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Sunday, 1 February, 2026
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डब्लूएचओ ने कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया था, लेकिन संसद चल रही थी लोग मर रहे थे

कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी घोषित होने के दो हफ्ते बाद तक क्यों चलती रही संसद? इस दौरान संसद के दोनों सदनों में क्या-क्या हुआ?

कोविड 19 से निपटने के लिए मोदी सरकार गवर्नेंस के मोर्चे पर काम करने की जगह आत्म प्रचार में लगी है

एक सप्ताह के कोरोनावायरस लॉकडाउन ने साफ कर दिया है कि पीएम मोदी के लॉकडाउन के फैसले के बाद सोचने और योजना बनाने का काम शुरू हुआ.

कोरोनावायरस का सबक: धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरता से खुलकर लड़ें

एक वायरस के आगे हम बेबस इसलिये भी हैं क्योंकि हमें यह भरोसा है कि ऊपर वाले की विशेष कृपा हमारे शरीर में कोरोना जैसे घातक दुश्मन से लड़ने के लिये एक जादुई एंटीडोट पैदा कर देगी.

अगर माफ़ी मांगनी ही थी मोदी जी, तो उसकी वजहें दूसरी हैं

पिछले इतवार को मन की बात के दौरान नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कुछ कहा, जिसकी न उनके कट्टर समर्थकों को उम्मीद थी, न उन्हें न चाहने वालों को. उन्होंने मन की बात करते हुए क्षमा शब्द का इस्तेमाल किया.

भारत को ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ शब्द से इतना प्यार क्यों है

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुत सोच विचार के बाद सोशल डिस्टेंसिंग शब्द का प्रयोग बंद कर दिया है और प्रेस कॉनफ्रेंस में भी सावधानी बरती जा रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग शब्द न बोला जाए.

लॉकडाउन से कोविड-19 संकट नहीं टलेगा क्योंकि 21 दिनों में भारत की स्वास्थ्य सेवा का विस्तार संभव नहीं

कोविड-19 जैसी महामारी भारत जैसे लोकतंत्र में निर्णय लेने और प्राथमिकताएं तय करने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़ा करती है.

मोदी सरकार को योगदान के लिए जैम को खोलने की जरूरत, पीएम केयर अकेले डिलीवर नहीं कर सकता है

जन धन, आधार, मोबाइल के साथ न केवल भारत सरकार कोरोनोवायरस-संबंधी राहत को कुशलतापूर्वक वितरित कर सकती है, बल्कि नागरिक भी दूसरों की मदद कर सकते हैं.

कोरोना से जंग में आईएएस और पुलिस को ही नहीं, पंचायत के नेताओं को भी जोड़ना जरूरी है

क्योंकि सर्वेक्षणों से स्पष्ट होता रहा है कि पंचायतों और पालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों पर भारतीय लोग काफी भरोसा करते हैं और वे किसी राज्य सरकार के अधिकारी की बजाय पंचायत के नेता के पास जाना ज्यादा पसंद करते हैं. दूसरी ओर, भरोसे के पैमाने पर देखें तो राज्यतंत्र के सभी संस्थानों में पुलिस और सरकारी अधिकारी का दर्जा सबसे नीचा है.

भारत को कोविड -19 जैसी महामारियों पर नज़र रखने के लिए सुपरक्लाउड बनाने की जरूरत है

कोविड-19 जैसी दूसरी महामारी को दरकिनार करने के लिए हमें छात्रों और उनके स्वास्थ्य रिकॉर्डों को परस्पर जोड़ देना चाहिए ताकि सारे टीके ले चुके छात्रों को ही संस्थानों में दाखिला दिया जा सके.

भारत में कोरोनावायरस की जंग आईएएस अधिकारियों के कंधों पर टिकी है

कोविड-19 जैसे इस अभूतपूर्व सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए आईएएस अधिकारी निरंतर पर्दे के पीछे काम में व्यस्त हैं जबकि उनके राजनीतिक बॉस अंताक्षरी खेल रहे हैं या फिर भव्य वैवाहिक समारोहों में भाग ले रहें हैं.

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