Thursday, 27 January, 2022
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मोदी सरकार अचानक क्यों ‘पश्चिम की ओर देखने’ लगी, तालिबान, पाकिस्तान, महबूबा, अब्दुल्ला से कर रही बात

तालिबान, कश्मीरी नेताओं से वार्ता और पाकिस्तान के प्रति गर्मजोशी मोदी सरकार की रणनीतिक अनिवार्यताएं हैं; एक ओर वह पूरब के मोर्चे पर अमेरिका को ‘क्वाड’ के सहयोगी के रूप में चाहे और दूसरी ओर पश्चिमी मोर्चे पर उनके मकसद के खिलाफ काम करे यह नहीं चल सकता.

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महबूबा मुफ़्ती का शुक्रिया कि उन्होंने इस सप्ताह इस स्तंभ के लिए सूत्र थमा दिया. जम्मू-कश्मीर के प्रमुख गठबंधन ‘पीएजीडी’ ने दिल्ली में सर्वदलीय बैठक के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तो महबूबा ने बयान दिया कि भारत को कश्मीर मसले का अंतिम हल ढूंढ़ने के लिए पाकिस्तान से भी बात करनी चाहिए. इसके बाद उन्होंने कुछ जुमलेबाजी करते हुए कहा कि ‘अगर भारत तालिबान से बात कर रहा है तो पाकिस्तान से बात करने में क्या बुराई है?’

सवाल तो अच्छा है, मगर पहली बात यह है कि भारत तालिबान से क्यों बात करेगा? उससे कोई लगाव नहीं है. तालिबान ने आईसी-814 विमान के अपहरण कांड के दौरान भारत के साथ जिस तरह का अपमानजनक बर्ताव किया उसे भारत न कभी भूलेगा और न कभी उसे माफ करेगा. और तालिबान का पाकिस्तान के साथ जो गर्भनाल वाला जुड़ाव है, और भारत जिस तरह काबुल में लोकतांत्रिक सरकारों का समर्थन करता रहा है, उसके चलते तालिबान भी भारत की कोई परवाह नहीं करेगा. तो अब क्या बदल गया है?

यही वजह है जिसने हमें पश्चिम की ओर देखने को मजबूर किया. भला हो चीन, ‘क्वाड’, हिंद-प्रशांत मसले आदि का, पूरब पर तो हम एक साल से ध्यान दे ही रहे हैं. फिलहाल भारत का रणनीतिक ज़ोर पूरब से पश्चिम की ओर मुड़ गया है. और अमेरिका के लिए भारत के पश्चिम में स्थित भूभाग रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है.

भारत तालिबान से इसलिए बात कर रहा है क्योंकि वह जीत रहा है. शुरू में मुजाहिदीन, दक़ियानूसी, गंवई और अनपढ़ अफगानों के रूप में उसने, अपनी ताकत के चरम पर पहुंचे सोवियत संघ को परास्त किया. ऐसा उसने अमेरिका, पाकिस्तान, सऊदी अरब, चीन आदि की भारी मदद से किया. अब तालिबान के रूप में इसी संगठन ने दुनिया की एकमात्र महाशक्ति को परास्त किया है. ऐसा उसने पाकिस्तान की मदद से किया है. इसकी वजह यह है कि एक के बाद दूसरा अमेरिकी शासन अपने लक्ष्य को लेकर अस्पष्ट था. क्या वह अल-क़ायदा को नष्ट करना चाहता था?


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जब तक वह ऐसा करने में सफल हुआ, तब तक अलक़ायदा ने ‘आईएसआईएस’ का रूप धारण कर लिया. जब वह अंततः ओसामा बिन लादेन को मारने में सफल हुआ तब तक लादेन आतंकवाद के गुरू के बेअसर, अलग-थलग पड़े अवतार में तब्दील हो चुका था. यहां तक कि अलक़ायदा के उसके साथी भी उसकी चिट्ठियों का जवाब देने की परवाह नहीं करने लगे थे. एक ने तो बगदाद में ‘आईएसआईएस’ की शाखा शुरू कर दी थी.

