एक वायरस के आगे हम बेबस इसलिये भी हैं क्योंकि हमें यह भरोसा है कि ऊपर वाले की विशेष कृपा हमारे शरीर में कोरोना जैसे घातक दुश्मन से लड़ने के लिये एक जादुई एंटीडोट पैदा कर देगी.
पिछले इतवार को मन की बात के दौरान नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कुछ कहा, जिसकी न उनके कट्टर समर्थकों को उम्मीद थी, न उन्हें न चाहने वालों को. उन्होंने मन की बात करते हुए क्षमा शब्द का इस्तेमाल किया.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुत सोच विचार के बाद सोशल डिस्टेंसिंग शब्द का प्रयोग बंद कर दिया है और प्रेस कॉनफ्रेंस में भी सावधानी बरती जा रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग शब्द न बोला जाए.
क्योंकि सर्वेक्षणों से स्पष्ट होता रहा है कि पंचायतों और पालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों पर भारतीय लोग काफी भरोसा करते हैं और वे किसी राज्य सरकार के अधिकारी की बजाय पंचायत के नेता के पास जाना ज्यादा पसंद करते हैं. दूसरी ओर, भरोसे के पैमाने पर देखें तो राज्यतंत्र के सभी संस्थानों में पुलिस और सरकारी अधिकारी का दर्जा सबसे नीचा है.
कोविड-19 जैसी दूसरी महामारी को दरकिनार करने के लिए हमें छात्रों और उनके स्वास्थ्य रिकॉर्डों को परस्पर जोड़ देना चाहिए ताकि सारे टीके ले चुके छात्रों को ही संस्थानों में दाखिला दिया जा सके.
कोविड-19 जैसे इस अभूतपूर्व सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए आईएएस अधिकारी निरंतर पर्दे के पीछे काम में व्यस्त हैं जबकि उनके राजनीतिक बॉस अंताक्षरी खेल रहे हैं या फिर भव्य वैवाहिक समारोहों में भाग ले रहें हैं.
कोहिमा, एक फरवरी (भाषा) नगालैंड प्रदेश महिला कांग्रेस समिति ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की रक्षा के लिए राज्यव्यापी आंदोलन...