Thursday, 20 January, 2022
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PMO अगर रक्षा बैकग्राउंड वाले नेता की तलाश कर ले तो थिएटर कमांड की योजना कामयाब हो सकती है

फिलहाल तो यही लग रहा है कि थिएटर कमांड की कब्र खोदने वाले बाजी मार ले गए हैं और राजनीतिक नेतृत्व इससे जुड़े मसलों को समझ पाने में चूक गया है.

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दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की पहल से भारत ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) पद और सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) का गठन करके रक्षा मंत्रालय में बड़े ढांचागत सुधारों की घोषणा की थी. सीडीएस को तीन जिम्मेदारियां निभानी हैं. वे चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी के अध्यक्ष (पीसीओएससी), डीएमए के मुखिया, और रक्षा मंत्री के सैन्य सलाहकार की भी जिम्मेदारियां निभाएंगे. सीडीएस को थिएटर/संयुक्त कमांडों का गठन करने का राजनीतिक जनादेश भी हासिल है. (थिएटर कमांड व्यवस्था का अर्थ यह है कि एक इलाके में थलसेना, वायुसेना,और नौसेना, तीनों की यूनिटों को एक थिएटर कमांडर के अधीन लाया जाएगा).

सीडीएस ने कई कमिटियों का गठन करके अपने काम की शुरुआत की. मैरीटाइम (नौसेना) थिएटर कमांड और एअर डिफेंस कमांड के गठन के प्रस्ताव पहले तैयार किए गए. यह रहस्यमय है क्योंकि मैरीटाइम थिएटर दूसरे भौगोलिक थिएटरों में ही एक है जबकि एअर डिफेंस कमांड सभी थिएटरों को सहायता देने वाला कमांड है और वह सभी थिएटरों के अधीन काम करता है. एअर डिफेंस कमांड का ढांचा अलग है इसलिए उसकी जरूरत पर सवाल उठाया जाता है. अलग-अलग टुकड़ों में उपयोग करने को तरजीह दी गई है.

आज 18 महीने बाद उक्त दोनों प्रस्ताव उस कमिटी के पास पड़े हैं जिसमें एकीकृत डिफेंस स्टाफ के प्रमुख, तीनों सेनाओं के उपाध्यक्ष, और गृह, कानून तथा वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं. बहुत मुमकिन है कि जिनके दांव जुड़े हैं वे संगठन पर कब्जे का विरोध करने के लिए संकीर्ण नजरिये से प्रभावित तर्क देते रहेंगे. आइंस्टीन की मशहूर उक्ति है— ‘समस्याएं उस स्तर के सोच से हल नहीं हो सकतीं जिस स्तर की वजह से वे पैदा हुई हैं.’


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दोषपूर्ण तरीका

ऐसा लगता है कि फिलहाल तो थिएटर कमांड सिस्टम (टीसीएस) की कब्र खोदने वाले ही बाजी मार ले गए हैं और राजनीतिक नेतृत्व इसके साथ दांव पर लगे मसलों को समझने में विफल रहा है, और वह सुधारों का प्रतिरोध कर रहे निहित स्वार्थों के दबाव में है.

वैसे, टीसीएस के समग्र ढांचे को ठोस आकार दिए बिना इसके हिस्सों का गठन करने की कोशिश करके सुधारों का दोषपूर्ण तरीका अपनाया गया है. ऐसा लगता है कि ‘आगे बढ़ते जाओ, सीखते जाओ’ वाला तरीका अपनाया गया है. अंतिम स्वरूप क्या होगा यह तय किए बिना और उसकी राजनीतिक मंजूरी के बिना एअर डिफेंस कमांड और मैरीटाइम थिएटर कमांड जैसे अंगों के गठन का तरीका अपनाना विचित्र ही है. यह ‘एक हाथी और छह दृष्टिहीन’ वाली उपदेश कथा की याद दिलाता है, जिसमें हरेक व्यक्ति हाथी के एक अंग को छूकर अपना अनुमान लगाता है . नयी कमिटी भी यही करेगी और रक्षा मंत्रालय अपने ही बनाए गड्ढे में डूबता चला जाएगा.

