पर्दे के पीछे के चैनल बेशक सक्रिय हैं. वैसे भी, आत्मसम्मान से भरे परमाणु शक्ति संपन्न देश, खासकर पड़ोसी देश दिखावे के लिए भले आपसी संपर्क से इनकार करें मगर वे एक-दूसरे से बात करने से मना नहीं कर सकते.
शेखर गुप्ता का कहानी कहने का अपना एक अनोखा अंदाज़ है, और CTC की कामयाबी को दोहराना तक़रीबन नामुमकिन है. लेकिन दिप्रिंट के तरकश में सिर्फ एक ही तीर नहीं है.
सवाल है कि इसके बावजूद जो लोग मानते हैं कि कांग्रेस के बगैर कोई राष्ट्रीय विकल्प बन ही नहीं सकता, वे कभी उसे इसका इलहाम करा पायेंगे या नहीं? अगर नहीं तो उससे लगाई गई उनकी उम्मीदें क्योंकर हरी हो सकती हैं?
रविवार की हुई सीडब्ल्यूसी बैठक राहुल गांधी के लिए अपने 'त्याग' के बारे में लग रही अटकलों पर विराम लगाने और यह घोषणा करने हेतु एक आदर्श मंच था कि वह अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ेंगे. लेकिन उन्होंने इस बारे में एक शब्द तक नहीं कहा.
सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए, भारत की खुफिया सेवाओं ने प्रधान मंत्री की इच्छा से चलने वाले उपकरणों के रूप में काम किया है. उनके संचालन के लिए न तो कोई तयशुदा कानूनी ढांचा है, और न ही कोई जवाबदेही.
पाकिस्तान हम पर 'ईरान जैसा' हमला करने के लिए बेताब होगा, और चीन हमें 'असममित विस्तार' का मौका दिए बिना ही एक हवाई अभियान को अंजाम देने की योजना बना रहा होगा. भारत के पास खुद को बदलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.