वह अंततः कारगर भी नहीं साबित हो सकता है, लेकिन भारत और दूसरे देश इसकी कोशिश कर सकते हैं क्योंकि दांव बहुत ऊंचे लगे हैं. इसका एक पहलू यह है कि भारत और ताइवान के रिश्ते सुधरें, भले ही ताइवान की आज़ादी को मान्यता न दी जाए. कई लोगों ने कहा है कि चीन के साथ भारत के रिश्ते में खटास के मद्देनजर ताइवान के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाते रहना चाहिए और वहां अपने लिए जन समर्थन भी बढ़ाया जाए. वास्तव में भारत ने ‘एक चीन’ की नीति की आधिकारिक चर्चा बंद कर दी है, और जवाबी पहल की अपेक्षा कर रहा है. ये सारे अच्छे तर्क तो हैं लेकिन ताइवान जलडमरूमध्य के पार युद्ध को रोकना महत्वपूर्ण है. केवल भारत की आवाज़ पर शी जिनपिंग का मन बेशक नहीं बदलने वाला है, लेकिन इससे उनका गणित कुछ उलझ सकता है. इसी की उम्मीद की जा सकती है.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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