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भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का जो परिदृश्य है उसमें रक्षा मंत्रालय की अकुशलता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है. कई खतरे मंडरा रहे हैं और भारत के सुरक्षा परिदृश्य पर काला साया डाल रहे हैं. समय ही मूल तत्व है और सुधारों की चुनौतियां बेहद कठिन हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि रक्षा मंत्रालय के लिए यह सामान्य बात है. सुधारों पर ज़ोर देने के लिए पीएमओ को श्रेय देना चाहिए, और उसे पहल करनी चाहिए ताकि क्रियान्वयन की प्रक्रिया सुधारों का ही गला न घोंट दे.
सवाल यह है कि यह पहल क्यों और किस तरह की जाए?

विशेषज्ञों के एक पैनल की जरूरत

यह तो स्पष्ट है कि तीनों सेनाओं के बीच और रक्षा मंत्रालय तथा दूसरे मंत्रालयों के बीच के विवादों को रक्षा मंत्रालय अपने बूते ही नहीं निबटा सकता. मंत्रालयों के बीच और एजेंसियों के बीच तालमेल हमेशा शासन का एक चुनौतीपूर्ण पहलू रहा है. राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में तो यह और भी कठिन है, क्योंकि राजनीतिक सत्ता रक्षा, गृह, विदेश और वित्त मंत्रालयों के बीच बंटी होती है. आम तौर पर इन मंत्रालयों में दबंग राजनेता बैठे होते हैं. केवल पीएमओ ही उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लक्ष्यों पर एकमत कर सकता है, खासकर मामला जब अपने-अपने दायरे का हो. आज की तरह, दीर्घकालिक सुधारों के लिए केवल सरकार का ‘थिंक टैंक’ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) ही टीसीएस के ढांचे का खाका बनाने और इसे संबंधित मंत्रालयों से लागू करवाने की क्षमता रखती है.

एनएससी समग्र चिंतन का उच्चस्तरीय मंच है. इसलिए, इस मसले को इस मंच पर न रखकर, जबकि मामला कई मंत्रालयों से जुड़ा है, और इस पर विचार करने का सारा दारोमदार केवल रक्षा मंत्रालय पर छोड़कर मंत्रालय उस काम को उठा लिया है जिसे वह पूरा नहीं कर सकता. टीसीएस का खाका तैयार करने के लिए रोज-रोज के मामलों से मुक्त होकर सोच-विचार करने की स्थिति जरूरी है. यह काम सरकारी अधिकारी नहीं कर सकते, जो अपनी जिम्मेदारियों के बोझ से दबे रहते हैं.

थिएटर कमांड के ढांचे का खाका तैयार करने का काम विशेषज्ञों के पैनल को करना चाहिए, जो उन लोगों से विचार-विमर्श करें जिनके दांव इसमें लगे हैं, और फिर वह इस खाके को एनएससी से मंजूर करवाए. जब मंजूरी मिल जाए तो इसे रक्षा मंत्रालय को सौंप दिया जाए. मंत्रालय कैबिनेट नोट तैयार करे जिसमें खर्चों के ब्योरे के साथ परिवर्तनों और क्रियान्वयन योजना को लागू करने की योजना बनाई जाए. सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी (सीसीएस) जब इसे मंजूर कर दे तब संबंधित मंत्रालय इस योजना को लागू करना शुरू कर दें, जिसकी प्रगति पर एनएससी नज़र रखे. परिवर्तनों और क्रियान्वयन योजना को लागू करने के लिए विशेषज्ञता जरूरी है, और यह विशद काम है. इसमें कॉर्पोरेट जगत का उपयोग भी किया जा सकता है क्योंकि उसे स्ट्रेटेजिक बिजनेस यूनिटों में तब्दीली का अनुभव होता है. इस मामले में पीएमओ का हस्तक्षेप बेहद जरूरी है.