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आखिर अमेरिका कब अपनी जीत का ऐलान करके वापस लौटता? अगर लक्ष्य अफगानिस्तान को आतंकवाद के अभयारण्य के तौर पर नष्ट करना था, तो यह तब तक नहीं हो सकता था जब तक ऐसा ही लक्ष्य पाकिस्तान में नहीं हासिल किया जाता है— अफगानिस्तान की सरहद से लगे विशाल क्षेत्र में ही नहीं बल्कि रावलपिंडी में पाकिस्तानी फौज के मुख्यालय ‘जीएचक्यू’ के आकाओं के सोच में भी.

एक के बाद एक कई किताबों ने साफ बता दिया है कि आईएसआई और पाकिस्तानी फौज ने किस तरह अमेरिका के साथ दोहरा खेल किया. वह पाकिस्तानी मदद के बिना वैसी सफलता नहीं हासिल कर सकता था जैसी अल-क़ायदा के खिलाफ हासिल की. इसलिए वह पाकिस्तान पर इस बात के लिए ज़ोर नहीं डाल सकता था कि वह तालिबान से अपना रिश्ता तोड़े. तालिबान को मौतों और तबाही की परवाह नहीं थी, और उसके अधिकतर अड्डे पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में थे, जहां तक अमेरिकी ड्रोन नहीं पहुंच सकते थे. यही वजह है कि अमेरिका अपनी सबसे लंबी लड़ाई हार कर लौट गया है.

अब वह अपना चेहरा बचाने के लिए वही कर सकता है जो अमेरिका का रवैया रहा है, वह इसे इस तरह पेश कर सकता है कि उसने अफगानिस्तान को काफी स्थिर हालत में लाने के बाद छोड़ा है और यह कि तालिबान की इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि वह अब किसी और आतंकवादी नेटवर्क को पनपने नहीं देगा. अब अमेरिका की आखिरी ख़्वाहिश यही होगी कि भारत अफगानिस्तान में ‘खेलना’ शुरू करे, या अफगानिस्तान फिर से भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन जाए.

भारत इस हकीकत को कबूल रहा है. वह अपने पूरब के लिए, अमेरिका को ‘क्वाड’ के अहम सहयोगी के रूप में चाहे, और अपने पश्चिम के लिए इसके खिलाफ काम करे, यह चल नहीं सकता. इसलिए भारत तालिबन से संपर्क बना रहा है. इसका अर्थ यह है कि भारत और पाकिस्तान को भी अपने रिश्ते ठीक करने पड़ेंगे. अगर वे ‘एलओसी’ पर एक-दूसरे से लड़ते रहेंगे तो यह लड़ाई अफगानिस्तान तक भी फैलेगी. और वहां अगर तालिबान सत्ता में होगा तो आईएसआई भारत के खिलाफ उसका इस्तेमाल करने के बारे में सोच सकता है. इसके अलावा, भारत या अमेरिका यह नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान में हालात ऐसे बनें कि पाकिस्तान की जीत हो जाए.

यह इस बड़े रहस्य का भी खुलासा कर देता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम क्यों हो गया है. वैसे, अमेरिका की मदद और आग्रह के कारण इस दिशा में पहले ही काम हो रहा था. और, इसे आप तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं कह सकते. दोस्तों में समझाइश की बातें होती ही रहती हैं.

कश्मीर में नई पहल इसी का अगला तार्किक कदम है. मोदी-शाह सरकार और कश्मीरी नेता, दोनों पक्षों ने शेर की सवारी छोड़ी. अब ‘राष्ट्र विरोधी गुपकर गिरोह’ दिल्ली का सहयोगी बन गया है, जिसे साथ लिया जा सकता है. कश्मीर घाटी में कोई बहुत बड़ा, योजनाबद्ध, जबरन जनसांख्यिकीय उलटफेर न तो आसान है और न संभव है. दोनों पक्ष ने अपने अतिवादी तेवर छोड़े हैं. गुपकर जमात अब अनुच्छेद 370 के साथ 5 अगस्त से पहले वाली स्थिति बहाल करने पर ज़ोर नहीं दे रही है, और केंद्र सरकार ने ‘बदनाम पुराने परिवारों’ को कूड़ेदान में डालने की मुहिम छोड़ दी है, और उम्मीद है कि जम्मू-कश्मीर में वह जिस नये नेतृत्व को तैयार करने की कोशिश कर रही है उसके मजबूत होते ही उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे देगी.

