दुश्मन में खौफ पैदा करना और उसे सज़ा देना इस बात पर निर्भर करता है कि जिन पर हम प्रभाव डालने की कोशिश कर रहे हैं उन पर कितना प्रभाव पड़ा है. मुश्किल यह है कि हम यह निश्चित रूप से नहीं जान सकते कि वह मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने के लिए कितना नुकसान पहुंचाना ज़रूरी है.
भारत को जो लक्ष्य हासिल करना चाहिए, वह है पाकिस्तान को एक नया रूप देना, न कि वह देश जैसा उसके जनरलों और मौलवियों ने कल्पना की है. गुस्से के शब्द और क्रोध की लहरें काफी नहीं होंगी.
कश्मीर में जो सामान्य स्थिति बहाल हुई है उसे, मुनीर के मुताबिक, उलटना जरूरी था. पहलगाम कांड की तैयारी उनके भाषण और इस हमले के बीच के एक सप्ताह में तो नहीं ही की गई, इसमें कई महीने नहीं तो कई सप्ताह जरूर लगे होंगे.
खैबर-पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में वास्तविक राजनीतिक प्रतिरोध का सामना करते हुए, पाकिस्तानी सेना की रणनीति पूरी तरह ध्वस्त होने के कगार पर है. भारत को इस अवसर को पहचानना चाहिए.
यह समझ से परे है कि भाजपा जब भारत की सबसे मज़बूत पार्टी की स्थिति में है, तब वह जाति जनगणना जैसे विघटनकारी कदम को क्यों उठाए. अगर राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता ऐसी विघटनकारी राजनीति करते हैं, तो बात समझ में आती है. वे भाजपा के राजनीतिक प्रभुत्व को तोड़ने के लिए बेताब हैं, लेकिन भाजपा क्यों?
पहलगाम इस संघर्ष की सीढ़ी का पहला पायदान है. गतिशील कार्रवाई का मतलब है कि अपना संदेश देने के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा; भारत ने 6/7 मई की रात उस सीढ़ी पर कदम रख दिया था.
भले ही ट्रंप को इस क्षेत्र के इतिहास की जानकारी न हो, लेकिन उनकी टिप्पणी कोई हंसी-मज़ाक वाली बात नहीं है. वे संक्षेप में बताते हैं कि पश्चिमी देश भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के तनाव को किस तरह देखते हैं.
पाकिस्तान में और भारत में भी सबको पता था कि सवाल यह नहीं था कि हमले किए जाएंगे या नहीं बल्कि यह था कि वह कब किए जाएंगे. मोदी सरकार ने इन 14 दिनों का इस्तेमाल यह जताने के लिए किया कि उसे कोई हड़बड़ी नहीं है.