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यह पैनल कैसे बने

पीएमओ विशेषज्ञों के इस पैनल का गठन गैर-सरकारी स्तर पर करे. सबसे अच्छा यह होगा कि यह काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी), जो एनएससी का एक अंग है, के जरिए हो. स्व. के. सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में प्रथम एनएसएबी ने भारत की परमाणु नीति बनाई थी, जो भारत की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है और जो तीन दशकों से यथावत जारी है. जरूरत इस बात की है कि एनएसएबी के अधिकारों का उपयोग करते हुए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया जाए. इसके बाद बौद्धिक ईमानदारी के साथ अपने विशेष क्षेत्र का अनुभव रखने वाले व्यक्तियों का चयन किया जाए. ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है. अहम बात यह है कि चूंकि मंत्रालयों के अंदर और विभिन्न मंत्रालयों के बीच भी अपने-अपने दायरे को लेकर विवाद भी इस मसले से जुड़े हैं इसलिए जरूरी है कि इस पैनल का नेतृत्व सैन्य पृष्ठभूमि वाला कोई राजनेता करे.

सेनाओं के बीच और मंत्रालयों के बीच के जटिल मसलों से निबटने के लिए राजनीतिक कौशल जरूरी है. लेकिन राजनीतिक कौशल के साथ सैन्य तथा सुरक्षा संबंधी मसलों की भी साफ समझ जरूरी है. अपने पिछले लेख में मैंने सैन्य पृष्ठभूमि वाले रक्षा मंत्री की जरूरत पर ज़ोर दिया था ताकि वह बढ़ते खतरों से निबटने और रक्षा सुधारों की जरूरतों को पूरा करे. सामान्य रक्षा मंत्री के पास अहम मसलों पर विचार करने का समय भी नहीं होगा, और सैन्य तथा सुरक्षा संबंधी मामलों का पर्याप्त ज्ञान भी नहीं होगा. इसके अलावा वह राष्ट्रीय राजनीति की उथलपुथल में भी उलझा होगा. उससे यह अपेक्षा रखना अनुचित ही होगा कि वह अपने अधिकारियों द्वारा तैयार प्रस्तावों पर फैसला कर सकेगा. आश्चर्य नहीं कि वर्तमान रक्षा मंत्री ने भी वही किया है जो ऐसी स्थितियों में समान्यतः किया जाता है—एक कमिटी का गठन कर देना. के. सुब्रह्मण्यम ऐसे कमिटियों के बारे में कहा करते थे कि यह ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जिसे एक घोड़े का खाका बनाने को कहा जाता है और वे एक गधे का खाका तैयार कर डालते हैं.

पीएमओ को पहले सैन्य पृष्ठभूमि वाला एक नेता ढूंढना चाहिए और फिर उसकी सलाह से एक पेनेल का गठन करना चाहिए. मेरे विचार से, सत्ता दल में ऐसी योग्यता वाले बड़े नेता मौजूद हैं. मेजर जनरल बी.सी. खंडूरी का नाम सबसे पहले लिया जा सकता है हालांकि कहा जाता है कि अब वे पार्टी के चहेते नहीं रहे. भाजपा को राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े मकसद के लिए अपने आंतरिक मतभेदों को भुलाकर खंडूरी के राजनीतिक तथा सैन्य अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए.

रक्षा मंत्रालय का जो रवैया है वही जारी रहा तो थिएटर कमांड की योजना को या तो रद्द करना होगा या वह जन्म से अपंग होगा, या इससे भी बुरा यह कि इसे अगले युद्ध में मिले सबक के रूप में देखा जाएगा. फिर से बता दूं कि एनएससी इसके ढांचे के बारे में फैसला करे, सीसीएस मंजूरी दे, और रक्षा मंत्रालय तथा संबंधित इसे लागू करें. फिलहाल तो सुधार कच्चे रास्ते पर चल रहे हैं, और हादसे का शिकार होने हो सकते हैं. पीएमओ को इसे पटरी पर लाना चाहिए, खासकर इसलिए कि यह उसके ही दिमाग की उपज है.

(ले. जन. प्रकाश मेनन (रिटा) स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम, तक्षशिला संस्थान, बेंगलुरू के निदेशक, और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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