पाकिस्तान के लिए भी अच्छा मौका है. फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की धमकी अभी कायम है. वास्तव में, इस शुक्रवार को इसकी बैठक में फैसला किया गया कि पाकिस्तान को अभी संदिग्ध वाली सूची में ही रखा जाएगा. इसके साथ ही अमेरिकी दबाव के चलते भारत में कश्मीर से आगे अब कोई बड़ा आतंकवादी हमला मुमकिन नहीं है. और कश्मीर में ऐसी कार्रवाई का जवाब तुरंत एलओसी पर मिल जाता है. यानी यह घाटे का मामला है.

भारत के सामने भी कश्मीर घाटी में एक साफ हकीकत मुंह बाये खड़ी है. उम्मीद तो यह थी कि केंद्रीय शासन के बाद आतंकवाद खत्म हो जाएगा लेकिन लोगों में असंतोष बढ़ने से यह और मजबूत हुआ है. पिछले सप्ताह मैं उत्कृष्ट पत्रकार-लेखक राहुल पंडिता की किताब ‘द लवर ब्वॉय ऑफ बहावलपुर’ पढ़ रहा था. इसमें पुलवामा मामले की गुत्थी के बारे में हैरतअंगेज़ नज़रिया प्रस्तुत किया गया है. इसकी मुख्य बात यह है कि जैश-ए-मोहम्मद और पाकिस्तान के ऐसे सभी गिरोहों के लगभग तमाम ‘पैदल फौजी’ कश्मीर के स्थानीय युवा ही हैं. केवल एकाध सरगना ही पाकिस्तान से भेजा जाता है. इसलिए, यथास्थिति का उलटा नतीजा निकल रहा है.

पश्चिम में और दूर जाएं तो ईरान में भी बदलाव हो रहा है. इब्राहिम रायसी जाने-माने रूढ़िवादी, कट्टरपंथी हैं और वे खामेनी के संभावित उत्तराधिकारी माने जाते हैं. लेकिन बाइडन प्रशासन यही चाहेगा कि उनकी राजनीतिक ताकत इतनी बढ़े कि वे उसके साथ परमाणु संधि को बहाल करें. ऐसा हुआ तो ईरान को बाज़ार और तेल सप्लाई उपलब्ध हो जाएगा. यह इस क्षेत्र में सबके लिए लाभकारी होगा. भारत में कश्मीर से लेकर मध्य एशिया और ईरान तक एक ही भूभाग है जिस पर बसे लोग गहरे और व्यापक जनसांख्यिकीय, जातीय, धार्मिक सूत्रों से जुड़े हैं.

पूरी तस्वीर इन्हीं वजहों से इस तरह बदल रही है. कोई भी बड़ा देश नहीं चाहता कि उसके लिए दो मोर्चे खुल जाएं. बाइडन ने सबसे पहले पुतिन से शिखर बैठक इसलिए की क्योंकि उन्हें एहसास है कि अमेरिका एक साथ रूस और चीन से रिश्ते खराब नहीं रख सकता. मैंने जो टिप्पणी पढ़ी है उसके मुताबिक उन्होंने पुतिन को वह दे दिया जो वे चाहते थे— एक सुपर पावर के नेता को मिलने वाला सम्मान. बाइडन को उम्मीद है कि पुतिन अब चीन से जुड़ेंगे. इसी तरह, गलवान के बाद मोदी के लिए दो सक्रिय मोर्चे संभालना संभव भी नहीं है और खतरनाक भी है. इसलिए पाकिस्तान के प्रति गर्मजोशी भारत के लिए रणनीतिक अनिवार्यता बन गई.

इस चर्चा के अंत में हम महबूबा के सवाल की ओर लौटते हैं जिसने इस स्तंभ के लिए सूत्र थमाया— ‘भारत महबूबा से इसलिए बात कर रहा है क्योंकि वह तालिबान से बात कर रहा है.’ भारत पाकिस्तान से भी बात कर रहा है, और केवल इस पर नहीं कि वे बातचीत का क्या एजेंडा रखना चाहेंगी.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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