Saturday, 20 August, 2022
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6 राज्यों में 5वीं से 12वीं कक्षा तक 3 में से सिर्फ 1 छात्र उठा पाया ऑनलाइन क्लास का लाभ, सर्वे से पता चला  

बिहार और उत्तर प्रदेश बुरी तरह प्रभावित रहे, जबकि हरियाणा के आधे से अधिक बच्चे, सुचारू रूप से ऑनलाइन स्कूलिंग पर शिफ्ट हो गए.

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कोविड-19 ने हमारी सामाजिक व्यवस्था को ही उलट कर रख दिया है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में जीवन का चक्का, कभी इस तरह थमने को मजबूर नहीं हुआ, जैसा हमने पिछले 15 महीनों में अनुभव कर लिया है. आजीविका, नौकरियों, और आमदनियों पर पड़े लॉकडाउन के विनाशकारी प्रभाव पर ख़ूब लिखा गया और उस पर चर्चा भी हुई. लेकिन उच्च वर्ग का जीवन काफी हद तक इसके प्रभाव से अछूता रहा, बस उन्होंने मामूली सा तकनीकी समाधान कर लिया- ज़ूम कॉल्स, ई-कॉमर्स, और मनोरंजन स्ट्रीमिंग.

एक क्षेत्र जिसमें लॉकडाउन के असर की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी शायद होनी चाहिए थी वो है शिक्षा. समृद्ध परिवारों के बच्चे लगभग आराम से ऑनलाइन स्कूलिंग पर चले गए, इसलिए उनकी पढ़ाई का ज़्यादा नुक़सान नहीं हुआ. हालांकि पूरे साल अपने कमरे में कंप्यूटर के सामने बैठे रहने से, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर जरूर असर पड़ा है.

लेकिन लॉकडाउन ने वंचित वर्ग के बच्चों को बिल्कुल अलग तरह से प्रभावित किया है. प्रश्नम ने पता लगाने का फैसला किया कि ये नुक़सान किस हद तक था. छह हिंदी-भाषी राज्यों बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश में, हमने उत्तरदाताओं से ये सवाल पूछे:

ग्राफिक्स: रमनदीप कौर/दिप्रिंट
ग्राफिक्स: रमनदीप कौर/दिप्रिंट

फिर हमने 5वीं से 12वीं क्लास तक में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता से पूछा कि लॉकडाउन का उनके बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ा: क्या वो सुचारु रूप से ऑनलाइन स्कूल पर जा पाए.

ग्राफिक्स: रमनदीप कौर/दिप्रिंट
ग्राफिक्स: रमनदीप कौर/दिप्रिंट

सर्वे किए गए 52 प्रतिशत पेरेंट्स का कहना था, कि लॉकडाउन के कारण उनके बच्चों की कक्षाएं छूटी थीं. एक तिहाई से कम ऑनलाइन स्कूल में शामिल हुए और उन पर उतना असर नहीं पड़ा. डिजिटल विभाजन उनके जवाबों से ज़ाहिर हो जाता है.

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प्रत्याशित रूप से, इन छह सूबों के जवाबों में व्यापक अंतर देखने को मिलता है. बिहार और उत्तर प्रदेश बुरी तरह प्रभावित रहे, जबकि हरियाणा के आधे से अधिक बच्चों का दावा था कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा, और वो सुचारू रूप से ऑनलाइन स्कूलिंग पर शिफ्ट हो गए.

इन छह सूबों में कुल मिलाकर लगभग 11.5 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चे हैं. जिसका मतलब है कि कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से इन छह राज्यों में लगभग 6 करोड़ बच्चों का एक साल की पढ़ाई का नुकसान हुआ और उनकी कक्षाएं छूटी होंगी.

नरेंद्र मोदी सरकार पर भारी दबाव के बाद लॉकडाउन की वजह से 12वीं और 10वीं क्लास के इम्तिहान रद्द कर दिए गए. लेकिन करोड़ों बच्चों की कक्षाएं छूटने पर इतनी तवज्जो और चर्चा नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी.

उत्तरदाताओं का प्रोफाइल: 1,208 वयस्क भारतीयों ने इस सर्वे का जवाब दिया. उनका संबंध छह राज्यों – बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के 218 ज़िलों से था. उनमें 66 प्रतिशत पुरुष थे और 34 प्रतिशत महिलाएं. 49 प्रतिशत युवा थे (40 वर्ष से कम), 35 अधेड़ आयु के थे, और 16 प्रतिशत वरिष्ठ (60 से अधिक) थे.

पारदर्शिता और ईमानदारी के सिद्धांतों के अनुरूप, प्रश्नम इस सर्वेक्षण का तमाम कच्चा डेटा विश्लेषकों और शोधकर्त्ताओं को उपलब्ध कराता है, ताकि वो आगे का सत्यापन और विश्लेषण कर सकें.

बौद्धिक ईमानदारी के अपने सिद्धांतों के अनुरूप प्रश्नम ने सत्यापन और अतिरिक्त विश्लेषण के लिए इस सर्वेक्षण की प्रक्रिया, राज्य आधारित परिणाम और संपूर्ण अपरिष्कृत डेटा का पूरा ब्योरा यहां पर उपलब्ध कराया है.

(राजेश जैन एआई टेक्नोलॉजी स्टार्टअप प्रश्नम के संस्थापक हैं, जिसका उद्देश्य रायशुमारी को अधिक वैज्ञानिक, आसान, तेज और किफायती बनाना है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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