आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर जडेजा की क्लिप को एक लाख से अधिक लोगों द्वारा देखा जाना इस बात को दर्शाता है कि हम आंबेडकर के जातिविहीन समाज के सपने से बहुत दूर खड़े हैं.
प्रधानमंत्री ने जिस दूसरे चरण के लॉकडाऊन की घोषणा की है उसके फायदों पर उसके नुकसान कहीं ज्यादा भारी पड़ने वाले हैं. सरकार को भोजन और सुरक्षा का आश्वासन देना चाहिए.
जिन्हें राज्यसत्ता के मजबूत हो जाने का भय सता रहा वे बौद्धिक जुगाली के बजाय इन हालात में मौजूदा मशीनरी की जगह कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुझा सकते हैं तो बताएं.
हिन्दुओं और मुसलमानों में ऐसे संगठनों के मार्फत फैल रही धर्मांधता और कट्टरता से सबसे ज्यादा नुकसान उस भारतीयता का हुआ है जिसकी बुनियाद बहुलता और सौहार्द पर आधारित है.
उपेक्षित समाज, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग, महिला, ट्रांसजेंडर के लोग आज बाबा साहेब के विचारों में अपनी आवाज ढूंढ़ता है इसलिए वे सामाजिक न्याय और मानवाधिकार आंदोलनों की धुरी बन गए हैं.
जिस दौर में थामस पिकेटी, जोसेफ स्टेग्लीज समेत दुनियाभर के तमाम अर्थशास्त्री विभिन्न देशों में बढ़ रही असमानता की बात कर रहे हैं, और उसका समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं, उसी दौर में डॉ आंबेडकर के जन्मदिवस को समानता दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हो रही है.
संघ का मानना है कि हिन्दू एकता को बढ़ावा देकर ही जाति-व्यवस्था से मुक्ति पाई जा सकती है जबकि आंबेडकर ने इस कार्य के लिए पंथ-परिवर्तन का रास्ता अख्तियार किया.
एक सुप्रीम AI काउंसिल होनी चाहिए जो सबसे ऊपर काम करे. इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री को करनी चाहिए, जिनके पास असली अधिकार, पूरा प्रतिनिधित्व और काम करने का अधिकार हो.